भविष्य निधि, पेंशन और ग्रेच्युटी अब केवल सेवानिवृत्ति लाभ नहीं रहे हैं। वे श्रमिकों के लिए वित्तीय सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं। ये साधन श्रमिकों को बचत संचय, जीवन-चक्र से जुड़े जोखिमों के प्रबंधन और रोजगार परिवर्तन के समय आय-संकट से निपटने में सहायक बनाते हैं।
इन सुधारों के कारण विशेष रूप से बड़े कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों पर वित्तीय दायित्व बढ़ेंगे किन्तु यह अतिरिक्त व्यय सीधे श्रमिकों की आय-सुरक्षा, क्रय-शक्ति और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में विस्तार के रूप में परिवर्तित होगा। इससे आर्थिक संतुलन में सुधार आएगा।
सामाजिक सुरक्षा के विस्तार से घरेलू मांग में वृद्धि होगी, बचत दर सुदृढ़ होगी और आय संबंधी असुरक्षा में कमी आएगी। यह परिवर्तन पूंजी और श्रम के बीच मूल्य-वितरण को अधिक संतुलित बनाता है तथा रोजगार संबंधों में स्थायित्व व गरिमा को बढ़ावा देता है।
वेतन संहिता समान वेतन परिभाषा को लागू करती है, न्यूनतम वेतन की गारंटी देती है, अनुचित कटौतियों पर रोक लगाती है और समय पर भुगतान सुनिश्चित करती है। इन उपायों से आय अधिक स्थिर होती है और श्रमिकों की औपचारिक अर्थव्यवस्था में भागीदारी बढ़ती है।
जब आय का बड़ा हिस्सा श्रमिकों तक पहुँचता है तो उनकी क्रय-शक्ति बढ़ती है। इससे घरेलू उपभोग में वृद्धि होती है और बचत व्यवहार में सुधार आता है। श्रमिकों की आय प्रायः देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था में पुनः प्रवाहित होती है, जिससे मांग-आधारित विकास को प्रोत्साहन मिलता है।
आय-सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा का विस्तार आर्थिक अस्थिरता को कम करता है। यह व्यवस्था अर्थव्यवस्था को बाहरी या आंतरिक झटकों के प्रति अधिक लचीला बनाती है। इस प्रकार, श्रम संहिताएँ समावेशी और स्थायी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण साधन सिद्ध हो सकती हैं।
पूर्व के श्रम कानून बहुस्तरीय एवं जटिल थे। उन्हें चार व्यापक श्रम संहिताओं में समेकित करने से अनुपालन सरल हुआ है और नियामक ढाँचा अधिक पारदर्शी बना है। यह बदलाव श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों के लिए स्पष्टता व पूर्वानुमेयता प्रदान करता है।
कुछ संगठनों ने इन सुधारों का विरोध किया है किंतु व्यापक आलोचना प्राय: उन श्रमिक-पक्षीय प्रावधानों को अनदेखा कर देती है जो इन संहिताओं में निहित हैं। यद्यपि क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ मौजूद हैं परंतु सुधारों के संभावित लाभों को समझे बिना उनका पूर्ण विरोध करना उचित नहीं माना जा सकता है।
श्रम संहिताएँ केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं हैं। वे ग्रेच्युटी के विस्तार, सामाजिक सुरक्षा कवरेज की वृद्धि और कानूनी अपवर्जनों को समाप्त कर श्रमिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ती हैं। इससे आर्थिक मूल्य का वितरण श्रम के पक्ष में अधिक संतुलित होता है।
इन सुधारों का मूल उद्देश्य आर्थिक प्रगति को सामाजिक न्याय से जोड़ना है। आय-सुरक्षा और वित्तीय गरिमा को सुदृढ़ कर वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि विकास का लाभ प्रत्येक श्रमिक तक पहुँचे। इनकी सफलता अंततः प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी, जिससे भारत की विकास यात्रा अधिक समावेशी और संतुलित बन सके।
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