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भारत का निर्यात असंतुलन और समावेशी विकास

(प्रारंभिक परीक्षा: आर्थिक और सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास व रोज़गार से संबंधित विषय, औद्योगिक नीति में परिवर्तन और इनका प्रभाव, समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय)

संदर्भ

भारत के राष्ट्रीय निर्यात के आंकड़े वैश्विक पटल पर मजबूत दिखाई दे रहे हैं किंतु आर.बी.आई. की हालिया सांख्यिकी पुस्तिका (2024-25) एक गहरी संरचनात्मक दरार की ओर संकेत करती है। यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि भारत की निर्यात वृद्धि कुछ विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों और पूँजी-गहन उद्योगों तक सिमटकर रह गई है जिससे समावेशी विकास के दावों पर सवालिया निशान लग रहे हैं। 

निर्यात का भौगोलिक संकेंद्रण: पाँच राज्यों का दबदबा 

  • भारत का निर्यात अब एक ‘कोर-पेरिफेरी’ (केंद्र-परिधि) मॉडल में बदल गया है। वर्तमान में केवल पाँच राज्य, यथा- महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक एवं उत्तर प्रदेश देश के कुल निर्यात का 70% हिस्सा नियंत्रित करते हैं। यद्यपि पाँच वर्ष पहले यह हिस्सेदारी 65% थी।
  • यह संकेंद्रण हर्फींडाहल-हिर्शमैन सूचकांक (HHI) में वृद्धि से भी प्रमाणित होता है। वस्तुतः यह सूचकांक दर्शाता है कि निर्यात का बाजार तेजी से कुछ हाथों में केंद्रित हो रहा है जो क्षेत्रीय आर्थिक अभिसरण के बजाय असंतुलन को बढ़ा रहा है। तटीय राज्य वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का हिस्सा बन रहे हैं जबकि उत्तरी एवं पूर्वी भारत के बड़े हिस्से इस दौड़ में पिछड़ गए हैं। 

संरचनात्मक बदलाव : श्रम बनाम पूँजी 

विकास का पारंपरिक सिद्धांत कहता है कि निर्यात वृद्धि से विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार बढ़ता है किंतु भारत में यह संबंध टूटता नजर आ रहा है:

  • पूंजी की सघनता: उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण (2022-23) के अनुसार, स्थिर पूंजी निवेश में 10% की वृद्धि हुई, जबकि रोजगार सृजन मात्र 7% रहा है।
  • पूंजी-गहनता का बढ़ना: प्रति श्रमिक स्थिर पूंजी में भारी निवेश यह दर्शाता है कि निर्यात अब ‘श्रम-अवशोषित’ (Labor-absorbing) होने के बजाय ‘पूंजी-प्रधान’ (Capital-intensive) हो गया है। 
  • रोजगार की स्थिरता: रिकॉर्ड निर्यात के बावजूद कुल रोजगार में विनिर्माण की हिस्सेदारी 11.6-12% पर स्थिर है जो निर्यात की गिरती ‘रोजगार लोच’ (Employment Elasticity) का संकेत है। 

विषमता के पीछे के कारण: भीतरी राज्य का पिछड़ना 

निर्यात का एक ही जगह केंद्रित होना कोई संयोग नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरे संरचनात्मक कारण हैं:

  • औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र: अग्रणी राज्यों के पास पहले से ही कुशल श्रम, बेहतर लॉजिस्टिक्स और सघन आपूर्तिकर्ता नेटवर्क मौजूद हैं। कंपनियों के लिए इन क्लस्टर्स से बाहर निकलना महँगा और जोखिम भरा होता है।
  • वैश्विक व्यापार का बदलता स्वरूप: अब वैश्विक पूँजी सस्ते श्रम के बजाय ‘उच्च आर्थिक जटिलता’ और तकनीकी दक्षता वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रही है। 
  • संस्थागत क्षमता का अभाव: भीतरी राज्यों में बुनियादी ढाँचे और मानव पूँजी (Human Capital) की कमी उन्हें वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) में प्रवेश करने से रोकती है।  

वित्तीय बाधाएँ और पूंजी का बहिर्वाह 

  • क्षेत्रीय असमानता को वित्तीय डेटा अधिक स्पष्ट करता है। अग्रणी राज्यों में क्रेडिट-डिपॉजिट (CD) अनुपात 90% से अधिक है जिसका अर्थ है स्थानीय पूँजी को क्षेत्रीय उद्योगों में निवेश हो रहा है।
  • इसके विपरीत बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह अनुपात 50% से कम है। परिणामस्वरूप इन पिछड़े राज्यों की पूँजी भी विकसित क्षेत्रों की ओर प्रवाहित हो रही है जिससे विकास का एक दुष्चक्र बन गया है।

निष्कर्ष: विकास का परिणाम 

  • यह विश्लेषण एक नई वास्तविकता प्रस्तुत करता है की निर्यात अब विकास का चालक (Driver) नहीं, बल्कि विकास का परिणाम (Result) बन गया है। वस्तुतः राज्य इसलिए निर्यात नहीं करते कि वे समृद्ध होना चाहते हैं बल्कि वे निर्यात इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि वे पहले से ही औद्योगिक एवं संस्थागत रूप से समृद्ध हैं।
  • यद्यपि निर्यात वृद्धि से रोजगार और क्षेत्रीय समानता सुनिश्चित नहीं हो रही है तो क्या इसे विकास का एकमात्र पैमाना मानना सही है? सरकार को अब केवल निर्यात के ‘आंकड़ों’ के साथ-साथ उसकी ‘समावेशिता’ एवं ‘रोजगार सृजन’ की क्षमता पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। 
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