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खादी: नवाचार, वहनीयता और भारत का टेक्सटाइल पुनरुत्थान

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, भारत का इतिहास और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1 व 3: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय; संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

परिचय 

भारत का प्रसिद्ध हाथ से कताई व बुनाई वाला कपड़ा ‘खादी’ विरासत, वहनीयता और ग्रामीण आजीविका के संगम का प्रतीक है। अपनी प्राचीन सभ्यता की जड़ों और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी केंद्रीय भूमिका से लेकर एक प्रीमियम, पर्यावरण-सचेत टेक्सटाइल के रूप में समकालीन पुनरुद्धार तक खादी भारत की विकसित होती विकास गाथा को दर्शाती है। जलवायु परिवर्तन, नैतिक उपभोग एवं समावेशी विकास के संदर्भ में खादी सतत विकास के एक स्तंभ के रूप में फिर से उभरी है।

खादी: अवधारणा और महत्व

  • खादी (खद्दर) हाथ से काता और बुना हुआ एक कपड़ा है जो कपास, रेशम, ऊन या मिश्रण जैसे प्राकृतिक रेशों से बनाया जाता है। भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में इसका उद्भव हुआ है जिसमें आज का बांग्लादेश भी शामिल है।
  • खादी की विशेषताएँ हैं-
    • हवादार और आरामदायक
    • बहुमुखी तापीय उपयोग (गर्मियों में ठंडा, सर्दियों में गर्म)
    • अत्यंत निम्न कार्बन फुटप्रिंट
    • विकेन्द्रीकृत, गांव-आधारित उत्पादन
  • एक टेक्सटाइल होने के अलावा खादी ग्रामीण रोजगार का सृजन करती है, महिला कारीगरों को सशक्त बनाती है और संसाधन-गहन फास्ट फैशन का एक स्थायी विकल्प प्रदान करती है।

खादी का ऐतिहासिक विकास

  • प्राचीन और मध्यकालीन जड़ों के रूप में मोहनजोदारो से मिले पुरातात्विक निष्कर्ष खादी जैसे हाथ से बुने हुए वस्त्रों की उपस्थिति का सुझाव देते हैं।
  • मौर्य काल के दौरान खादी जैसे सूती कपड़ों का आर्थिक महत्व था, जिसमें चाणक्य के अर्थशास्त्र में संगठित वस्त्र उत्पादन का संदर्भ दिया गया है।
  • अजंता गुफाओं में मिले चित्र भारत की हाथ से काते और बुने हुए कपड़ों की लंबी परंपरा को आधिक पुष्ट करते हैं।
  • स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान खादी ने वर्ष 1918 में आधुनिक राजनीतिक महत्व प्राप्त किया, जब महात्मा गांधी ने ग्रामीण गरीबी को दूर करने और औपनिवेशिक आर्थिक शोषण का विरोध करने के लिए खादी आंदोलन शुरू किया।
  • चरखा स्वदेशी, आत्मनिर्भरता एवं राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रतीक बन गया, जिसमें खादी ने सादगी, अनुशासन व श्रम की गरिमा के गांधीवादी मूल्यों को मूर्त रूप दिया।

आज़ादी के बाद संस्थागत सहायता

  • आज़ादी के बाद इस सेक्टर को खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC), 1957 के ज़रिए संस्थागत बनाया गया। KVIC के कार्यों में शामिल हैं:
    • कच्चे माल की आपूर्ति करना
    • उत्पादन तकनीकों में सुधार करना
    • गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित करना
    • विपणन एवं बिक्री को बढ़ावा देना
    • टिकाऊ ग्रामीण रोज़गार सृजित करना
  • इसके बावजूद खादी धीरे-धीरे मुख्यधारा की अपील खोती गई और राजनीतिक पहनावे व पुराने फैशन से जुड़ गई तथा वर्ष 1980 के दशक के अंत तक यह काफी हद तक समकालीन फैशन से बाहर रही।

डिजाइनर के नेतृत्व में पुनरुद्धार

  • 1980 के दशक के आखिर से 1990 के दशक तक पुनरुद्धार का दौर रहा। देविका भोजवानी (1989) और रितु कुमार (1990) जैसे डिजाइनरों ने निम्न नवाचार प्रस्तुत किया-
    • नवीन बनावट और रंगाई तकनीकें
    • समकालीन पैटर्न और छायाकृति 
    • फैशन-फॉरवर्ड समझ 
  • हालांकि, शुरुआती प्रभाव सीमित था किंतु इन प्रयासों ने खादी को एक प्रीमियम, कारीगरी एवं टिकाऊ कपड़े के रूप में फिर से स्थापित किया, जिससे यह प्रामाणिकता व पर्यावरण के प्रति जागरूक फैशन की बढ़ती मांग के साथ जुड़ गया।

सामग्री और तकनीकी नवाचार

  • हालिया पुनरुत्थान सामग्री एवं प्रक्रिया नवाचार से प्रेरित हैं जिसमें टिकाऊपन, ड्रेप एवं कार्यक्षमता में सुधार के लिए लिनन, बांस, सन, टेन्सेल व रेशम के साथ मिश्रण और कम प्रभाव वाले रंगों तथा पर्यावरण अनुकूल फिनिशिंग तकनीकों का उपयोग शामिल है।
  • मुख्य तकनीकी हस्तक्षेपों में बेहतर चरखे व एर्गोनोमिक करघे, सौर ऊर्जा से चलने वाली रंगाई इकाइयाँ और प्री-प्रोसेसिंग तथा गुणवत्ता बढ़ाने वाले उपकरण शामिल हैं। 
  • ये उपाय मेहनत में कमी लाते हैं, उत्पादकता बढ़ाते हैं और बड़े पैमाने पर उत्पादन को सक्षम करते हुए हस्तनिर्मित स्थिति को बनाए रखते हैं।

वैश्विक फैशन और स्थिरता के संदर्भ में खादी

  • वैश्विक फैशन उद्योग का मूल्य लगभग 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। इसमें 300 मिलियन से अधिक लोग कार्यरत हैं और यह दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में से एक है। 
  • वर्ष 2030 तक इस क्षेत्र में पानी की खपत में 50% की वृद्धि, कार्बन उत्सर्जन में 63% की वृद्धि और कचरा उत्पादन 148 मिलियन टन तक होने की संभावना है। 
  • अनुमानत: 59.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2022) वाला भारत का परिधान बाज़ार दुनिया का छठा सबसे बड़ा बाज़ार है जो तेज़ी से शहरीकरण, बढ़ती आय, डिजिटल खुदरा एवं किफायती आकांक्षात्मक फैशन की मांग से प्रेरित है। 
  • इस संदर्भ में खादी एक बेहतरीन विकल्प प्रदान करता है जो बिजली का कम इस्तेमाल, अति निम्न कार्बन फुटप्रिंट, प्राकृतिक फाइबर व रंग, कारीगरों पर आधारित आपूर्ति शृंखला प्रदान करता है। 

खादी बाज़ार का विकास: मुख्य डेटा

  • खादी एवं ग्रामोद्योग ने वर्ष 2024-25 में 1.70 लाख करोड़ रुपए के टर्नओवर के साथ एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उत्पादन 26,109.07 करोड़ रुपए (2013-14) से बढ़कर 1,16,599.75 करोड़ रुपए (2024-25) हो गया है जो 347% की वृद्धि है। 
  • बिक्री 31,154.19 करोड़ रुपए से बढ़कर 1,70,551.37 करोड़ रुपये हो गई है जो 447% की वृद्धि है। रोजगार में 49.23% की वृद्धि हुई है जिससे 1.94 करोड़ लोगों को सहारा मिला है।
  • खादी कपड़ों का उत्पादन 366% बढ़कर 3,783.36 करोड़ रुपए हो गया और खादी कपड़ों की बिक्री छह गुना बढ़कर 7,145.61 करोड़ रुपए हो गई है। 
  • खादी ग्रामोद्योग भवन, नई दिल्ली ने 110.01 करोड़ रुपए का टर्नओवर हासिल किया और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) ने 10 लाख से ज़्यादा यूनिट्स को सुविधा दी, जिससे 90 लाख लोगों को रोज़गार मिला। 
  • महिला सशक्तिकरण- 
    • 7.43 लाख प्रशिक्षुओं में से 57.45% महिलाएँ थीं। 
    • खादी कारीगरों में 80% महिलाएं हैं। 
    • 11 वर्ष में कारीगरों की मज़दूरी में 275% की वृद्धि हुई है।

खादी क्षेत्र के समक्ष चुनौतियाँ और आगे की राह 

चुनौतियाँ

आगे की राह

सस्ते व मशीन से बने कपड़ों से मुकाबला

प्रामाणिकता खोए बिना नवाचार

अधिक उत्पादन लागत व सीमित विस्तार

सांस्कृतिक अखंडता के साथ डिज़ाइन आधुनिकीकरण

अपर्याप्त ब्रांडिंग, मार्केटिंग व इंफ्रास्ट्रक्चर

कारीगरों के कल्याण को केंद्र में रखकर बाज़ार का विस्तार

मौसमी मांग के पैटर्न

मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और वोकल फॉर लोकल जैसी पहलों के साथ तालमेल भारत के विकास की चर्चा में खादी की प्रासंगिकता को मज़बूत करता है।

तेज़ी से बदलता फैशन पैटर्न 

मांग समूह के अनुसार नए फैशन को अपनाना  

वैश्विक प्रतिस्पर्धा व आपूर्ति शृंखला की सीमाएँ

वैश्विक स्तर पर प्रचार और स्थानीय आपूर्ति शृंखला पर भरोसा 

निष्कर्ष

कभी प्रतिरोध और ग्रामीण सशक्तिकरण का प्रतीक रही खादी, अब स्थायी विकास, समावेशी विकास व सांस्कृतिक पहचान के एक स्तंभ के रूप में फिर से उभरी है। नीतिगत समर्थन, डिज़ाइन इनोवेशन और पर्यावरणीय जागरूकता से समर्थित यह परंपरा व आधुनिकता के बीच एक पुल का काम करती है। लगातार सुधारों और बाज़ार एकीकरण के साथ खादी भारत की कपड़ा विरासत को संरक्षित कर सकती है और नैतिक एवं स्थायी फैशन के भविष्य का नेतृत्व कर सकती है।

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