मलयालम भाषा विधेयक, 2025

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, अधिकारों संबंधी मुद्दे)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, संसद व राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय)

संदर्भ

हाल ही में, केरल में भाषा नीति को लेकर एक अहम पहल करते हुए वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार ने विधानसभा में मलयालम भाषा विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया। विषय समिति की समीक्षा के बाद मात्र तीन दिनों के भीतर इसे पारित कर दिया गया। वर्तमान में यह विधेयक राज्यपाल की मंज़ूरी की प्रतीक्षा में है। 

विधेयक का उद्देश्य और दायरा

  • मलयालम भाषा विधेयक, 2025 का मुख्य उद्देश्य मलयालम को केरल की एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करना है। 
  • इसके तहत संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहते हुए शासन-प्रशासन, शिक्षा, न्यायपालिका, सार्वजनिक संवाद, व्यापारिक गतिविधियों और डिजिटल माध्यमों में मलयालम के व्यापक उपयोग को अनिवार्य बनाने का प्रावधान किया गया है। 
  • वस्तुतः अभी तक राज्य में अंग्रेज़ी एवं मलयालम दोनों को आधिकारिक भाषाओं का दर्जा प्राप्त है। 

प्रमुख प्रावधान

विधेयक के अनुसार

  • राज्य के सभी सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों में कक्षा 10 तक मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा के रूप में पढ़ाया जाएगा।
  • न्यायालयों के निर्णयों और अदालती कार्यवाहियों का चरणबद्ध अनुवाद मलयालम में किया जाएगा।
  • विधानसभा में प्रस्तुत होने वाले सभी विधेयक और अध्यादेश मलयालम भाषा में लाए जाएंगे।
  • अंग्रेज़ी में उपलब्ध प्रमुख केंद्रीय और राज्य कानूनों का भी मलयालम संस्करण तैयार किया जाएगा।

अन्य प्रावधान 

  • सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को आईटी क्षेत्र में मलयालम के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने के लिए ओपन-सोर्स सॉफ़्टवेयर एवं तकनीकी संसाधन विकसित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाएगी।
  • प्रशासनिक ढांचे में बदलाव करते हुए सचिवालय के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार (राजभाषा) विभाग का नाम बदलकर मलयालम भाषा विकास विभाग रखने का प्रस्ताव है। 
  • इसी विभाग के अंतर्गत एक पृथक मलयालम भाषा विकास निदेशालय भी गठित किया जाएगा। 

विधेयक की पृष्ठभूमि

  • यह पहली बार नहीं है जब केरल सरकार ने मलयालम को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया हो। वर्ष 2015 में प्रस्तुत मलयालम भाषा (प्रसार एवं समृद्धि) विधेयक भी इसी उद्देश्य से लाया गया था। हालांकि, विधानसभा से पारित होने के बावजूद राष्ट्रपति ने उस विधेयक को स्वीकृति नहीं दी थी।
  • उस समय यह विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ इसलिए सुरक्षित रखा गया था क्योंकि इसके कुछ प्रावधान राजभाषा अधिनियम, 1963 से असंगत थे। 
  • साथ ही, केंद्र सरकार ने भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत त्रिभाषा सूत्र तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 से जुड़े प्रावधानों पर आपत्तियाँ व्यक्त की थीं। 

कर्नाटक सरकार द्वारा विरोध

  • कर्नाटक सरकार ने इस विधेयक का विरोध किया है। उसने इसे असंवैधानिक करार देते हुए कहा है कि इससे केरल में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों, विशेषकर सीमावर्ती ज़िले कासरगोड, के हित प्रभावित हो सकते हैं।
  • कर्नाटक सरकार की मुख्य आपत्ति उस प्रावधान पर है जिसमें केरल के सभी विद्यालयों में मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा बनाए जाने की बात कही गई है। 
  • याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कासरगोड और अन्य कन्नड़-बहुल क्षेत्रों में भाषाई अल्पसंख्यक छात्र वर्तमान में कन्नड़ को प्रथम भाषा के रूप में पढ़ते हैं। 

केरल सरकार का पक्ष 

  • केरल सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि विधेयक का उद्देश्य किसी भी भाषा या समुदाय के अधिकारों का हनन करना नहीं है। विधेयक में तमिल, कन्नड़, तुलु एवं कोंकणी सहित सभी भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान शामिल हैं।
  • इन प्रावधानों के तहत भाषाई अल्पसंख्यकों को राज्य सरकार सचिवालय, विभागाध्यक्षों और संबंधित क्षेत्रों के स्थानीय सरकारी कार्यालयों के साथ अपनी मातृभाषा में संवाद करने की अनुमति होगी।
  • इसके अतिरिक्त, जिन छात्रों की मातृभाषा मलयालम नहीं है, वे राष्ट्रीय शिक्षा पाठ्यक्रम के अनुरूप राज्य के विद्यालयों में उपलब्ध अपनी पसंद की भाषा में शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। अन्य राज्यों या विदेशों से आने वाले ऐसे छात्र, जिनकी मातृभाषा मलयालम नहीं है, उन्हें कक्षा 9, 10 और उच्च माध्यमिक स्तर पर मलयालम में परीक्षा देने से छूट प्रदान की जाएगी। 
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