(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, भारतीय राज्यतंत्र और शासन) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान) |
संदर्भ
- मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 में वर्ष 2019 में किए गए संशोधनों का उद्देश्य भारत में संस्थागत मध्यस्थता को सुदृढ़ करना था। इसके तहत एक केंद्रीय नियामक और प्रोत्साहन निकाय के रूप में भारतीय मध्यस्थता परिषद (Arbitration Council of india: ACI) की परिकल्पना की गई थी।
- हालांकि, संशोधनों के लगभग छह वर्ष के बावजूद केंद्र सरकार ने अब तक इस परिषद का गठन नहीं किया है। 23 जनवरी, 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने ए.सी.आई. के गठन की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब माँगा है और मध्यस्थता संस्थानों व मध्यस्थों के संचालन, विनियमन एवं मान्यता से जुड़े एकरूप दिशानिर्देश तैयार करने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया।
2019 संशोधनों का उद्देश्य
- वर्ष 2019 में किए गए संशोधनों का मूल लक्ष्य भारत में मध्यस्थता को बढ़ावा देना, उसकी गुणवत्ता में सुधार करना और उसे एक भरोसेमंद विवाद समाधान तंत्र के रूप में स्थापित करना था।
- इसी क्रम में ए.सी.आई. को एक प्रमुख नियामक संस्था के रूप में प्रस्तावित किया गया। यह ढांचा न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्णा की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों पर आधारित था, जिसने जुलाई 2017 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।
- इस परिषद को मध्यस्थता संस्थानों के वर्गीकरण, मध्यस्थों को मान्यता देने वाले पेशेवर निकायों की स्वीकृति और भारत में पारित मध्यस्थता निर्णयों का डेटाबेस तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे जाने थे।
- ए.सी.आई. का अध्यक्ष केंद्र सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद नियुक्त किया जाना था जो सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय का पूर्व न्यायाधीश अथवा मध्यस्थता के क्षेत्र का कोई प्रतिष्ठित विशेषज्ञ हो सकता था।
- इसके अलावा परिषद में सरकार के पदेन सदस्य भी शामिल किए जाने थे।
संस्थागत स्वतंत्रता पर उठते सवाल
- ए.सी.आई. को लेकर सबसे बड़ी चिंता इसकी स्वायत्तता एवं निष्पक्षता से जुड़ी है।
- इस परिषद की संरचना में अधिकांश सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त या नामित किए जाने हैं जिससे इसके स्वतंत्र नियामक के रूप में काम करने की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी सरकारी प्रभाव वाले निकाय को संस्थानों के वर्गीकरण, मध्यस्थों की मान्यता एवं नीति-निर्धारण जैसी व्यापक शक्तियां दी जाती हैं तो इससे मध्यस्थता की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं जहाँ सरकार-प्रधान नियामक निकाय मध्यस्थता के क्षेत्र को नियंत्रित करता हो।
मध्यस्थता संस्थानों के प्रत्यायन एवं श्रेणीकरण से जुड़ा मुद्दा
- एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा मध्यस्थता संस्थानों के प्रत्यायन एवं श्रेणीकरण से जुड़ा है। भले ही यह मॉडल सिंगापुर और हांगकांग जैसे मध्यस्थता-अनुकूल न्यायक्षेत्रों से प्रेरित बताया जाता हो किंतु एक मूलभूत अंतर मौजूद है।
- इन देशों में मध्यस्थता मुख्य रूप से एक प्रमुख केंद्रीकृत संस्था के माध्यम से संचालित होती है जबकि भारत में ए.सी.आई. को असीमित संख्या में संस्थानों को मान्यता देने का अधिकार देने का प्रस्ताव है।
- इससे गुणवत्ता मानकों के कमजोर पड़ने, परिषद पर अत्यधिक प्रशासनिक बोझ बढ़ने और सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
- इसके अतिरिक्त, योग्य विदेशी कानूनी पेशेवरों को मध्यस्थों के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान भी भारत की अंतर्राष्ट्रीय अपील को कम कर सकता है।
2024 का मसौदा संशोधन विधेयक
18 अक्टूबर, 2024 को केंद्र सरकार ने मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) विधेयक, 2024 का मसौदा जारी कर सार्वजनिक सुझाव मांगे। इसका उद्देश्य संस्थागत मध्यस्थता को पुनर्जीवित करने के लिए संरचनात्मक बदलाव करना है।
मध्यस्थ संस्था की परिभाषा
- मसौदे में ‘मध्यस्थ संस्था’ की परिभाषा को नया रूप दिया गया है। इसके अनुसार, कोई भी निकाय या संगठन जो अपने नियमों के तहत या पक्षकारों द्वारा सहमत प्रक्रिया के अनुसार मध्यस्थता संचालित करता है उसे मध्यस्थ संस्था माना जा सकेगा।
- यह 2019 के संशोधनों से अलग है जिनमें सर्वोच्च या उच्च न्यायालय द्वारा औपचारिक नामांकन अनिवार्य था।
- मसौदा विधेयक मध्यस्थता संस्थानों को कुछ ऐसी शक्तियां देने का प्रस्ताव भी करता है, जो अभी तक केवल न्यायालयों के पास थीं। इनमें;
- मध्यस्थता प्रक्रिया की समय-सीमा बढ़ाना,
- देरी के मामलों में मध्यस्थों की फीस में कटौती करना और
- आवश्यकता पड़ने पर मध्यस्थों को बदलने का अधिकार शामिल है।
- इन बदलावों से न्यायालयों के हस्तक्षेप में कमी आने की उम्मीद की जा रही है। हालांकि, मार्च 2025 में संसद में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय कानून मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह विधेयक अभी विचाराधीन है।
न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करने की कोशिश
- 1996 के अधिनियम के तहत भारतीय न्यायालयों को मध्यस्थता से जुड़े मामलों में अंतरिम राहत देने का अधिकार प्राप्त है।
- मौजूदा व्यवस्था में यह राहत मध्यस्थता शुरू होने से पहले, उसके दौरान और निर्णय के बाद प्रवर्तन से पूर्व तक दी जा सकती है।
- प्रस्तावित संशोधन इस भूमिका को सीमित करना चाहते हैं। इसके तहत न्यायालयों की अंतरिम राहत देने की शक्ति को केवल पूर्व-मध्यस्थता चरण या निर्णय के बाद की अवधि तक सीमित करने का सुझाव दिया गया है।
- धारा 9(2) में संशोधन के माध्यम से 90 दिनों की अवधि की गणना को भी बदला जाना प्रस्तावित है ताकि लंबी पूर्व-मध्यस्थता न्यायिक कार्यवाहियों से होने वाली देरी को कम किया जा सके।
- इसके अलावा धारा 9-ए जोड़ने का प्रस्ताव है जिससे आपातकालीन मध्यस्थ की व्यवस्था संभव हो सकेगी।
आगे की दिशा
- न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में तदर्थ मध्यस्थता का प्रभुत्व मुख्यत: पक्षकारों की प्रक्रियात्मक स्वायत्तता की मजबूत इच्छा का परिणाम है। घरेलू मध्यस्थता संस्थानों की स्वतंत्रता और प्रशासनिक दक्षता को लेकर बने संदेह इस प्रवृत्ति को अधिक बल देते हैं।
- यदि भारत को वैश्विक स्तर पर स्थापित मध्यस्थता केंद्रों के समकक्ष खड़ा होना है तो इन आशंकाओं को दूर करना अनिवार्य होगा। इसके लिए न केवल संस्थागत ढांचे का निर्माण जरूरी है बल्कि उस पर विश्वास कायम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।