संदर्भ
हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समीउल्लाह बनाम बिहार राज्य मामले में संपत्ति पंजीकरण प्रक्रिया की जटिलताओं पर टिप्पणी करते हुए इसे कई भारतीयों के लिए ‘कष्टदायक’ बताया है। यह निर्णय भूमि लेनदेन में मौजूद प्रशासनिक व कानूनी जटिलताओं को उजागर करता है और संपत्ति पंजीकरण एवं स्वामित्व के बीच अंतर को स्पष्ट करता है।
समीउल्लाह बनाम बिहार राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला
- न्यायालय ने 2019 में लागू किए गए बिहार पंजीकरण उप-नियमों को अवैध और मनमाना मानते हुए रद्द कर दिया। ये नियम पंजीकरण अधिकारियों को यह अधिकार देते थे कि वे किसी संपत्ति हस्तांतरण दस्तावेज़ (जैसे- बिक्री विलेख या उपहार विलेख) का पंजीकरण स्वामी का उत्परिवर्तन प्रमाण न पेश करने पर न करें।
- सर्वोच्च न्यायालय ने तीन कारणों से इन उप-नियमों को गलत ठहराया:
- ये नियम पंजीकरण अधिनियम के तहत महानिरीक्षक को दी गई शक्तियों से बाहर थे।
- विक्रेताओं से स्वामित्व प्रमाण मांगकर नियम ने पंजीकरण के उद्देश्य का उल्लंघन किया और संपत्ति के स्वतंत्र हस्तांतरण को सीमित किया।
- उत्परिवर्तन का प्रमाण जुटाना व्यावहारिक रूप से असंभव था क्योंकि बिहार में भूमि सर्वेक्षण एवं संबंधित अधिनियम अधूरे थे।
- न्यायालय ने पुष्टि की कि हस्तांतरण विलेख का पंजीकरण संपत्ति का स्वामित्व स्थापित नहीं करता है। स्वामित्व या मालिकाना हक से जुड़े विवादों की जांच केवल दीवानी न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आती है, न कि पंजीकरण कार्यालय के अधीन होती है।
- पंजीकरण केवल संपत्ति एवं विक्रेता की पहचान के लिए है। मानचित्र या सर्वेक्षण केवल तभी संदर्भित होते हैं जब यह व्यावहारिक और आवश्यक हो।
भारत में भूमि पंजीकरण प्रणाली
- भारत में भूमि पंजीकरण का उद्देश्य संपत्ति लेन–देन को कानूनी मान्यता देना और सार्वजनिक अभिलेख तैयार करना है।
- यह प्रणाली मुख्यतः पंजीकरण अधिनियम, 1908 और भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 द्वारा शासित है।
- भूमि पंजीकरण एक राज्य विषय है, इसलिए प्रक्रियाएँ और शुल्क राज्यों में भिन्न हो सकते हैं।
भारत में भूमि पंजीकरण प्रणाली से जुड़ी समस्याएँ
भारत की भूमि प्रशासन प्रणाली औपनिवेशिक कानूनों, जटिल नौकरशाही ढाँचों और अत्यधिक बोझ से दबी न्यायपालिका का मिश्रण है। भूमि से जुड़े विवाद प्राय: वर्षों तक चलते रहते हैं, चाहे वे प्रशासनिक हों या न्यायिक।
प्रशासनिक ढाँचे से जुड़ी समस्याएँ
- भूमि प्रशासन तीन अलग-अलग विभागों में बँटा हुआ है-
- पंजीकरण विभाग
- सर्वेक्षण एवं निपटान विभाग
- राजस्व विभाग
- ये तीनों विभाग स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं और उनके बीच प्रभावी समन्वय का अभाव है। प्रत्येक विभाग अपने अलग कानूनों, नियमों एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं से संचालित होता है।
- अभिलेखों के एकीकरण एवं अद्यतन में निरंतर समस्याएँ बनी रहती हैं।
स्वामित्व व्यवस्था की कमजोरियाँ
- भारत की मौजूदा भूमि प्रणाली पुष्ट (गारंटीड) स्वामित्व नहीं, बल्कि केवल स्वामित्व का अनुमान प्रदान करती है।
- किसी भी संपत्ति के स्वामित्व को निम्न आधारों पर चुनौती दी जा सकती है:
- पुराने विक्रय विलेख
- राजस्व रसीदें
- नामांतरण (म्यूटेशन) अभिलेख
- कब्जे का प्रमाण
- प्रतिस्पर्धी विक्रय विलेख
- इससे संपत्ति खरीदार पर विस्तृत कानूनी जांच-पड़ताल का भारी बोझ पड़ता है।
ऐतिहासिक कारण
- भारतीय उपमहाद्वीप पर विभिन्न कालों में अलग-अलग शासकों का शासन रहा।
- प्रत्येक शासक ने अपनी अलग राजस्व और भूमि व्यवस्था लागू की।
- औपनिवेशिक शासन ने जटिल और असंगत भूमि कानून छोड़े।
- रियासतों में भूमि संबंधी नियम एक-दूसरे से भिन्न थे।
- स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार कानून, जैसे- भूमि सीमा अधिनियम, लागू किए गए।
भारत में भूमि अभिलेख प्रणाली में सुधार के लिए उठाए गए प्रमुख कदम
- डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP):
- भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण, अद्यतन एवं एकीकरण
- पंजीकरण, सर्वेक्षण व राजस्व अभिलेखों को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाने का प्रयास
- कम्प्यूटराइज्ड पंजीकरण प्रणाली:
- संपत्ति पंजीकरण प्रक्रिया को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाना
- मैनुअल रिकॉर्ड और भ्रष्टाचार की संभावना में कमी
- भू-स्थानिक तकनीकों का उपयोग:
- जीआईएस, ड्रोन एवं सैटेलाइट इमेजरी के माध्यम से भूमि का सटीक मानचित्रण
- सीमाओं एवं स्वामित्व से जुड़े विवादों को कम करने में सहायता
- यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN / Bhu-Aadhaar):
- प्रत्येक भूमि खंड को एक विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान करना
- विभिन्न विभागों के भूमि डेटा को जोड़ने में मदद
- राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति (2022):
- भू-स्थानिक डेटा के मानकीकरण और साझा उपयोग को बढ़ावा
- निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन
- ई-कोर्ट्स और ऑनलाइन भूमि विवाद समाधान:
- भूमि से जुड़े मामलों के त्वरित निपटान के लिए तकनीक का उपयोग
- न्यायिक देरी को कम करने का प्रयास
- राज्य स्तर पर शीर्षक प्रमाणन (Conclusive Titling) की पहल:
- कुछ राज्यों में स्वामित्व की गारंटी देने वाली प्रणाली की दिशा में प्रयास
- अनुमान आधारित स्वामित्व से पुष्ट स्वामित्व की ओर संक्रमण
- नक्शा अद्यतन और पुनः सर्वेक्षण:
- पुराने एवं त्रुटिपूर्ण नक्शों को आधुनिक तकनीकों से अपडेट करना
- ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सीमांकन को स्पष्ट करना
- एकीकृत भूमि सूचना प्रणाली (ILIS):
- भूमि से जुड़ी सभी जानकारियों को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना
भूमि प्रशासन सुधार के लिए आगे की राह
- भारत में भूमि प्रशासन से जुड़ी समस्याओं का समाधान केवल आंशिक बदलावों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए व्यापक और संरचनात्मक प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता है, जो निम्नलिखित हैं-
- एक ऐसी एकीकृत और समन्वित भूमि अभिलेख प्रणाली विकसित करने पर जोर होना चाहिए, जो स्वामित्व संबंधी भ्रम और धोखाधड़ी की संभावना को न्यूनतम कर सके।
- कुछ राज्यों ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय पहल की है। उदाहरण के तौर पर, कर्नाटक की ‘भूमि’ और ‘कावेरी’ प्रणालियाँ अधिकार अभिलेखों को संपत्ति पंजीकरण से जोड़ती हैं। इसके परिणामस्वरूप, जैसे ही किसी संपत्ति का विक्रय विलेख पंजीकृत होता है, स्वामित्व अभिलेख स्वतः अद्यतन हो जाते हैं। इसी प्रकार, स्थानिक (स्पैशियल) डेटा और राजस्व अभिलेखों के एकीकरण के प्रयास भी किए जा रहे हैं, हालांकि फिलहाल ये पहल मुख्य रूप से कृषि भूमि तक सीमित हैं।
तकनीक की भूमिका
- हाल के वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ब्लॉकचेन तकनीक के उपयोग पर भी गंभीर चर्चा हुई है। वास्तव में एक हालिया निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने सुरक्षित, पारदर्शी एवं छेड़छाड़-रहित भूमि अभिलेख प्रणाली विकसित करने के लिए ब्लॉकचेन के इस्तेमाल का सुझाव दिया है।
- आंध्र प्रदेश में भूमि अभिलेखों के लिए ब्लॉकचेन आधारित पायलट परियोजना से कथित तौर पर भूमि विवादों में लगभग 50% की कमी आई है और लेनदेन की दक्षता में करीब 30% का सुधार हुआ है।
ब्लॉकचेन तकनीक की उपयोगिता
- ब्लॉकचेन मूल रूप से डेटा ब्लॉकों की एक श्रृंखला होती है जो एक सुरक्षित और अपरिवर्तनीय डिजिटल कड़ी के रूप में जुड़ी रहती है।
- यह जानकारी एक विकेन्द्रीकृत और ओपन-सोर्स वातावरण में संग्रहीत होती है जहाँ प्रत्येक लेनदेन को नेटवर्क से जुड़े सभी कंप्यूटरों (नोड्स) द्वारा सत्यापित किया जा सकता है। पारंपरिक केंद्रीकृत प्रणालियों के विपरीत ब्लॉकचेन को विश्वास, पारदर्शिता और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- प्रत्येक ब्लॉक एक प्रकार की डिजिटल बहीखाता प्रविष्टि होता है जिसमें नई जानकारी स्थायी रूप से दर्ज की जाती है।
- जब कोई लेनदेन होता है, तो वह सभी नोड्स के साथ सिंक्रनाइज़ होकर वितरित बहीखाते (डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर) में जुड़ जाता है। इस प्रणाली में जानकारी सभी भागीदारों के बीच साझा होती है, चाहे उनका भौगोलिक स्थान या प्रशासनिक स्थिति कुछ भी हो।
- ब्लॉकचेन नेटवर्क अनुमति-आधारित (Permissioned) या खुले (Permissionless) हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि डेटा तक पहुँच किसे दी गई है।
- इसकी विकेंद्रीकृत संरचना हैकिंग और डेटा में छेड़छाड़ को अत्यंत कठिन बना देती है क्योंकि किसी भी छोटे बदलाव को नेटवर्क तुरंत पहचान लेता है। इसी कारण से डबल-स्पेंडिंग या रिकॉर्ड की नकल जैसी धोखाधड़ी लगभग असंभव हो जाती है।
- यदि इस तकनीक को भूमि अभिलेखों पर लागू किया जाए, तो प्रत्येक भूमि खंड के लिए एक अलग ब्लॉक तैयार किया जा सकता है। इसमें उस भूखंड का पूरा इतिहास—स्वामित्व विवरण, उत्तराधिकार, भौगोलिक स्थिति, सर्वेक्षण नक्शे, जल स्रोत, फसल विवरण और उससे जुड़े सभी पंजीकृत दस्तावेज—शामिल किए जा सकते हैं। भविष्य में होने वाला हर नया लेनदेन एक नए ब्लॉक के रूप में जुड़ता जाएगा, जिससे भूमि अभिलेखों का एक निरंतर अद्यतन, पारदर्शी एवं अपरिवर्तनीय नेटवर्क तैयार होगा।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भूमि प्रशासन व्यवस्था में अब प्रशासनिक और तकनीकी—दोनों स्तरों पर त्वरित सुधार अनिवार्य हो चुके हैं। भारत में भूमि शासन की जटिलताओं की समग्र समझ विकसित करना ही ऐसे व्यावहारिक और टिकाऊ समाधान तैयार करने की पहली शर्त है जो वास्तव में प्रत्येक नागरिक के संपत्ति अधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें।