संदर्भ
- हाल के वर्षों में भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के संबंधों में उल्लेखनीय गहराई आई है। भारतीय प्रधानमंत्री की अबूधाबी यात्रा और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ हुई वार्ता ने यह स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों के रिश्ते अब केवल ऊर्जा व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे व्यापक रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित हो चुके हैं।
- यह यात्रा ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया गंभीर अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। ईरान और यूएई के बीच बढ़ते तनाव, मिसाइल एवं ड्रोन हमलों तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधानों ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में भारत और यूएई के बीच हुए समझौते केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक आर्थिक संतुलन से भी जुड़े हुए हैं।
पश्चिम एशिया संकट और भारत की संतुलित कूटनीति
- भारत ने यूएई पर हुए हमलों की निंदा करते हुए स्पष्ट रूप से अमीरात के प्रति समर्थन व्यक्त किया। साथ ही भारत ने यह भी दोहराया कि पश्चिम एशिया में स्थायी समाधान केवल संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है।
- भारत का यह रुख उसकी संतुलित विदेश नीति को दर्शाता है। एक ओर भारत यूएई और खाड़ी देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह ईरान जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदारों के साथ भी संपर्क बनाए रखना चाहता है।
- भारत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि होर्मुज जलडमरूमध्य स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित बना रहना चाहिए। यह बयान भारत की ऊर्जा चिंताओं को दर्शाता है, क्योंकि वैश्विक तेल और एलएनजी व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग खाड़ी क्षेत्र से पूरा होता है, इसलिए इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
ऊर्जा सुरक्षा : भारत-यूएई संबंधों का केंद्रीय आधार
- इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े समझौते रहे। यूएई भारत का चौथा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता है और एलपीजी का सबसे बड़ा स्रोत भी है। भारत की लगभग 40 प्रतिशत एलपीजी जरूरत यूएई से पूरी होती है।
- भारत और यूएई के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को लेकर सहयोग बढ़ाने का निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके तहत यूएई की भागीदारी भारत के रणनीतिक तेल भंडार में बढ़ाई जाएगी। भारत पहले से विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर में भूमिगत भंडारण सुविधाओं का संचालन कर रहा है।
- यह सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा को कई स्तरों पर मजबूत करेगा। भू-राजनीतिक संकटों के समय भारत के पास अतिरिक्त भंडार उपलब्ध रहेगा, जिससे तेल आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भी आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में सहायता मिलेगी। इसके साथ ही एलएनजी और एलपीजी भंडारण सुविधाओं पर संभावित सहयोग भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति को और सुदृढ़ करेगा।
- इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) और एडीएनओसी (ADNOC) के बीच दीर्घकालिक एलपीजी आपूर्ति समझौता घरेलू ऊर्जा आवश्यकताओं की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इससे रसोई गैस की आपूर्ति स्थिर रहने के साथ कीमतों में अनावश्यक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
रक्षा और समुद्री सहयोग का विस्तार
- भारत और यूएई के बीच रक्षा सहयोग में भी उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला है। दोनों देशों ने रक्षा उद्योग, उन्नत प्रौद्योगिकी, संयुक्त सैन्य अभ्यास, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक ढाँचा तैयार किया है।
- यह सहयोग केवल द्विपक्षीय सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की बढ़ती भूमिका को भी मजबूत करता है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुकी है, विशेषकर तब जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा हो।
- जहाज निर्माण और मरम्मत क्षेत्र में सहयोग भी इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और ड्राइडॉक्स वर्ल्ड के बीच हुए समझौते के तहत गुजरात के वाडिनार में जहाज मरम्मत क्लस्टर स्थापित किया जाएगा। इससे भारत की समुद्री
अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी और देश वैश्विक समुद्री सेवाओं के केंद्र के रूप में उभर सकता है।
प्रौद्योगिकी और डिजिटल क्षेत्र में नई साझेदारी
- भारत और यूएई के संबंध अब नई तकनीकों तक भी पहुँच चुके हैं। सी-डैक और G42 के बीच सुपरकंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सहयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
- 8 एक्साफ्लॉप सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर की स्थापना भारत की उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग क्षमता को बढ़ाएगी। इसका उपयोग एआई अनुसंधान, जलवायु मॉडलिंग, रक्षा सिमुलेशन और बिग डेटा विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में किया जा सकेगा।
- यह साझेदारी यह भी दर्शाती है कि भारत और यूएई अब केवल पारंपरिक आर्थिक क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि भविष्य की प्रौद्योगिकियों में भी रणनीतिक सहयोग विकसित कर रहे हैं।
व्यापार, निवेश और संपर्क का बढ़ता दायरा
- भारत और यूएई के बीच व्यापारिक संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) के बाद द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य बन चुका है।
- MAITRI (मैत्री) ढांचे के अंतर्गत शुरू किया गया वर्चुअल ट्रेड कॉरिडोर दोनों देशों के बीच व्यापारिक प्रक्रियाओं को डिजिटल रूप से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे लॉजिस्टिक लागत कम होगी, सीमा शुल्क प्रक्रियाएं तेज होंगी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका मजबूत होगी।
- इसके अतिरिक्त, यूएई द्वारा भारत में 5 अरब डॉलर निवेश की घोषणा दोनों देशों के आर्थिक विश्वास को दर्शाती है। अवसंरचना, बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्रों में निवेश भारत की विकास योजनाओं को गति देने में सहायक होगा।
भारत के लिए रणनीतिक महत्व
- यूएई भारत की लिंक वेस्ट नीति का महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। दोनों देश आई2यू2 और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसे बहुपक्षीय मंचों में भी सहयोग कर रहे हैं।
- यूएई में रहने वाला लगभग 35 लाख भारतीय प्रवासी समुदाय दोनों देशों के संबंधों को सामाजिक और आर्थिक आधार प्रदान करता है। इसके साथ ही यूएई भारत के लिए निवेश, ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
चुनौतियां और आगे की राह
- हालांकि संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं, लेकिन पश्चिम एशिया की अस्थिर स्थिति भारत के लिए चुनौती बनी हुई है। ईरान-यूएई तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधान और समुद्री सुरक्षा से जुड़े खतरे भारत की ऊर्जा निर्भरता को प्रभावित कर सकते हैं।
- भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना होगा ताकि वह यूएई, ईरान, सऊदी अरब और इज़राइल जैसे सभी प्रमुख देशों के साथ अपने संबंधों को समान रूप से आगे बढ़ा सके।
- आने वाले समय में भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने, नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहित करने तथा समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता होगी। साथ ही रक्षा उत्पादन, तकनीकी हस्तांतरण और डिजिटल संपर्क को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण रहेगा।
निष्कर्ष
- भारत और यूएई के बीच हालिया समझौते यह स्पष्ट करते हैं कि दोनों देशों के संबंध अब केवल तेल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। ऊर्जा, रक्षा, प्रौद्योगिकी, समुद्री सहयोग, निवेश और वैश्विक संपर्क जैसे क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग इस साझेदारी को बहुआयामी रणनीतिक संबंध में बदल रहा है।
- यह संबंध न केवल दोनों देशों की आर्थिक और सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करेगा, बल्कि पश्चिम एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति संतुलन तथा क्षेत्रीय स्थिरता को भी प्रभावित करेगा।