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श्रम संहिताएँ: वेतन पुनर्परिभाषा के माध्यम से श्रमिक सशक्तिकरण

संदर्भ 

  • भारत में लागू की गई नई श्रम संहिताएँ श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय समावेशन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक संरचनात्मक सुधार का संकेत देती हैं। बिखरे एवं जटिल श्रम कानूनों को एकीकृत कर इन्हें अधिक आधुनिक, पारदर्शी एवं संगठित ढाँचे में परिवर्तित किया गया है। इनका उद्देश्य केवल प्रशासनिक सरलीकरण नहीं है, बल्कि रोजगार व्यवस्था में आय-सुरक्षा, दीर्घकालिक संरक्षण एवं सामाजिक कल्याण को स्थायी रूप से शामिल करना है।
  • यद्यपि कुछ ट्रेड यूनियनों ने इन सुधारों के विरुद्ध आंदोलन और हड़ताल का आह्वान किया है, फिर भी इनका मूल लक्ष्य उन श्रमिक वर्गों को औपचारिक वित्तीय एवं सामाजिक सुरक्षा ढाँचे से जोड़ना है जो अब तक इससे वंचित रहे थे। इससे आर्थिक विकास के लाभों का अधिक संतुलित वितरण संभव हो सकेगा। 

वेतन की नई परिभाषा: सुरक्षा का आधार 

50 प्रतिशत वेतन मानदंड

  • नई व्यवस्था में ‘वेतन’ की परिभाषा को पुनःनिर्धारित किया गया है। अब यह अनिवार्य कर दिया गया है कि मूल वेतन, महंगाई भत्ता एवं रिटेनिंग भत्ता मिलकर कुल पारिश्रमिक का न्यूनतम 50% हों।
  • पहले कई नियोक्ता इस हिस्से को कम रखकर भविष्य निधि और अन्य सामाजिक सुरक्षा योगदान को सीमित कर देते थे।
  • नई व्यवस्था से भविष्य निधि (PF), पेंशन और ग्रेच्युटी में अधिक अंशदान सुनिश्चित होगा, जिससे श्रमिकों को दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता प्राप्त होगी। 

निश्चित अवधि के कर्मचारियों को ग्रेच्युटी 

  • श्रम बाजार की बदलती प्रकृति को ध्यान में रखते हुए अब निश्चित अवधि के कर्मचारियों को भी एक वर्ष की सेवा के पश्चात ग्रेच्युटी का लाभ मिलेगा।
  • पूर्व में ऐसे कर्मचारी सेवा समाप्ति पर किसी अंतिम वित्तीय लाभ से वंचित रह जाते थे। अब यह प्रावधान अल्पकालिक रोजगार को भी बचत एवं परिसंपत्ति निर्माण का साधन बना देता है। 

सामाजिक सुरक्षा से वित्तीय समावेशन तक 

भविष्य निधि, पेंशन और ग्रेच्युटी अब केवल सेवानिवृत्ति लाभ नहीं रहे हैं। वे श्रमिकों के लिए वित्तीय सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं। ये साधन श्रमिकों को बचत संचय, जीवन-चक्र से जुड़े जोखिमों के प्रबंधन और रोजगार परिवर्तन के समय आय-संकट से निपटने में सहायक बनाते हैं। 

नियोक्ता व्यय और श्रमिक हित 

इन सुधारों के कारण विशेष रूप से बड़े कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों पर वित्तीय दायित्व बढ़ेंगे किन्तु यह अतिरिक्त व्यय सीधे श्रमिकों की आय-सुरक्षा, क्रय-शक्ति और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में विस्तार के रूप में परिवर्तित होगा। इससे आर्थिक संतुलन में सुधार आएगा। 

व्यापक आर्थिक परिणाम 

सामाजिक सुरक्षा के विस्तार से घरेलू मांग में वृद्धि होगी, बचत दर सुदृढ़ होगी और आय संबंधी असुरक्षा में कमी आएगी। यह परिवर्तन पूंजी और श्रम के बीच मूल्य-वितरण को अधिक संतुलित बनाता है तथा रोजगार संबंधों में स्थायित्व व गरिमा को बढ़ावा देता है। 

समष्टि अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: समावेशी विकास की ओर 

सामाजिक सुरक्षा का दायरा विस्तृत 

  • नई श्रम संहिताएँ सामाजिक सुरक्षा को संगठित क्षेत्र तक सीमित नहीं रखतीं हैं, बल्कि गिग, प्लेटफॉर्म व असंगठित श्रमिकों को भी इसमें सम्मिलित करती हैं।
  • पहली बार इन वर्गों को कानूनी मान्यता प्रदान की गई है जिससे वे बीमा, भविष्य निधि और अन्य कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच बना सकेंगे।
  • लाभों की पोर्टेबिलिटी—अर्थात राज्य या नौकरी बदलने पर भी अधिकार का सुरक्षित रहना—विशेष रूप से प्रवासी और असंगठित श्रमिकों के लिए महत्वपूर्ण है। 

आय की स्थिरता और विधिक संरक्षण 

वेतन संहिता समान वेतन परिभाषा को लागू करती है, न्यूनतम वेतन की गारंटी देती है, अनुचित कटौतियों पर रोक लगाती है और समय पर भुगतान सुनिश्चित करती है। इन उपायों से आय अधिक स्थिर होती है और श्रमिकों की औपचारिक अर्थव्यवस्था में भागीदारी बढ़ती है। 

मांग आधारित विकास को बल 

जब आय का बड़ा हिस्सा श्रमिकों तक पहुँचता है तो उनकी क्रय-शक्ति बढ़ती है। इससे घरेलू उपभोग में वृद्धि होती है और बचत व्यवहार में सुधार आता है। श्रमिकों की आय प्रायः देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था में पुनः प्रवाहित होती है, जिससे मांग-आधारित विकास को प्रोत्साहन मिलता है। 

आघातों से सुरक्षित और संतुलित अर्थव्यवस्था 

आय-सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा का विस्तार आर्थिक अस्थिरता को कम करता है। यह व्यवस्था अर्थव्यवस्था को बाहरी या आंतरिक झटकों के प्रति अधिक लचीला बनाती है। इस प्रकार, श्रम संहिताएँ समावेशी और स्थायी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण साधन सिद्ध हो सकती हैं।

श्रम कानून सुधार: आधुनिकीकरण की प्रक्रिया 

जटिल व्यवस्था से सरल संरचना तक 

पूर्व के श्रम कानून बहुस्तरीय एवं जटिल थे। उन्हें चार व्यापक श्रम संहिताओं में समेकित करने से अनुपालन सरल हुआ है और नियामक ढाँचा अधिक पारदर्शी बना है। यह बदलाव श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों के लिए स्पष्टता व पूर्वानुमेयता प्रदान करता है। 

विरोध और व्यावहारिक चुनौतियाँ 

कुछ संगठनों ने इन सुधारों का विरोध किया है किंतु व्यापक आलोचना प्राय: उन श्रमिक-पक्षीय प्रावधानों को अनदेखा कर देती है जो इन संहिताओं में निहित हैं। यद्यपि क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ मौजूद हैं परंतु सुधारों के संभावित लाभों को समझे बिना उनका पूर्ण विरोध करना उचित नहीं माना जा सकता है। 

संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा 

श्रम संहिताएँ केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं हैं। वे ग्रेच्युटी के विस्तार, सामाजिक सुरक्षा कवरेज की वृद्धि और कानूनी अपवर्जनों को समाप्त कर श्रमिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ती हैं। इससे आर्थिक मूल्य का वितरण श्रम के पक्ष में अधिक संतुलित होता है। 

विकास और सामाजिक न्याय का समन्वय 

इन सुधारों का मूल उद्देश्य आर्थिक प्रगति को सामाजिक न्याय से जोड़ना है। आय-सुरक्षा और वित्तीय गरिमा को सुदृढ़ कर वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि विकास का लाभ प्रत्येक श्रमिक तक पहुँचे। इनकी सफलता अंततः प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी, जिससे भारत की विकास यात्रा अधिक समावेशी और संतुलित बन सके। 

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