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आकाशीय बिजली: भारत की अदृश्य आपदा

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, पर्यावरणीय पारिस्थितिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: आपदा एवं आपदा प्रबंधन)

संदर्भ

22 दिसंबर, 2025 को नई दिल्ली के पृथ्वी भवन में आयोजित नौवें राष्ट्रीय आकाशीय बिजली सम्मेलन (National Lightning Conference) में विशेषज्ञों ने एक गंभीर चेतावनी जारी की है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में आकाशीय बिजली (Lightning) भारत की सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदा बनकर उभरी है। अत्यधिक मौतों का कारण बनने के बावजूद इस प्राकृतिक आपदा को नीतिगत एवं सामाजिक स्तर पर अभी भी उस गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है जिस गंभीरता से बाढ़ या चक्रवात को लिया जाता है। 

क्या है आकाशीय बिजली 

  • वैज्ञानिक दृष्टि से आकाशीय बिजली बादलों के बीच या बादल एवं स्थलीय सतह के बीच होने वाला एक तीव्र विद्युतस्थैतिक निर्वहन (Electrostatic Discharge) है। 
  • यह परिघटना बिजली की कौंध, गड़गड़ाहट एवं तेज हवाओं के साथ आती है। इसकी प्रकृति अचानक एवं अत्यधिक सीमित क्षेत्र में होने वाली है जिसके कारण इससे बचाव के लिए प्रतिक्रिया का समय बहुत कम मिलता है। 

भारत में बढ़ते खतरे प्रवृत्ति

  • सर्वाधिक मृत्यु दर: भारत में आकाशीय बिजली किसी भी अन्य प्राकृतिक आपदा से अधिक घातक है जिससे प्रतिवर्ष 2,000 से अधिक लोग जान गंवाते हैं।
  • घटनाओं में तीव्र उछाल: वर्ष 2019 से 2025 के बीच आकाशीय बिजली की घटनाओं में 400% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। वस्तुतः ग्लोबल वार्मिंग के कारण इसमें प्रतिवर्ष 7-14% की बढ़ोतरी हो रही है। 
  • नए हॉटस्पॉट: ओडिशा, बिहार एवं मध्य प्रदेश जैसे पारंपरिक रूप से संवेदनशील राज्यों के अलावा अब राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, पंजाब व हरियाणा भी नए हॉटस्पॉट के रूप में उभर रहे हैं। 

इस आपदा के नजरअंदाज होने का कारण 

  1. बिखरी हुई प्रकृति: चक्रवात की तरह यह एक साथ बड़े क्षेत्र को प्रभावित नहीं करती है बल्कि गाँवों एवं खेतों में छिटपुट घटनाओं के रूप में होती है। इस कारण इसे वह मीडिया कवरेज नहीं मिलता है जो अन्य बड़ी आपदाओं को मिलता है।
  2. दृश्यता की कमी: इसमें बाढ़ की तरह संरचनात्मक विनाश (इमारतों का गिरना) कम होता है जिससे इसके आर्थिक एवं मानवीय प्रभाव का सही आकलन नहीं हो पाता है। 
  3. संसाधनों का अभाव: सटीक मैपिंग एवं शोध के लिए स्थलीय सेंसर और विद्युत क्षेत्र मीटरों की भारी कमी है।
  4. धारणा का दोष: समाज में इसे प्राय: एक ‘अपरिहार्य प्राकृतिक घटना’ या ‘दैवीय प्रकोप’ मान लिया जाता है जबकि विज्ञान के जरिए इससे बचा जा सकता है।

जलवायु संकट और बढ़ती संवेदनशीलता

  • बढ़ते तापमान का सीधा संबंध वायुमंडल में बढ़ती आकाशीय बिजली से है। यह न केवल लोगों की जान ले रही है बल्कि आजीविका का संकट भी पैदा कर रही है। 
  • वस्तुतः खुले में काम करने वाले किसान, चरवाहे एवं मछुआरे इसके सबसे आसान शिकार बनते हैं। इसके अलावा यह पशुधन, दूरसंचार टावरों एवं बिजली लाइनों को भी भारी नुकसान पहुँचाती है। 

सरकार की पहल एवं सुरक्षा चक्र 

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

  • तकनीकी समाधान: ‘दामिनी’, ‘मौसम’ एवं ‘सचेत’ ऐप के जरिए 48 घंटे पहले हॉटस्पॉट क्षेत्र में विशेष चेतावनी दी जा रही है।
  • MPLS परियोजना: ‘बिजली सुरक्षा शमन परियोजना’ के तहत उच्च जोखिम वाले जिलों में चेतावनी खंभे व बिजली सुरक्षा उपकरणों (Lightning Arresters) की स्थापना की जा रही है। 
  • जागरूकता अभियान: स्थानीय स्तर पर पंचायतों एवं स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि अंतिम व्यक्ति तक चेतावनी पहुँच सके। 

समय की मांग: औपचारिक आपदा का दर्जा

विशेषज्ञों का तर्क है कि अब समय आ गया है जब आकाशीय बिजली को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए। वस्तुतः इससे-

  • जिला स्तर पर समर्पित फंड और कार्य योजनाएं बन सकेंगी।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अधिक वित्तीय सहायता संभव हो पाएगी।
  • भारत की आपदा नीतियाँ वैश्विक ‘सेंडाई फ्रेमवर्क’ (Sendai Framework) के अनुरूप होंगी। 

निष्कर्ष

बिजली गिरना अब कोई छिटपुट मौसमी घटना नहीं है बल्कि जलवायु परिवर्तन से प्रेरित एक राष्ट्रव्यापी आपदा बन चुकी है। इसकी अनदेखी का मतलब है प्रतिवर्ष टाली जा सकने वाली हजारों मौतों को स्वीकार करना। अब समय आ गया है कि भारत अपनी आपदा प्रबंधन रणनीतियों में आकाशीय बिजली के खतरे को गंभीरता से शामिल करे क्योंकि बढ़ते तापमान वाले इस दौर में जीवन बचाने का सबसे प्रभावी उपाय समय पर तैयारी ही है।  

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