New
GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM

भारत का विनिर्माण संकट: डच रोग एवं तकनीकी नवाचार का विरोधाभास

(प्रारंभिक परीक्षा: आर्थिक और सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास व रोज़गार से संबंधित विषय, औद्योगिक नीति में परिवर्तन और औद्योगिक विकास पर इनका प्रभाव)

संदर्भ

20वीं सदी के प्रारंभ में भारत, चीन एवं दक्षिण कोरिया आर्थिक पायदान पर लगभग एक ही स्थान पर थे किंतु आज की तस्वीर बिल्कुल अलग है। जहाँ चीन और दक्षिण कोरिया ने विनिर्माण (Manufacturing) को अपना इंजन बनाकर वैश्विक शक्ति के रूप में स्वयं को स्थापित किया, वहीं भारत की जी.डी.पी. में विनिर्माण की हिस्सेदारी स्थिर रही और हाल के वर्षों में सेवाओं (Services) के मुकाबले पिछड़ गई। अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम अपनी  पुस्तक ‘ए सिक्स्थ ऑफ ह्यूमैनिटी’ में इस विफलता का एक अनूठा विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।  

डच रोग (Dutch Disease) और भारतीय अर्थव्यवस्था

  • ‘डच रोग’ नामक आर्थिक सिद्धांत बताता है कि कैसे एक क्षेत्र में अचानक होने वाला लाभ दूसरे क्षेत्रों (विशेषकर विनिर्माण) के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। मूलतः 1959 में नीदरलैंड में गैस भंडारों की खोज के संदर्भ में गढ़ा गया यह शब्द दर्शाता है कि संसाधनों की प्रचुरता कैसे मुद्रा का मूल्य बढ़ाकर और मजदूरी में वृद्धि करके निर्यात को महंगा एवं प्रतिस्पर्धी बना देती है।
  • कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत ने प्राकृतिक संसाधनों के बजाय ‘उच्च सरकारी वेतन’ के माध्यम से डच रोग का अनुभव किया। उनके विश्लेषण के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
    • मजदूरी में असंतुलन: सरकारी क्षेत्र में उच्च वेतन ने विनिर्माण क्षेत्र से कुशल श्रमिकों को आकर्षित किया, जिससे निजी क्षेत्र के लिए श्रम लागत बढ़ गई।
    • प्रतिस्पर्धा की कमी: उच्च मजदूरी और घरेलू कीमतों में वृद्धि के कारण भारतीय निर्मित वस्तुएँ वैश्विक बाजार में महंगी हो गईं।
    • वास्तविक विनिमय दर का प्रभाव: सरकारी कर्मचारियों की बढ़ती क्रय शक्ति से घरेलू गैर-व्यापार योग्य वस्तुओं की मांग में वृद्धि हुई, जिससे मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ा और विनिर्माण की उत्पादन क्षमता बाधित हुई। 

तकनीक का प्रश्न: क्या नवाचार समाधान हो सकता था ?

  • इतिहास में ‘प्रेरित नवाचार’ (Induced Innovation) का सिद्धांत यह मानता है कि जब श्रम महंगा होता है तो अर्थव्यवस्थाएँ स्वचालित रूप से तकनीकी विकास की ओर मुड़ती हैं।
  • सर जॉन हबक्कुक और रॉबर्ट सी. एलन जैसे इतिहासकारों ने तर्क दिया है कि 19वीं सदी के ब्रिटेन व अमेरिका में ‘श्रम की कमी’ ने ही औद्योगिक क्रांति और नवाचार को जन्म दिया था। 
  • डारोन एसमोग्लू के अनुसार, आधुनिक जर्मनी और जापान ने वृद्ध होती आबादी (श्रम की कमी) के कारण स्वचालन (Automation) अपनाकर अपनी उत्पादकता बढ़ाई।
  • यहाँ भारत के संदर्भ में एक मौलिक प्रश्न उठता है; यदि सरकारी वेतन के कारण श्रम महंगा था, तो भारतीय विनिर्माण क्षेत्र ने तकनीक अपनाकर अपनी उत्पादकता क्यों नहीं बढ़ाई? 

भारतीय निजी क्षेत्र और ‘सस्ते श्रम’ का मोह 

  • भारत की आधुनिक सेवा अर्थव्यवस्था और सॉफ्टवेयर क्षेत्र की वृद्धि ने इस विसंगति को अधिक गहरा कर दिया है। जहाँ एक ओर यूनिकॉर्न कंपनियों (स्विगी, ज़ोमैटो, ओला) का उदय हुआ है, वहीं दूसरी ओर प्रवेश स्तर (Entry-level) के सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के वेतन में 2000 के दशक के बाद से कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई है।
  • यह संकेत देता है कि भारत का वर्तमान विकास मॉडल वास्तविक ‘तकनीकी उन्नयन' के बजाय 'प्रचुर और सस्ते श्रम' के उपयोग पर आधारित है। विनिर्माण क्षेत्र ने उत्पादकता बढ़ाने के लिए मशीनरी और नई तकनीक में निवेश करने के बजाय, उपलब्ध सस्ते श्रम भंडार पर निर्भर रहना चुना, जिसके परिणामस्वरूप संरचनागत ठहराव (Structural Stagnation) की स्थिति उत्पन्न हो गई। 

विनिर्माण क्षेत्र में सुधार के लिए सरकारी प्रयास 

भारत सरकार ने विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र को वैश्विक केंद्र बनाने और 2025 तक जी.डी.पी. में इसकी हिस्सेदारी को 25% तक ले जाने के लिए कई रणनीतिक प्रयास किए हैं। इन सुधारों का मुख्य ध्यान उत्पादकता, बुनियादी ढांचा और व्यापार सुगमता पर है।

उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना 2.0

  • PLI योजना सरकार का सबसे सफल हस्तक्षेप माना जा रहा है। वर्ष 2025 तक इस योजना का विस्तार 14 प्रमुख क्षेत्रों (जैसे- इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोबाइल और विशिष्ट स्टील) में हो चुका है।
  • वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पी.एल.आई. आवंटन में भारी बढ़ोतरी की गई है, विशेषकर कपड़ा (Textile) क्षेत्र के लिए।
  • PLI 2.0 का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत में अत्याधुनिक तकनीक लाना और उच्च घरेलू मूल्यवर्धन (Domestic Value Addition) सुनिश्चित करना है।

नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन और 'मेक इन इंडिया 2.0'

इसका मुख्य उद्देश्य विनिर्माण की लागत को कम करना और गुणवत्ता मानकों में सुधार करना है। इसके तहत 'एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन' के माध्यम से निर्यातकों को ऋण और विदेशी बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित की जा रही है।

MSME और स्टार्टअप्स के लिए सुदृढ़ीकरण 

विनिर्माण क्षेत्र की रीढ़ माने जाने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए 2025 में विशेष योजनाएँ शुरू की गई हैं:

  • MCGS-MSME योजना: इसके तहत मशीनरी और उपकरणों की खरीद के लिए 100 करोड़ रुपए तक के ऋण की सुविधा दी गई है, जिसमें सरकार 60% गारंटी कवर प्रदान करती है।
  • MSME क्रेडिट कार्ड: छोटे उद्यमियों को आसान कार्यशील पूंजी (Working Capital) प्रदान करने के लिए नए क्रेडिट कार्ड लॉन्च किए गए हैं।
  • टियर-II और टियर-III शहरों पर ध्यान: ‘डिस्ट्रिक्ट बिजनेस रिफॉर्म्स एक्शन प्लान (D-BRAP) 2025’ के तहत छोटे शहरों में स्टार्टअप हब विकसित किए जा रहे हैं।

बुनियादी ढाँचा और लॉजिस्टिक्स: पीएम गतिशक्ति

  • औद्योगिक गलियारे (Industrial Corridors): देश भर में 11 औद्योगिक गलियारे विकसित किए जा रहे हैं ताकि कच्चा माल और तैयार माल तेजी से पहुंच सके।
  • PM MITRA पार्क्स: कपड़ा उद्योग के लिए 7 मेगा एकीकृत टेक्सटाइल पार्क स्थापित किए जा रहे हैं, जो ‘प्लग एंड प्ले’ (Plug and Play) सुविधाएँ प्रदान करेंगे।
  • लॉजिस्टिक्स लागत: सरकार का लक्ष्य लॉजिस्टिक्स लागत को वर्तमान के 13-14% से घटाकर वैश्विक स्तर के 8% तक लाना है।

व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business)

  • जन विश्वास अधिनियम 2023: इसके माध्यम से 42 कानूनों के 183 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है जिससे छोटे उद्यमियों का डर कम हुआ है।
  • सिंगल विंडो क्लीयरेंस: निवेश मंजूरी के लिए डिजिटल सिंगल विंडो सिस्टम को अब जिला स्तर तक बढ़ाया जा रहा है।
  • श्रम सुधार: चार श्रम संहिताओं (Labour Codes) के माध्यम से अनुपालन को सरल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, इनका पूर्ण कार्यान्वयन अभी प्रक्रियाधीन है। 

निष्कर्ष : नीतिगत हस्तक्षेप बनाम बाजार की जड़ता 

  • ‘डच रोग’ ढाँचा भारत के औद्योगीकरण न कर पाने की एक महत्वपूर्ण वजह माना जा सकता है किंतु यह पूरी कहानी नहीं है। समस्या का एक पहलू जहाँ सरकारी नीति (उच्च वेतन) है, वहीं दूसरा पहलू निजी क्षेत्र की वह मानसिकता है जिसने तकनीकी नवाचार के बजाय कम मजदूरी वाले मॉडल को प्राथमिकता दी। 
  • भारत के लिए आगे की राह ‘मेक इन इंडिया’ के साथ-साथ विनिर्माण क्षेत्र को तकनीकी रूप से इतना उत्पादक बनाने में है कि वह उच्च वेतन व वैश्विक प्रतिस्पर्धा दोनों का सामना कर सके। 
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR