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जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश)

संदर्भ 

हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के निर्णय के अनुसार देशों द्वारा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए कदम उठाना कानूनी दायित्व है और ऐसा न करने पर उन्हें मुआवज़ा देने के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। 

हालिया वाद 

  • आई.सी.जे. का यह निर्णय मार्च 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित एक प्रस्ताव के परिणामस्वरूप सामने आया, जिसमें जलवायु परिवर्तन पर न्यायालय की सलाह मांगी गई थी।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा चाहती थी कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय दो विशिष्ट प्रश्नों का समाधान करे:
    • जलवायु प्रणाली की रक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत देशों के क्या दायित्व हैं?
    • अपने दायित्वों को पूरा नहीं करने वाले देशों के लिए क्या कानूनी परिणाम होंगे?

आई.सी.जे. का निर्णय

  • न्यायालय ने तीन जलवायु संधियों संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन ढाँचा सम्मेलन (UNFCCC), 1994; क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौता (2015) की जाँच की। 
  • आई.सी.जे. ने कई अन्य पर्यावरण-संबंधी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के प्रावधानों की जाँच की जिनका जलवायु प्रणाली पर प्रभाव पड़ता है।
    • इनमें संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (UNCLOS), ओज़ोन संरक्षण के लिए  मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987), जैव विविधता सम्मेलन (1992) और मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (1994) शामिल हैं।
  • न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि जलवायु कार्रवाई कोई विकल्प या प्राथमिकता का मामला नहीं है बल्कि एक कानूनी दायित्व है। 
  • देशों का यह दायित्व है कि वे ऐसे उपाय करें जिनसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आए। 
  • इसके अतिरिक्त, यू.एन.एफ.सी.सी.सी. के अनुलग्नक I में शामिल समृद्ध और औद्योगिक देशों का यह दायित्व है कि वे उत्सर्जन में कमी लाने में अग्रणी भूमिका निभाएँ तथा विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी एवं वित्तीय हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करें।
  • न्यायालय ने जलवायु आपदाओं या जलवायु परिवर्तन के अन्य प्रभावों से पीड़ित देशों को पूर्ण क्षतिपूर्ति प्रदान करने को विधिक दायित्व के रूप में शामिल किया है।
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निजी व्यवसायों या निगमों के गैर-ज़िम्मेदाराना कार्यों के लिए भी देशों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, यदि वे : 
    • उचित सावधानी बरतने में विफल रहे 
    • निजी कर्ताओं के गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार को रोकने के लिए पर्याप्त नियामक या विधायी उपाय नहीं करते हैं।

निर्णय के निहितार्थ

  • यह निर्णय स्पष्ट करता है कि जलवायु कार्रवाई अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रतिबद्धता है। 
  • यह निर्णय न्यायालय की एक सलाहकार राय के रूप में आया है और इसका किसी भी देश पर तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा। 
    • हालाँकि, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक संघर्ष में यह महत्त्वपूर्ण हो सकता है।
    • यह जलवायु परिवर्तन तथा इसके प्रभाव के विषय पर अंतर्राष्ट्रीय कानून की सबसे प्रामाणिक व्याख्या है और दुनिया भर की अदालतें अपने समक्ष आने वाले मामलों पर निर्णय लेने में इसका उपयोग कर सकती हैं।
  • इस फैसले ने जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में उल्लिखित प्रावधानों और सिद्धांतों की कानूनी वैधता की पुष्टि की है तथा घोषित किया है कि इनका पालन न करने पर देशों पर जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • विकासशील देशों और समृद्ध एवं औद्योगिक दुनिया से जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा देने की वकालत करने वाले अन्य सभी देशों की स्थिति को मजबूत करने के दृष्टिकोण से यह निर्णय महत्त्वपूर्ण है।
  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने जलवायु कानूनों में हानि एवं क्षति की अवधारणा का समर्थन किया है जो विकसित देशों से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से उबरने में मदद के लिए वित्तीय व अन्य सहायता जुटाने में अग्रणी भूमिका निभाने का आह्वान करता है। 

निष्कर्ष

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का फैसला जलवायु शासन में एक ऐतिहासिक कदम है जो संभावित रूप से वैश्विक जलवायु जवाबदेही को बदल सकता है और जलवायु न्याय को बढ़ावा दे सकता है।

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