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भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति एवं प्रगति, 2024–25 रिपोर्ट

(प्रारंभिक परीक्षा: आर्थिक एवं सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास व रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ 

  • भारतीय रिज़र्व बैंक की नवीनतम ‘भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति एवं प्रगति, 2024–25’ रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि न्यूनतम गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA), मजबूत होती पूंजी और व्यापक डिजिटल व वित्तीय समावेशन के चलते देश की बैंकिंग प्रणाली पहले से कहीं अधिक लचीली एवं आत्मविश्वासी बन चुकी है। 
  • यह रिपोर्ट आंकड़ों के संकलन के साथ-साथ बल्कि बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के प्रदर्शन, जोखिमों, विनियामक प्राथमिकताओं, भुगतान प्रणालियों, तकनीकी समायोजन व उपभोक्ता संरक्षण का एक समग्र मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। 

बैलेंस शीट का विस्तार: विकास की स्पष्ट तस्वीर

  • रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) की बैलेंस शीट में उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला है। जमा एवं ऋण दोनों में दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज की गई, हालाँकि, हाल के महीनों में गति में कुछ नरमी दिखाई देती है। 
  • बैंक ऋण में लगभग 14-16% की वृद्धि उद्योग, एम.एस.एम.ई., आवास व सेवा क्षेत्रों से मजबूत मांग को दर्शाती है। वहीं जमा में 12-13% की बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि वैकल्पिक निवेश विकल्पों के बावजूद जनता का भरोसा औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था पर बना हुआ है। 

परिसंपत्ति गुणवत्ता

  • भारतीय बैंकिंग की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक परिसंपत्ति गुणवत्ता में आया सुधार है। सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (GNPA) का अनुपात घटकर लगभग 2.1% पर आ गया है जो कई दशकों में सबसे निचला स्तर है। यह सुधार बेहतर ऋण अनुशासन, सतर्क अंडरराइटिंग एवं प्रभावी वसूली तंत्र का परिणाम है।
  • इसके साथ ही, बैंक पर्याप्त रूप से पूंजीकृत हैं। पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR) औसतन 16% से ऊपर बना हुआ है जो बेसल-III की न्यूनतम आवश्यकता से काफी अधिक है और संभावित आघातों को झेलने की क्षमता को दर्शाता है।

डिजिटल एवं वित्तीय समावेशन की नई ऊँचाइयाँ 

  • डिजिटल भुगतान : डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन के मोर्चे पर भी प्रगति उल्लेखनीय रही है। देश के 514 जिले पूरी तरह डिजिटल रूप से सक्षम हो चुके हैं जहाँ प्रत्येक पात्र व्यक्ति के पास कम-से-कम एक डिजिटल भुगतान माध्यम उपलब्ध है।
    • आर.बी.आई. का वित्तीय समावेशन सूचकांक बढ़कर 67 तक पहुँच गया है जो खातों, ऋण, बीमा एवं डिजिटल भुगतान तक गहरी व व्यापक पहुँच को दर्शाता है। यह प्रगति केवल संख्या तक सीमित नहीं है बल्कि वित्तीय सेवाओं के उपयोग में भी वृद्धि का संकेत देती है। 
  • PRAVAAH पोर्टल : नियामकीय आवेदनों के लिए एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में PRAVAAH पोर्टल की शुरुआत की गई है। इसका उद्देश्य विभिन्न अनुमतियों एवं मंजूरियों की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी व समयबद्ध बनाना है। 
  • FREE-AI फ्रेमवर्क: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए आरबीआई ने FREE-AI फ्रेमवर्क पेश किया है। यह निष्पक्षता, जवाबदेही, सुरक्षा एवं पारदर्शिता जैसे सिद्धांतों पर आधारित शासन दिशानिर्देश प्रदान करता है जिससे एआई आधारित प्रणालियों में विश्वास व जवाबदेही बनी रहे।
  • जोखिम-आधारित जमा बीमा: एक समान प्रीमियम व्यवस्था से आगे बढ़ते हुए जोखिम-आधारित जमा बीमा की दिशा में कदम उठाया गया है। यह पहल बैंकों को बेहतर जोखिम प्रबंधन के लिए प्रेरित करती है और संपूर्ण बैंकिंग प्रणाली में जमाकर्ताओं के भरोसे को और मजबूत बनाती है।
  • यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस (ULI): यू.एल.आई. एक प्रौद्योगिकी-आधारित पहल है जिसका उद्देश्य प्रत्येक भारतीय को निर्बाध ऋण उपलब्ध कराना और सरकार के डिजिटल सशक्तिकरण, वित्तीय समावेशन एवं अंतिम छोर तक सेवा वितरण के व्यापक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना है।

यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस (ULI) की विशेषताएँ

  • यू.एल.आई. ऋणदाताओं को भूमि अभिलेखों जैसी महत्वपूर्ण जानकारी शीघ्रता से प्राप्त करने में मदद करेगा, जिससे ऋण स्वीकृति में तेजी आएगी और कागजी कार्रवाई कम होगी।
  • यह प्लेटफॉर्म विशेष रूप से छोटे व्यवसायों और ग्रामीण उधारकर्ताओं के लिए उपयोगी है।
  • JAM एवं UPI के साथ-साथ ULI भारत में डिजिटल बैंकिंग पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने का एक हिस्सा है। 

नियामकीय सुधार: जोखिम आधारित जमा बीमा

  • रिपोर्ट का एक अहम नीतिगत संकेत जोखिम-आधारित जमा बीमा प्रीमियम की ओर बढ़ना है। 
  • एक समान प्रीमियम प्रणाली से हटकर यह व्यवस्था बैंकों को बेहतर जोखिम प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित करेगी और पूरी प्रणाली में विश्वास को मजबूत बनाएगी। 

उभरती चुनौतियाँ: विकास के साथ जोखिम

  • डिजिटल बैंकिंग और यू.पी.आई. के विस्तार के साथ साइबर धोखाधड़ी एवं ऑनलाइन फ्रॉड का जोखिम बढ़ा है। इसके अलावा ऋण, कार्ड एवं डिजिटल चैनलों से जुड़ी ग्राहकों की शिकायतों में वृद्धि सेवा गुणवत्ता व शिकायत निवारण तंत्र की कमजोरियों की ओर संकेत करती है।
  • एआई-आधारित क्रेडिट और धोखाधड़ी पहचान प्रणालियों में पारदर्शिता, पूर्वाग्रह एवं डेटा गोपनीयता से जुड़े जोखिम भी उभर रहे हैं। वहीं, कुछ असुरक्षित और छोटे मूल्य वाले खुदरा ऋण सेगमेंट में तनाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। 

आगे की राह: गुणवत्ता, सुरक्षा एवं विश्वास

  • रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि आगे की सफलता केवल तेज ऋण वृद्धि से नहीं, बल्कि गुणवत्ता-आधारित विकास से आएगी। सख्त अंडरराइटिंग, मजबूत उपभोक्ता संरक्षण, साइबर सुरक्षा में निरंतर निवेश और लक्षित वित्तीय साक्षरता अभियानों की आवश्यकता होगी।
  • ग्रामीण क्षेत्रों, वरिष्ठ नागरिकों और पहली बार डिजिटल सेवाओं का उपयोग करने वालों के लिए जागरूकता बढ़ाना उतना ही जरूरी है जितना तकनीक का विस्तार।

निष्कर्ष

आर.बी.आई. की यह रिपोर्ट दर्शाती है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली न्यूनतम एन.पी.ए., सुदृढ़ पूँजी और बढ़ती बैलेंस शीट के साथ आज एक मजबूत आधार पर खड़ी है। आने वाले वर्षों में टिकाऊ सफलता की कुंजी विश्वास आधारित तकनीकी अपनाने, पारदर्शी ग्राहक संरक्षण एवं संतुलित विनियमन में निहित है। 

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