केंद्र सरकार द्वारा नागौरी अश्वगंधा (Nagauri Ashwagandha) को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्रदान किया गया है जिससे इसकी विशिष्ट पहचान और क्षेत्रीय महत्त्व को आधिकारिक मान्यता मिली है।
नागौरी अश्वगंधा के बारे में
- नागौरी अश्वगंधा की खेती मुख्यतः राजस्थान के नागौर जिले में की जाती है। नागौर क्षेत्र की शुष्क जलवायु तथा रेतीली मृदा इसे उगाने के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती है।
- इसकी जड़ें आकार में लंबी एवं मोटी होती हैं तथा इनमें औषधीय गुणों से भरपूर एल्कलॉइड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
- इसके फल गहरे चमकीले लाल रंग के होते हैं जिन्हें उच्च गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ें स्वभाव से भंगुर व स्टार्चयुक्त होती हैं।
- शुष्क क्षेत्रों में पाई जाने वाली अश्वगंधा की सभी किस्मों में नागौरी अश्वगंधा को सर्वोत्तम माना जाता है।
- अश्वगंधा (वैज्ञानिक नाम: विथानिया सोम्निफेरा) एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राचीन औषधीय पौधा है। इसे सामान्यतः भारतीय जिनसेंग या भारतीय शीतकालीन चेरी के नाम से भी जाना जाता है।
अश्वगंधा की खेती हेतु उपयुक्त परिस्थितियाँ
- यह पौधा मुख्यत: शुष्क एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसके लिए pH मान 7.5 से 8.0 के बीच वाली अच्छी जल निकासी से युक्त रेतीली दोमट या हल्की लाल मृदा उपयुक्त होती है।
- इसे प्रायः वर्षा ऋतु के अंतिम चरण में खरीफ फसल के रूप में बोया जाता है। 500 से 750 मिमी. वार्षिक वर्षा वाले अर्ध-उष्णकटिबंधीय क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त होते हैं।
- यह पौधा 20 से 38 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को सहन करने की क्षमता रखता है। भारत में इसका उत्पादन मुख्यत: मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र में किया जाता है।
अश्वगंधा के औषधीय लाभ
- अश्वगंधा का उपयोग हजारों वर्षों से आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली में किया जा रहा है।
- इसे एक एडाप्टोजेन माना जाता है अर्थात यह शरीर को तनाव के अनुकूल ढलने में सहायता करता है और संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
- इसके प्रमुख लाभों में सूजन कम करना, ऊर्जा स्तर बढ़ाना, चिंता घटाना, दर्द से राहत देना तथा नींद की गुणवत्ता में सुधार शामिल हैं।
- अश्वगंधा के पौधे के विभिन्न भागों, जैसे- जड़, पत्तियों एवं फल में जैवसक्रिय तत्वों की मात्रा अलग-अलग पाई जाती है।