भारत का चावल उत्पादन और जल संकट

संदर्भ 

  • हाल के वर्षों में भारत ने चावल उत्पादन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए चीन को पीछे छोड़ दिया है और विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है।
  • इस उपलब्धि को राजनीतिक नेतृत्व और कृषि नीति समर्थकों ने मेहनती किसानों तथा सरकारी पहलों की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया है। 
  • बीते एक दशक में भारत का चावल निर्यात लगभग दोगुना हो चुका है और हालिया वित्तीय वर्ष में यह 20 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक तक पहुँच गया है। हालाँकि, इस आँकड़े के पीछे एक गहराता हुआ पर्यावरणीय और जल संकट छिपा है जिसे देश के प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्रों के किसान प्रत्यक्ष रूप से महसूस कर रहे हैं।

धान की खेती और भूजल पर बढ़ता दबाव

  • पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में, जहाँ धान उत्पादन का बड़ा हिस्सा केंद्रित है, भूजल स्तर में तेज़ गिरावट दर्ज की जा रही है। 
  • स्थानीय किसानों और जल विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग एक दशक पहले जहाँ भूजल 30 फीट की गहराई पर उपलब्ध था, वहीं अब बोरवेल 80 से 200 फीट तक खोदने पड़ रहे हैं।
  • इस गिरावट की पुष्टि सरकारी आँकड़ों और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के शोध से भी होती है। लगातार गहरे बोरवेल खोदने की मजबूरी ने किसानों पर कर्ज़ का बोझ बढ़ा दिया है और खेती की लागत को अस्थिर बना दिया है।

भारत में चावल का उत्पादन 

  • भारत ने 2024-25 में लगभग 47 मिलियन हेक्टेयर से लगभग 150 मिलियन टन चावल का उत्पादन किया, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 28% है। 
  • बेहतर बीज की किस्मों, शानदार कृषि पद्धतियों और विस्तृत सिंचाई कवरेज के चलते औसत पैदावार 2014-15 में 2.72 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2024-25 में लगभग 3.2 टन प्रति हेक्टेयर हो गई। 
  • वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 12.95 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कीमत वाले 20.1 मिलियन मीट्रिक टन चावल का निर्यात किया, जो 172 से अधिक देशों तक गया।

चावल का महत्व 

  • बी.आई.आर.सी. 2025 इस विषय पर जोर देता है कि चावल वैश्विक खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है जिसका उत्पादन 1961 में 216 मिलियन टन से तीन गुना बढ़कर लगभग 776 मिलियन टन हो गया है। 
  • चार बिलियन से अधिक लोग अपनी जीविका एवं आय के लिए चावल पर निर्भर हैं और लगभग 150 मिलियन छोटे किसान 100 से अधिक देशों में इस फसल की खेती करते हैं। वैश्विक चावल उद्योग का वैल्यूएशन करीब 330 बिलियन अमेरिकी डॉलर है जो इसे तीसरा सर्वाधिक कारोबार वाला खाद्य उत्पाद बनाता है। 

नीतिगत प्रोत्साहन और विकृत प्रोत्साहन संरचना 

  • विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट का एक बड़ा कारण सरकारी सब्सिडी ढांचा है। चावल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में पिछले दस वर्षों में लगभग 70% की वृद्धि हुई है। इसके साथ ही, कृषि उपयोग के लिए बिजली पर भारी सब्सिडी दी जाती है जिससे भूजल दोहन अधिक बढ़ जाता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, ये नीतियाँ किसानों को कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों की ओर जाने से हतोत्साहित करती हैं, भले ही जल संकट कितना ही गंभीर क्यों न हो। 

जल संकटग्रस्त देश में जल-प्रधान खेती का विरोधाभास

  • इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI) के अनुसार, भारत जैसे अत्यधिक जल-संकटग्रस्त देश में ऐसी नीतियाँ लागू हैं, जिनके तहत किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से भूजल के अत्यधिक उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
  • विडंबना यह है कि भारत अपनी घरेलू आवश्यकता से कहीं अधिक चावल का उत्पादन करता है जबकि उसकी आबादी 1.4 अरब से अधिक है और वह पहले से ही संसाधनों पर भारी दबाव झेल रहा है। 

मानसून पर निर्भरता और असुरक्षा

  • भारत के अधिकांश राज्यों में सिंचाई के लिए सतही जल और भूजल दोनों का उपयोग किया जाता है किंतु पंजाब व हरियाणा के किसान मुख्यतः भूजल पर निर्भर हैं। यही निर्भरता उन्हें कमजोर मानसून के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना देती है।
  • हालाँकि, विगत दो वर्षों में मानसून सामान्य रहा है, फिर भी भूजल निकासी इतनी अधिक है कि इन राज्यों के अधिकांश जलभंडारों को सरकार ने ‘अति-शोषित’ या ‘संवेदनशील’ श्रेणी में रखा है। वर्ष 2024–25 के आँकड़े बताते हैं कि ये राज्य अपनी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से 35% से 57% अधिक भूजल निकाल रहे हैं। 

धान उत्पादन की जल लागत

कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के अनुसार, एक किलोग्राम चावल के उत्पादन में लगभग 3,000 से 4,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। यह वैश्विक औसत से 20% से 60% अधिक है। ऐसे में बड़े पैमाने पर चावल उत्पादन न केवल पर्यावरणीय रूप से अस्थिर है बल्कि दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के लिए भी जोखिमपूर्ण हो सकता है।

नीतिगत बदलाव की कोशिशें  

सकारात्मक संकेत 

  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इस योजना के तहत ‘हर खेत को पानी’ और ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ के लक्ष्य के साथ सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर) को बढ़ावा दिया जाता है जिससे पानी की दक्षता बढ़ती है। 
  • पर ड्रॉप मोर क्रॉप (PDMC) योजना: यह योजना सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देती है, किसानों को पानी बचाने वाली तकनीकों (जैसे- ड्रिप/स्प्रिंकलर) के लिए वित्तीय सहायता देती है।
  • डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस (DSR) तकनीक: पंजाब जैसे राज्यों ने इस तकनीक (सीधे बीज बोना) को अपनाने के लिए किसानों को प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि (जैसे- ₹1500) दी है, जिससे पानी की भारी बचत होती है और यह पारंपरिक रोपाई से बेहतर है। 
  • हरियाणा सरकार ने किसानों को बाजरा जैसी कम पानी वाली फसलों की ओर आकर्षित करने के लिए ₹17,500 प्रति हेक्टेयर की सब्सिडी शुरू की है। हालाँकि, यह प्रोत्साहन केवल एक फसल चक्र तक सीमित है और अब तक इसका व्यापक प्रभाव नहीं दिखा है। 

निष्कर्ष

  • भारत का चावल उत्पादन में वैश्विक अग्रणी बनना निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि है किंतु यदि यह उपलब्धि अस्थायी जल संसाधनों की कीमत पर हासिल की जाती है, तो इसके दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं। 
  • आवश्यकता इस बात की है कि कृषि नीतियों को पुनर्संतुलित किया जाए, फसल विविधीकरण को वास्तविक प्रोत्साहन मिले और जल-संरक्षण को उत्पादन लक्ष्यों के बराबर महत्व दिया जाए। तभी यह उपलब्धि सच अर्थों में टिकाऊ कही जा सकेगी।  
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