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भारत की जोखिम रहित आर.सी.ई.पी. रणनीति

(प्रारंभिक परीक्षा: आर्थिक और सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय व वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार, भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास एवं रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ

  • वर्ष 2019 में भारत द्वारा क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) से बाहर रहने का फैसला उस समय कई विशेषज्ञों को जोखिम भरा प्रतीत हुआ था। हालाँकि, छह वर्ष बाद भारत ने बिना औपचारिक सदस्यता लिए ही आर.सी.ई.पी. से जुड़े अधिकांश आर्थिक लाभ प्रभावी रूप से हासिल कर लिए हैं। 
  • हाल ही में संपन्न भारत–न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (FTA) इस रणनीति की सबसे ठोस पुष्टि है। इसके साथ ही अब चीन को छोड़कर सभी आर.सी.ई.पी. सदस्य देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते अस्तित्व में आ चुके हैं। 
  • यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि भारत ने बाजार तक पहुँच, रणनीतिक स्वायत्तता एवं आर्थिक सुरक्षा के बीच एक संतुलित व सोची-समझी व्यापार नीति अपनाई है। 

आर.सी.ई.पी. के बारे में

  • आर.सी.ई.पी. दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक गठबंधन है जिसमें 10 आसियान देश ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड व वियतनाम के साथ ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया एवं न्यूजीलैंड शामिल हैं। 
  • यह समूह वैश्विक जी.डी.पी. एवं आबादी के लगभग 30% हिस्से को समेटता है। इसका उद्देश्य शुल्क में कटौती, आपूर्ति श्रृंखला का एकीकरण एवं व्यापार को सरल बनाना है। 

भारत द्वारा आर.सी.ई.पी. से दूर रहने का निर्णय का कारण  

  • भारत द्वारा आर.सी.ई.पी. से बाहर रहने का निर्णय मुख्यतः संरचनात्मक एवं रणनीतिक चिंताओं से प्रेरित था। सबसे बड़ी आशंका यह थी कि शुल्क में भारी कटौती से चीनी वस्तुओं की भारतीय बाजारों में बाढ़ आ सकती है। 
  • चीन की अत्यधिक प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षमता और पहले से बढ़ता व्यापार घाटा, विशेषकर चीन एवं आसियान देशों के साथ, भारत के लिए गंभीर जोखिम बन सकता था। 
  • इसके अलावा, कृषि, लघु एवं मध्यम उद्योग और घरेलू विनिर्माण जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान मौजूद नहीं थे। शुल्क उदारीकरण की समय-सीमा में भी भारत के लिए आवश्यक लचीलापन नहीं दिखा। 

‘आर.सी.ई.पी. माइनस चीन’: एक वैकल्पिक मार्ग 

  • आर.सी.ई.पी. से बाहर रहकर भारत ने एक अलग किंतु व्यावहारिक मार्ग चुना है। आर.सी.ई.पी. के 15 में से 14 देशों के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते हैं किंतु चीन के साथ नहीं है।
  • वस्तुतः इस रणनीति का उद्देश्य बाजार पहुँच बनाए रखते हुए टैरिफ और नीतिगत संप्रभुता को सुरक्षित रखना है। विशेषज्ञ इसे ‘स्मार्ट रिस्क मैनेजमेंट’ के रूप में देखते हैं। यह न तो आर.सी.ई.पी. में शामिल होने जितना जोखिमपूर्ण है और न ही चीन के साथ सीधे पूर्ण एफ.टी.ए. पर हस्ताक्षर करने जैसा संवेदनशील कदम है। 

भारत–चीन व्यापार: सीमित एवं नियंत्रित

  • भारत व चीन, एशिया प्रशांत व्यापार समझौते (APTA) के सदस्य हैं जो एक सीमित तरजीही व्यापार समझौता है। इसके तहत चुनिंदा वस्तुओं पर ही आंशिक शुल्क रियायतें दी जाती हैं। 
  • इसका लाभ यह है कि व्यापक टैरिफ उन्मूलन से बचते हुए चीनी आयात पर निर्भरता को नियंत्रित रखा जा सकता है।

आर.सी.ई.पी. का भारत के लिए अधिक जोखिमपूर्ण होने का कारण  

  • आर.सी.ई.पी. की बहुपक्षीय एवं एकीकृत संरचना देश-विशिष्ट सुरक्षा उपायों को कमजोर कर देती। 
  • उत्पत्ति के नियमों पर सीमित नियंत्रण के कारण चीनी वस्तुओं का अप्रत्यक्ष प्रवेश आसियान या अन्य सदस्य देशों के माध्यम से संभव हो सकता था। 
  • इसके अलावा, भारत की संवेदनशीलताओं के अनुरूप चरणबद्ध उदारीकरण का कोई प्रभावी तंत्र इसमें मौजूद नहीं था। 

आर.सी.ई.पी. देशों के साथ भारत के एफ.टी.ए.: एक क्रमिक यात्रा

वर्ष 2014 से पूर्व 

  • भारत ने आसियान-भारत वस्तु व्यापार समझौता (2010), भारत–दक्षिण कोरिया सी.ई.पी.ए. (2010) और भारत–जापान सी.ई.पी.ए. (2011) जैसे समझौते किए। हालांकि, ए.आई.टी.आई.जी.ए. के बाद आसियान के साथ भारत का व्यापार घाटा तेज़ी से बढ़ा, जिसके कारण इसके पुनर्विचार की प्रक्रिया चल रही है किंतु प्रगति सीमित रही है। 

वर्ष 2014 के पश्चात् 

  • 2014 के बाद भारत ने अधिक सतर्क और संतुलित रुख अपनाया। भारत–ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता (ECTA) 2022 में हुआ और अब इसके विस्तार पर बातचीत जारी है। दिसंबर 2025 में भारत–न्यूजीलैंड एफ.टी.ए. का समापन इस क्रम की सबसे नई कड़ी है।

भारत–न्यूजीलैंड एफ.टी.ए.

  • इस समझौते के तहत भारतीय निर्यात को न्यूजीलैंड में शून्य शुल्क के साथ बाजार पहुँच मिलेगी।
  • साथ ही, लगभग 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता भारत की औद्योगिक एवं अवसंरचनात्मक क्षमता को मजबूत करेगी।
  • यह समझौता प्रशांत एवं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को सुदृढ़ करता है और आर.सी.ई.पी. (चीन को छोड़कर) की द्विपक्षीय कवरेज को पूरा करता है। 

चुनौतियाँ और आगे की दिशा

  • हालांकि यह रणनीति सफल रही है, फिर भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। आसियान देशों के साथ व्यापार घाटा अब भी चिंता का विषय है और पुराने एफ.टी.ए. के पुनर्संतुलन की गति धीमी है। 
  • घरेलू स्तर पर लघु एवं मध्यम उद्योगों व विनिर्माण क्षेत्र को प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए उत्पादकता बढ़ाना आवश्यक है ताकि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को वास्तविक मजबूती मिल सके। 
  • भू-राजनीतिक दबावों के बीच भारत को रणनीतिक बहुपक्षवाद अपनाना होगा—जहाँ चयनात्मक सहभागिता हो किंतु स्वायत्तता से समझौता न किया जाए। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन के दौर में एफ.टी.ए. का उपयोग चीन-केंद्रित ढांचों से हटकर विविधीकरण के लिए किया जा सकता है।  

निष्कर्ष

  • आर.सी.ई.पी. से बाहर रहने के बाद भारत की व्यापार नीति एक परिपक्व, यथार्थवादी एवं हित-आधारित दृष्टिकोण को दर्शाती है। ‘आर.सी.ई.पी. माइनस चीन’ रणनीति ने भारत को बाजार तक पहुंच तो दी, किंतु साथ ही टैरिफ व नीतिगत नियंत्रण भी बनाए रखा। 
  • भारत–न्यूजीलैंड एफ.टी.ए. इस रणनीतिक यात्रा को पूर्ण करता है और वैश्विक व्यापार में भारत को एक निष्क्रिय अनुयायी नहीं, बल्कि एक चयनशील व आत्मविश्वासी भागीदार के रूप में स्थापित करता है। दीर्घकाल में यह दृष्टिकोण भारत के आर्थिक लचीलेपन, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में टिकाऊ एकीकरण के लक्ष्यों के साथ पूरी तरह मेल खाता है।
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