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मानसिक स्वास्थ्य संकट एवं भारत

संदर्भ 

  • हालिया आर्थिक सर्वेक्षण ने देश में डिजिटल लत और स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में तेज़ बढ़ोतरी को रेखांकित किया है। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के बीच अधिक चिंताजनक मानी जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में 1 फरवरी को प्रस्तुत केंद्रीय बजट में सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण घोषणाएँ की हैं।
  • बजट के प्रमुख प्रस्तावों में उत्तर भारत में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS) की दूसरी इकाई की स्थापना शामिल है। इसके अतिरिक्त रांची और तेजपुर स्थित अग्रणी मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के उन्नयन की योजना भी बनाई गई है। इन कदमों का उद्देश्य क्षेत्रीय असंतुलन को कम करना, मौजूदा संस्थानों पर बढ़ते दबाव को घटाना तथा देश के विभिन्न हिस्सों में विशेषीकृत मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को बढ़ाना है। 

भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट की व्यापकता 

विशेषज्ञों के अनुसार भारत वर्तमान में एक गहरे मानसिक स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है। वैश्विक स्तर पर आत्महत्या, अवसाद एवं नशे से जुड़े कुल मामलों में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है जिससे यह स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य अब केवल व्यक्तिगत समस्या न रहकर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है।

युवाओं में बढ़ता आत्महत्या जोखिम 

गृह मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) के आंकड़े दर्शाते हैं कि 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, सामाजिक दबाव एवं डिजिटल लत जैसे कारक इस आयु वर्ग को विशेष रूप से संवेदनशील बनाते हैं।

मानसिक रोगों की आर्थिक कीमत 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भारत को वर्ष 2012 से 2030 के बीच लगभग 1.03 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हो सकता है। यह हानि मुख्यतः कार्यक्षमता में कमी, बढ़ती स्वास्थ्य देखभाल लागत और समय से पहले होने वाली मौतों के कारण होती है।

उपचार अंतर की गंभीर समस्या 

भारत की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक उपचार अंतर है। अनुमान के अनुसार मानसिक विकारों से पीड़ित 70 से 92% लोगों को आवश्यक और समय पर उपचार नहीं मिल पाता है। इसके पीछे जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की भारी कमी जैसे कारण प्रमुख हैं। 

मानव संसाधन की कमी 

इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री के अनुसार भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं जबकि WHO कम-से-कम तीन मनोचिकित्सकों की सिफारिश करता है। यह अंतर निदान, परामर्श एवं उपचार सेवाओं तक पहुंच को गंभीर रूप से बाधित करता है। 

बजटीय प्राथमिकता का अभाव 

हालाँकि, वित्त वर्ष 2014–15 के बाद से कुल स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि हुई है किंतु मानसिक स्वास्थ्य को अब भी कुल स्वास्थ्य बजट का केवल लगभग एक प्रतिशत ही प्राप्त होता है। अपर्याप्त वित्तपोषण के कारण अवसंरचना विकास, मानव संसाधन विस्तार और जन-जागरूकता कार्यक्रम सीमित रह गए हैं। 

अस्पतालों से आगे बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ

  • मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार ने आयुष्मान भारत कार्यक्रम के तहत इन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में एकीकृत किया है। अब मानसिक स्वास्थ्य, आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से प्रदान की जाने वाली समग्र प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का हिस्सा है।
  • देशभर में 1.73 लाख से अधिक उप-स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को इन आरोग्य मंदिरों में परिवर्तित किया गया है जहाँ बुनियादी मानसिक स्वास्थ्य जांच, परामर्श एवं रेफरल सेवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे विशेषीकृत अस्पतालों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल रही है।

विशेषज्ञ क्षमता निर्माण पर जोर 

मानव संसाधन की कमी को दूर करने के लिए सरकार ने शिक्षा और प्रशिक्षण ढांचे का विस्तार किया है। मानसिक स्वास्थ्य में स्नातकोत्तर प्रशिक्षण हेतु 20 से अधिक उत्कृष्टता केंद्र स्वीकृत किए गए हैं तथा देशभर में 47 स्नातकोत्तर मानसिक स्वास्थ्य विभाग स्थापित किए गए हैं। इन प्रयासों का लक्ष्य विशेष रूप से वंचित और दूरदराज़ क्षेत्रों में प्रशिक्षित विशेषज्ञों की उपलब्धता बढ़ाना है।

टेली-मानसिक स्वास्थ्य: टेली MANAS 

  • भौतिक अवसंरचना के साथ-साथ डिजिटल पहुंच को सुदृढ़ करने के लिए टेली MANAS की शुरुआत की गई है। यह सेवा 24×7 निःशुल्क मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान करती है और 14416 तथा 1-800-891-4416 हेल्पलाइन नंबरों के माध्यम से उपलब्ध है। 
  • 10 अक्तूबर, 2022 को शुरू की गई इस पहल के अंतर्गत 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 53 संचालन केंद्र कार्यरत हैं जिन्हें 23 विशेषीकृत मेंटरिंग संस्थानों का समर्थन प्राप्त है। यह व्यवस्था विशेष रूप से दूरदराज़ के क्षेत्रों और उन लोगों के लिए उपयोगी है जो प्रत्यक्ष रूप से उपचार लेने में हिचकिचाते हैं।

वित्तपोषण में संरचनात्मक कमज़ोरियाँ 

  • हाल के वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य बजट 683 करोड़ रुपए (2020–21) से बढ़कर लगभग 1,898 करोड़ रुपए (2024–25) तक पहुँच गया है। 
  • इसके बावजूद विशेषज्ञ इसे दीर्घकालिक अल्प-निवेश मानते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर व्यय कुल स्वास्थ्य बजट का दो प्रतिशत से भी कम है जबकि समग्र स्वास्थ्य व्यय स्वयं भारत के GDP का लगभग दो प्रतिशत ही है।

आवश्यकता और व्यय के बीच खाई 

यह वित्तीय असंतुलन तब अधिक स्पष्ट हो जाता है जब इसे भारत में आत्महत्या एवं अवसाद के ऊँचे बोझ, व्यापक उपचार अंतर और अनुपचारित मानसिक रोगों से होने वाले आर्थिक नुकसान के संदर्भ में देखा जाए। इसके बावजूद मानसिक स्वास्थ्य को अब भी नीति व बजट दोनों स्तरों पर सीमित प्राथमिकता मिल रही है। 

तृतीयक संस्थानों पर अत्यधिक निर्भरता 

  • एक अन्य चिंता यह है कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध संसाधनों का बड़ा हिस्सा NIMHANS और नए उत्कृष्टता केंद्रों जैसे तृतीयक संस्थानों पर केंद्रित है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल ऐसे संस्थानों के सहारे भारत जैसे विशाल और विविध देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मुख्यधारा में नहीं लाया जा सकता है। 
  • ये संस्थान सीमित जनसंख्या की सेवा करते हैं और प्राय: शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रहते हैं। इसके बजाय समुदाय-आधारित सेवाओं, प्रारंभिक हस्तक्षेप मॉडलों व निवारक एवं संवर्धनात्मक मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में लक्षित निवेश अधिक प्रभावी हो सकता है।

धन के उपयोग की समस्या 

कम आवंटन के साथ-साथ एक बड़ी समस्या उपलब्ध धनराशि का पूर्ण उपयोग न हो पाना भी है। प्रशासनिक अड़चनें और स्थानीय स्तर पर क्षमता की कमी प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बनती हैं। विशेषज्ञों का मत है कि इसके लिए विकेंद्रीकृत योजना और समुदाय-नेतृत्व वाले मॉडलों को अपनाना आवश्यक है, न कि केवल बजट बढ़ाना।

आगे की दिशा: समुदाय-केंद्रित मानसिक स्वास्थ्य देखभाल 

  • मानसिक रोगों से होने वाली अनावश्यक मौतों और दिव्यांगता को रोकने के लिए भारत को सस्ती व सुलभ सेवाएँ, निरंतर देखभाल तथा समय पर हस्तक्षेप सुनिश्चित करना होगा। 
  • वर्तमान व्यवस्था में विशेषज्ञ-केंद्रित तृतीयक देखभाल पर अत्यधिक निर्भरता, प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी और लगभग 95% तक की पहुंच खाई गंभीर चुनौती बनी हुई है। 
  • ऐसे में सरकार का स्कूलों में मानसिक कल्याण को एकीकृत करने और कार्यस्थलों पर तनाव व बर्नआउट से निपटने के लिए नीतिगत हस्तक्षेपों पर जोर देना इस बात का संकेत है कि भारत धीरे-धीरे उपचार-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर निवारक एवं समुदाय-आधारित मानसिक स्वास्थ्य मॉडल की ओर बढ़ रहा है।
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