वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘अनलॉकिंग द पावर ऑफ हेल्दी लॉन्गेविटी’ (Unlocking the Power of Healthy Longevity) इस बात पर प्रकाश डालती है कि गैर-संक्रामक रोग (NCDs) (जैसे- हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और श्वसन संबंधी बीमारियाँ) अब दुनिया भर में मृत्यु के प्रमुख कारण बनते जा रहे हैं। विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इन रोगों का प्रभाव अधिक गंभीर होता जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि वर्तमान प्रवृत्तियाँ जारी रहती हैं तो वर्ष 2050 तक विश्व में वार्षिक मृत्यु संख्या लगभग 9.2 करोड़ तक पहुँच सकती है जिनमें बड़ी हिस्सेदारी NCDs की होगी। बढ़ती जीवन प्रत्याशा और तेजी से वृद्ध होती जनसंख्या इस चुनौती को अधिक जटिल बना रही है।
वैश्विक स्वास्थ्य प्रवृत्तियाँ और प्रमुख निष्कर्ष
रिपोर्ट यह संकेत देती है कि अधिकांश देशों में जनसंख्या की आयु संरचना तेजी से बदल रही है। वृद्धजन आबादी के बढ़ने के साथ दीर्घकालिक रोगों की रोकथाम और प्रबंधन के लिए स्वास्थ्य प्रणालियों को अधिक सक्षम व टिकाऊ बनाना आवश्यक हो गया है।
साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि प्रभावी स्वास्थ्य नीतियाँ अपनाई जाएँ तो 2050 तक प्रतिवर्ष लगभग 2.5 करोड़ मौतों को रोका जा सकता है। यह लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) 3.4 के अनुरूप है जिसका उद्देश्य समय से पहले होने वाली असंक्रामक रोगों से मृत्यु दर को कम करना है।
इस दिशा में हेल्दी लॉन्गेविटी इनिशिएटिव (HLI) एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आता है। यह पहल स्वास्थ्य सेवाओं को जीवन-चक्र आधारित दृष्टिकोण से देखने पर बल देती है ताकि व्यक्ति के पूरे जीवनकाल में स्वास्थ्य संरक्षण और रोगों की रोकथाम को प्राथमिकता दी जा सके।
हालाँकि, आदर्श स्वास्थ्य प्रणाली की परिकल्पना और वास्तविक स्थिति के बीच अब भी बड़ा अंतर मौजूद है। भारत जैसे कई विकासशील देशों में स्वास्थ्य अवसंरचना, संसाधनों एव प्रशासनिक क्षमता की सीमाएँ इस दिशा में प्रमुख बाधा बनती हैं।
भारत के संदर्भ में संरचनात्मक चुनौतियाँ
भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र कई स्तरों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में अस्पतालों, चिकित्सा उपकरणों व प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी अब भी एक गंभीर समस्या है। परिणामस्वरूप बड़ी आबादी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाती है।
इसके अतिरिक्त, दीर्घकालिक रोगों का उपचार प्राय: महंगा एवं लंबी अवधि तक चलने वाला होता है। बार-बार अस्पताल जाना और निरंतर दवाओं की आवश्यकता परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डालती है। भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला जेब से भुगतान (Out-of-Pocket Expenditure) अभी भी काफी अधिक है जिससे कई परिवार आर्थिक संकट में फँस जाते हैं या उपचार से बचने लगते हैं।
स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़ी चुनौतियाँ भी स्थिति को जटिल बनाती हैं। नियामक निगरानी की कमजोरी, भ्रष्टाचार तथा निजी स्वास्थ्य क्षेत्र की अनियमितताओं के कारण कई सरकारी योजनाओं का अपेक्षित लाभ आम लोगों तक नहीं पहुँच पाता है।
वृद्ध होती जनसंख्या और बढ़ता NCD बोझ
भारत की जनसंख्या संरचना में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहा है। वर्तमान में देश में लगभग 14 करोड़ लोग 60 वर्ष से अधिक आयु के हैं और यह वर्ग राष्ट्रीय जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है।
आने वाले वर्षों में असंक्रामक रोगों का बोझ अधिक बढ़ने की संभावना है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग 75% मौतें NCDs के कारण होंगी।
इस स्थिति का आर्थिक प्रभाव भी व्यापक होगा। दीर्घकालिक रोगों के कारण स्वास्थ्य व्यय बढ़ेगा, कार्यबल की उत्पादकता घटेगी और सरकार पर सामाजिक सुरक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं का अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। यदि प्रभावी नियंत्रण उपाय नहीं किए गए तो भारत के लिए SDG 3.4 का लक्ष्य प्राप्त करना कठिन हो सकता है।
जोखिम कारक और जीवनशैली में बदलाव
भारत में NCDs के बढ़ने के पीछे कई सामाजिक एवं जीवनशैली से जुड़े कारक जिम्मेदार हैं। तेजी से शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण भोजन की आदतों में बड़ा परिवर्तन आया है। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, उच्च शर्करा वाले पेय, परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट और रेड मीट (लाल मांस) का बढ़ता सेवन मधुमेह तथा हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ाता है।
साथ ही, शारीरिक गतिविधि में कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण है। आधुनिक शहरी जीवनशैली, बैठकर काम करने की प्रवृत्ति और उच्च कैलोरी वाले आहार ने मोटापे की समस्या को बढ़ा दिया है जो NCDs के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है।
बुजुर्गों के लिए स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है क्योंकि आयु बढ़ने के साथ आनुवंशिक प्रवृत्तियाँ, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली और अपर्याप्त जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवाएँ रोगों के खतरे को बढ़ा देती हैं।
सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य वित्तपोषण की सीमाएँ
भारत में सामाजिक सुरक्षा ढांचा अभी भी सीमित है। अधिकांश पेंशन योजनाएँ वृद्धजनों की बुनियादी जरूरतों को ही पूरा कर पाती हैं और दीर्घकालिक रोगों के उपचार की लागत को वहन करने में सक्षम नहीं हैं।
स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के विस्तार के बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने स्वास्थ्य कवरेज को बढ़ाया है किंतु कार्यान्वयन से जुड़ी समस्याएँ, वित्तीय सीमाएँ और कुछ मामलों में धोखाधड़ी इन योजनाओं की प्रभावशीलता को कम कर देती हैं।
यह भी स्पष्ट है कि केवल बीमा कवरेज पर्याप्त नहीं है। यदि स्वास्थ्य अवसंरचना मजबूत नहीं होगी और पर्याप्त डॉक्टर तथा चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होंगी, तो बीमा का लाभ सीमित ही रहेगा।
न्यायपालिका की भूमिका
स्वास्थ्य क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका भी सक्रिय भूमिका निभा रही है। वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने निजी अस्पतालों में उपचार शुल्क को विनियमित करने के लिए निर्देश जारी किए। इसका उद्देश्य मरीजों के आर्थिक शोषण को रोकना था।
हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मूल्य नियंत्रण पर्याप्त नहीं होगा। इसके प्रभावी परिणाम तभी मिलेंगे जब निगरानी तंत्र मजबूत हो और नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।
अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों से सीख
कई देशों ने असंक्रामक रोगों की चुनौती से निपटने के लिए सफल मॉडल विकसित किए हैं। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम ने मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के माध्यम से रोगों की प्रारंभिक रोकथाम पर जोर दिया है।
जापान, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में व्यापक सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा प्रणाली लागू है जिससे नागरिकों को दीर्घकालिक रोगों के उपचार में वित्तीय सुरक्षा मिलती है।
इसी प्रकार, सिंगापुर व फिनलैंड ने जीवनशैली आधारित नीतियों के माध्यम से रोगों की रोकथाम को प्राथमिकता दी है। वहीं एस्टोनिया और दक्षिण कोरिया ने डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं के समन्वय को बेहतर बनाया है।
थाईलैंड और ब्राज़ील जैसे देशों ने समुदाय स्तर पर स्क्रीनिंग व जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से कमजोर वर्गों तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने में सफलता प्राप्त की है।
आगे की दिशा
भारत के लिए आवश्यक है कि वह असंक्रामक रोगों की चुनौती से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाए। सबसे पहले, स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने के लिए व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और पोषण शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
सरकार को अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों, मीठे पेयों और तंबाकू उत्पादों पर उच्च कर लगाने जैसे वित्तीय उपाय भी अपनाने चाहिए, ताकि इनके उपभोग को कम किया जा सके।
इसके साथ ही प्रारंभिक जांच और स्क्रीनिंग कार्यक्रमों का विस्तार करना आवश्यक है, जिससे रोगों का समय पर पता लगाया जा सके और उपचार शुरू किया जा सके। स्वास्थ्य प्रशासन में पारदर्शिता, बेहतर निगरानी और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
भारत एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ वृद्ध होती जनसंख्या और बढ़ते असंक्रामक रोग मिलकर स्वास्थ्य प्रणाली के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं। इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करना, रोकथाम आधारित स्वास्थ्य नीतियों को अपनाना और वित्तीय सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ बनाना आवश्यक होगा।
यदि इन क्षेत्रों में समन्वित और दीर्घकालिक प्रयास किए जाएँ, तो भारत न केवल असंक्रामक रोगों के बोझ को कम कर सकता है बल्कि स्वस्थ और उत्पादक समाज की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति कर सकता है।