यू.एन.ई.ए.-7 में जंगल की आग से संबंध में भारत की पहल

(प्रारंभिक परीक्षा: पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन, आपदा एवं आपदा प्रबंधन)

संदर्भ

  • नैरोबी में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के सातवें सत्र (UNEA-7) में भारत द्वारा प्रस्तुत ‘जंगल की आग के वैश्विक प्रबंधन को सुदृढ़ करने’ संबंधी प्रस्ताव को अपनाया गया जोकि उभरते पर्यावरणीय खतरों के प्रति अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की बढ़ती चिंता को दर्शाता है। 
  • सदस्य देशों के व्यापक समर्थन से पारित यह प्रस्ताव इस तथ्य को रेखांकित करता है कि जंगल की आग अब केवल स्थानीय या मौसमी समस्या नहीं रह गई है बल्कि यह एक गंभीर, जलवायु-प्रेरित वैश्विक संकट बन चुकी है जिसके समाधान के लिए समन्वित अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई आवश्यक है।  

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (UNEA): एक अवलोकन

यू.एन.ई.ए. पर्यावरण संबंधी मामलों पर निर्णय लेने वाली विश्व की सर्वोच्च-स्तरीय संस्था है जो गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक वैश्विक मंच प्रदान करती है।

विशेषता

विवरण

स्थापना

2012 में (रियो+20 के बाद)

सदस्यता

सार्वभौमिक (संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देश)

बैठक आवृत्ति

हर दो वर्ष में (नैरोबी, केन्या में आयोजित)

जनादेश

वैश्विक पर्यावरण एजेंडा निर्धारित करना, व्यापक नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करना और यू.एन.ई.पी. की रणनीतिक दिशा परिभाषित करना

यू.एन.ई.ए.-7: लचीले ग्रह की ओर प्रयास

यू.एन.ई.ए. का सातवाँ सत्र (2025) नैरोबी में ‘एक लचीले ग्रह के लिए सतत समाधानों को आगे बढ़ाना’ विषय के तहत आयोजित किया गया। यह सत्र ऐसे समय में हुआ जब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और प्रदूषण संकट एक-दूसरे से जुड़कर वैश्विक जोखिमों को अधिक गंभीर बना रहे हैं। 

जंगल की आग: एक उभरता वैश्विक खतरा

  • भारत ने अपने प्रस्ताव के माध्यम से इस तथ्य पर ध्यान केंद्रित किया कि जंगल की आग अब सीमित अवधि की प्राकृतिक घटनाएं नहीं रह गई हैं। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, लंबे सूखे और मानवीय गतिविधियों के कारण इनकी आवृत्ति, तीव्रता एवं अवधि में निरंतर वृद्धि हो रही है। परिणामस्वरूप पारिस्थितिक संतुलन, आजीविका एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएँ गंभीर दबाव में आ रही हैं।
  • प्रतिवर्ष लाखों हेक्टेयर भूमि आग की चपेट में आती है जिससे वनों एवं जैव-विविधता को भारी क्षति होती है और मिट्टी व जल संसाधनों की गुणवत्ता प्रभावित होती है तथा वायु प्रदूषण बढ़ता है। 
  • इसके साथ ही, जंगल की आग से बड़े पैमाने पर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जिससे कार्बन सिंक कमजोर पड़ते हैं और जलवायु संकट अधिक गहरा हो जाता है।

वैज्ञानिक चेतावनियाँ और नीति की दिशा

  • भारत ने यू.एन.ई.पी. की ‘स्प्रेडिंग लाइक वाइल्डफायर’ रिपोर्ट का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि मौजूदा रुझान जारी रहने की स्थिति में-
    • वर्ष 2030 तक जंगल की आग में 14%
    • वर्ष 2050 तक 30% और 
    • वर्ष 2100 तक 50% की वृद्धि हो सकती है। 
  • ये अनुमान स्पष्ट संकेत देते हैं कि जंगल की आग एक दीर्घकालिक और जलवायु-संचालित जोखिम है जिससे निपटने के लिए प्रतिक्रियात्मक उपायों से आगे बढ़कर सक्रिय रोकथाम और तैयारी पर जोर देना होगा। 

एकीकृत अग्नि प्रबंधन की आवश्यकता

  • भारत ने वैश्विक स्तर पर एकीकृत अग्नि प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें- 
    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ 
    • जोखिम मानचित्र 
    • उपग्रह आधारित निगरानी और 
    • स्थानीय समुदायों तथा अग्रिम पंक्ति के कर्मियों की भागीदारी को केंद्रीय भूमिका दी गई है। 
  • यू.एन.ई.पी. की भूमिका को अनुकूलन, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और रणनीति निर्माण में महत्वपूर्ण बताया गया, वहीं एफ.ए.ओ. एवं यू.एन.ई.पी. द्वारा 2023 में स्थापित ग्लोबल फायर मैनेजमेंट हब को वैश्विक सहयोग के लिए एक अहम मंच के रूप में रेखांकित किया गया। 

प्रस्ताव के प्रमुख प्रावधान

  • भारत द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव में कई ठोस उपायों की मांग की गई है। इनमें शामिल हैं-
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और जोखिम आकलन उपकरणों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना
  • रोकथाम एवं पुनर्प्राप्ति के लिए क्षेत्रीय तथा वैश्विक साझेदारी बढ़ाना, ज्ञान साझा करने और क्षमता निर्माण के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करना  
  • एकीकृत अग्नि प्रबंधन पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय कार्य योजनाओं को समर्थन देना
  • इसके अतिरिक्त, बहुपक्षीय एवं परिणाम-आधारित वित्तपोषण तंत्रों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय वित्त तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है। 

यू.एन.ई.ए.-7 के व्यापक निहितार्थ

  • यू.एन.ई.ए.-7 का समापन 11 प्रस्तावों को अपनाने के साथ हुआ, जिनमें शामिल थे- 
    • प्रवाल भित्तियों का संरक्षण
    • रसायन और अपशिष्ट प्रबंधन
    • रोगाणुरोधी प्रतिरोध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की स्थिरता
    • हिमनद संरक्षण और युवा भागीदारी जैसे विषय
  • यह दर्शाता है कि वैश्विक पर्यावरणीय एजेंडा कितना व्यापक और बहुआयामी हो चुका है। 

निष्कर्ष

यूएनईए-7 में भारत का जंगल की आग से संबंधित प्रस्ताव वैश्विक पर्यावरण शासन में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। यह न केवल एक गंभीर और बढ़ते खतरे को संबोधित करता है बल्कि समन्वित, विज्ञान-आधारित व समुदाय-केंद्रित समाधान की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को आगे बढ़ने का मार्ग भी दिखाता है। ऐसे समय में जब राजनीतिक मतभेद बहुपक्षीय सहयोग को चुनौती दे रहे हैं। यह प्रस्ताव इस बात की याद दिलाता है कि पर्यावरणीय संकटों का समाधान साझा जिम्मेदारी और सामूहिक कार्रवाई से ही संभव है।

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