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अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र का दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय केंद्र

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आगरा के सिंगना में अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र (CIP) के दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय केंद्र (CSARC) की स्थापना को मंजूरी प्रदान की है।

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय केंद्र (CSARC) के प्रमुख उद्देश्य 

  • उच्च उत्पादन वाली एवं जलवायु-अनुकूल किस्मों का विकास : यह केंद्र उच्च उपज देने वाली, जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीली एवं पोषक तत्वों से भरपूर आलू व शकरकंद की किस्मों पर अनुसंधान करेगा। 
    • इससे न केवल उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने में भी मदद मिलेगी।
  • खाद्य एवं पोषण सुरक्षा : आलू एवं शकरकंद पोषक तत्वों से भरपूर फसलें हैं। इनकी बेहतर किस्मों के विकास से भारत व दक्षिण एशिया में कुपोषण की समस्या से निपटने में सहायता मिलेगी।
  • किसानों की आय में वृद्धि : मूल्यवर्धन एवं बेहतर कटाई के उपरांत प्रबंधन के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त होगा।
  • रोजगार सृजन : इससे आलू उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, जिससे ग्रामीण व शहरी दोनों क्षेत्रों में आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।
  • क्षेत्रीय सहयोग : CSARC दक्षिण एशियाई देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देगा, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर कृषि नवाचार व खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।

भारत में आलू उत्पादन की वर्तमान स्थिति 

  • वैश्विक स्थिति : वैश्विक आलू उत्पादन में चीन (93 मिलियन मीट्रिक टन) के बाद भारत (60 मिलियन मीट्रिक टन) का दूसरा स्थान है।
  • प्रमुख आलू उत्पादक राज्य : उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा (30%) आलू उत्पादक राज्य है। इसके बाद पश्चिम बंगाल (24%) और बिहार (18%) हैं।
    • उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में आलू का सर्वाधिक उत्पादन होता है।

अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र

  • स्थापना : इसकी स्थापना वर्ष 1971 में आलू, शकरकंद एवं एंडियन जड़ों (Andean Roots) और कंदों पर ध्यान केंद्रित करने वाले अनुसंधान-विकास संगठन के रूप में की गई थी।
  • मुख्यालय : लीमा (पेरू)
  • कार्य : यह किफायती पौष्टिक भोजन तक पहुँच बढ़ाने, समावेशी टिकाऊ व्यवसाय एवं रोजगार वृद्धि को बढ़ावा देने और जड़ व कंद कृषि-खाद्य प्रणालियों की जलवायु लचीलापन को बढ़ावा देने के लिए अभिनव विज्ञान-आधारित समाधान प्रदान करता है। 

क्या आप जानते हैं?

आलू की उत्पत्ति 8,000 वर्ष पूर्व दक्षिण अमेरिका के एंडीज क्षेत्र में हुई थी। 16वीं सदी में पुर्तगालियों द्वारा इसे यूरोप लाया गया और वहाँ से यह भारत सहित विश्वभर में फैला।

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