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इंटरनेट शटडाउन : राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और विधिक संतुलन की चुनौती

संदर्भ 

हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी के मध्य दिल्ली क्षेत्र में एक राजनीतिक विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रशासन द्वारा सुरक्षा और जन-व्यवस्था का हवाला देते हुए डिजिटल ब्लैकआउट (मोबाइल इंटरनेट सेवाओं का निलंबन) लागू किया गया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट सेवाओं को निलंबित किया जाना डिजिटल अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य के प्रशासनिक विवेकाधिकार के मध्य संतुलन पर एक गंभीर बहस को जन्म देता है।  

इंटरनेट शटडाउन की अवधारणा 

  • वेब अधिकार संगठन एक्सेस नाउ (Access Now) के अनुसार, इंटरनेट शटडाउन वह स्थिति है जिसमें किसी विशिष्ट क्षेत्र या समुदाय के लिए इंटरनेट अथवा इलेक्ट्रॉनिक संचार सेवाओं को जानबूझकर बाधित या निष्प्रभावी बना दिया जाता है, ताकि सूचना के प्रवाह को नियंत्रित किया जा सके। यह पूर्ण इंटरनेट बंदी, इंटरनेट की गति को सीमित (थ्रॉटलिंग) करने अथवा विशिष्ट डिजिटल मंचों को अवरुद्ध करने जैसे विभिन्न रूपों में लागू किया जा सकता है। 
  • सामान्यतः सरकारें राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों, बड़े जनसमूहों के एकत्रीकरण, सांप्रदायिक तनाव, हिंसक घटनाओं अथवा संवेदनशील धार्मिक आयोजनों के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से ऐसे कदम उठाती हैं।

इंटरनेट सेवाओं के निलंबन का विधिक आधार 

  • दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20(2)(b) के अनुसार, दूरसंचार सेवाओं को केवल सार्वजनिक आपातकाल अथवा लोक सुरक्षा के हित में ही निलंबित किया जा सकता है। ऐसा आदेश लिखित कारणों के आधार पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया जाना आवश्यक है। 
  • अधिवक्ता एवं इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक अपार गुप्ता के अनुसार, मात्र किसी विरोध प्रदर्शन का आयोजन इंटरनेट बंद करने का वैध आधार नहीं हो सकता। किसी भी निलंबन आदेश को सार्वजनिक व्यवस्था जैसे वैध उद्देश्य की पूर्ति करनी चाहिए तथा वह आवश्यक, तर्कसंगत, सीमित क्षेत्र एवं सीमित अवधि का होना चाहिए। साथ ही, सरकार को यह भी परीक्षण करना होगा कि क्या कम प्रतिबंधात्मक वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हैं।

इंटरनेट शटडाउन का वर्तमान विधिक ढांचा 

  • पूर्व में इंटरनेट सेवाओं का निलंबन भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा 5(2) तथा दूरसंचार सेवाओं के अस्थायी निलंबन नियम, 2017 के अंतर्गत नियंत्रित होता था। वर्तमान में इन्हें दूरसंचार अधिनियम, 2023 तथा दूरसंचार (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024 द्वारा प्रतिस्थापित किया जा चुका है। 
  • नवीन नियमों के अनुसार प्रत्येक निलंबन आदेश का सार्वजनिक रूप से प्रकाशित होना अनिवार्य है। आदेश में तिथि, समय, प्रभावी अवधि, प्रभावित क्षेत्र तथा निलंबन के कारणों का स्पष्ट उल्लेख किया जाना आवश्यक है, जिससे पारदर्शिता, उत्तरदायित्व एवं न्यायिक समीक्षा सुनिश्चित हो सके। 
  • हालाँकि, विभिन्न अध्ययनों से यह तथ्य सामने आया है कि कुछ राज्य सरकारें अब भी पुराने टेलीग्राफ अधिनियम एवं 2017 के नियमों का हवाला देते हुए इंटरनेट बंदी के आदेश जारी कर रही हैं। इससे 2024 के नियमों द्वारा प्रदान किए गए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

भारत में इंटरनेट शटडाउन की स्थिति 

  • भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ इंटरनेट शटडाउन की घटनाएँ सर्वाधिक दर्ज की जाती हैं। एक्सेस नाउ की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में 12 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 65 इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए गए। यद्यपि यह संख्या पूर्व वर्षों की तुलना में कम है, फिर भी संवैधानिक लोकतंत्र के संदर्भ में यह चिंताजनक मानी जाती है। 
  • एसएफएलसी इंटरनेट शटडाउन ट्रैकर के अनुसार, वर्ष 2012 से अब तक सर्वाधिक इंटरनेट बंदी जम्मू-कश्मीर में दर्ज की गई है, जिसके बाद राजस्थान और मणिपुर का स्थान आता है। वर्ष 2026 में भी जुलाई तक लगभग 24 इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए जा चुके हैं।   

सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण 

  • अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट तक पहुँच संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत व्यापार एवं व्यवसाय की स्वतंत्रता से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। 

इंटरनेट शटडाउन की वैधता 

न्यायालय ने निर्देश दिया कि इंटरनेट शटडाउन तभी वैध होगा जब वह - 

  • विधि द्वारा अधिकृत हो,
  • वैध सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति करता हो,
  • आवश्यकता एवं आनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन करता हो,
  • उपलब्ध विकल्पों में सबसे कम प्रतिबंधात्मक उपाय हो,
  • सीमित क्षेत्र एवं सीमित अवधि के लिए लागू किया गया हो,
  • कारणयुक्त एवं सार्वजनिक रूप से प्रकाशित आदेश पर आधारित हो। 

वस्तुतः न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अनिश्चितकालीन इंटरनेट शटडाउन असंवैधानिक है तथा प्रत्येक निलंबन आदेश की पाँच कार्यदिवसों के भीतर बहु-सदस्यीय समीक्षा समिति द्वारा समीक्षा की जानी चाहिए। 

क्या ऐसे आदेशों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है ? 

  • इंटरनेट निलंबन के आदेशों को संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय तथा उपयुक्त मामलों में अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। वस्तुतः न्यायालय यह परीक्षण करते हैं कि आदेश विधिसम्मत, आवश्यक, आनुपातिक तथा सीमित क्षेत्र एवं अवधि वाला है या नहीं।
  • इसके अतिरिक्त, 2024 के नियमों के अनुसार कोई भी इंटरनेट निलंबन आदेश 15 दिनों से अधिक प्रभावी नहीं रह सकता।

प्रमुख चुनौतियाँ 

  • सार्वजनिक सुरक्षा और मौलिक अधिकारों के मध्य संतुलन स्थापित करना।
  • इंटरनेट बंदी के आदेशों में पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना।
  • पुराने विधिक प्रावधानों के स्थान पर नवीन कानूनों का प्रभावी अनुपालन।
  • डिजिटल अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं एवं आपातकालीन संचार पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को न्यूनतम करना।
  • न्यायिक निर्देशों एवं समीक्षा तंत्र का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना। 

निष्कर्ष 

  • डिजिटल युग में इंटरनेट केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि शिक्षा, व्यापार, प्रशासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आधार बन चुका है। इसलिए इंटरनेट शटडाउन को सामान्य प्रशासनिक उपाय के रूप में नहीं, बल्कि अंतिम और अपवादात्मक विकल्प के रूप में ही अपनाया जाना चाहिए। 
  • राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा निस्संदेह राज्य का दायित्व है, किंतु यह दायित्व संवैधानिक मूल्यों, विधिक प्रक्रिया, पारदर्शिता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं के अनुरूप ही निभाया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों तथा दूरसंचार अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का कठोर अनुपालन ही सुरक्षा और स्वतंत्रता के मध्य संतुलित लोकतांत्रिक व्यवस्था सुनिश्चित कर सकता है। 
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