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भारतीय वैज्ञानिक सेवा की आवश्यकता

संदर्भ

भारतीय वैज्ञानिक सेवा (Indian Scientific Service: ISS) का प्रस्ताव आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और सशक्त प्रौद्योगिकी समूह की हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठकों के बाद चर्चा में है। इसमें भारत के डीप-टेक और एआई-प्रथम प्रशासन की ओर परिवर्तन के प्रबंधन के लिए एक विशेष कैडर की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) के बार में 

  • आई.एस.एस. को वैज्ञानिकों एवं प्रौद्योगिकीविदों के एक स्थायी व अखिल भारतीय विशेषीकृत कैडर के रूप में परिकल्पित किया गया है। 
  • सामान्य भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के विपरीत आई.एस.एस. निम्नलिखित कार्यों को संपन्न करेगा-
    • वैज्ञानिक विशेषज्ञता को मंत्रालयों की निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से एकीकृत करना
    • विशिष्ट सेवा नियमों के तहत काम करना जो पारंपरिक प्रशासनिक तटस्थता की तुलना में वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा और सहकर्मी समीक्षा को प्राथमिकता देते हैं।
    • शोधकर्ताओं को नीति निर्माण में योगदान देने के लिए एक संरचित कैरियर मार्ग प्रदान करना, ताकि वे औपनिवेशिक काल के आचरण नियमों से बाधित न हों।

भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रमुख प्रवृत्ति (2025-26):

  • नवाचार में प्रगति: भारत वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) 2025 में 38वें स्थान पर पहुंच गया है और लगातार 15 वर्षों से निम्न-मध्यम आय वर्ग में अग्रणी बना हुआ है।
  • अनुसंधान एवं विकास में ठहराव: वृद्धि के बावजूद भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (GERD) जी.डी.पी. का 0.64% बना हुआ है जो अमेरिका (3.48%) या दक्षिण कोरिया (4.91%) की तुलना में काफी कम है।
  • पेटेंट में उछाल: वर्ष 2020 और 2025 के बीच पेटेंट आवेदनों की संख्या लगभग दोगुनी हो गयी है और अब भारत कुल दाखिल किए गए पेटेंटों के मामले में वैश्विक स्तर पर 6वें स्थान पर है।
  • डीप-टेक फोकस: सरकार द्वारा राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (6,003 करोड़) और इंडियाएआई मिशन सहित मेगा-मिशनों को संचालित किया जा रहा है जिससे सेवाओं से ध्यान हटकर उच्च स्तरीय हार्डवेयर एवं आईपी निर्माण पर केंद्रित हो गया है।

समर्पित आई.एस.एस. की आवश्यकता

  • आधुनिक प्रशासन की जटिलता: सामान्य विशेषज्ञों के पास प्राय: जैव-प्रौद्योगिकी या कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे उभरते क्षेत्रों को विनियमित करने के लिए तकनीकी ज्ञान की कमी होती है। उदाहरण के लिए, डिजिटल इंडिया अधिनियम 2025 के त्वरित मसौदे के लिए एल्गोरिथम पूर्वाग्रह की गहरी समझ की आवश्यकता थी, जिसे मानक प्रशासनिक प्रशिक्षण में शामिल नहीं किया जाता है।
  • अंतराल को पाटना: भारत को प्रयोगशाला अनुसंधान (TRL 1-3) को बाजार के लिए तैयार उत्पादों (TRL 7-9) में बदलने मेंकठिनाई होती है। उदाहरण के लिए, हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में विश्व स्तरीय अनुसंधान के बावजूद औद्योगिक उपयोग के लिए इस तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करने में विभाजित तकनीकी पर्यवेक्षण के कारण देरी हुई है।
  • वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा और स्वतंत्रता: वर्तमान नियम (सी.सी.एस. आचरण नियम 1964) वैज्ञानिकों को सत्ता के समक्ष सच बोलने के लिए दंडित कर सकते हैं यदि यह नीति के विपरीत हो। उदाहरण के लिए, हाल ही में हिमालय में आए पारिस्थितिक संकटों के दौरान वैज्ञानिकों को प्राय: बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को चुनौती देने वाली पर्यावरणीय चेतावनियों को आधिकारिक रूप से दर्ज करने में नौकरशाही संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ा।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा: वैश्विक मानकों (जी2जी प्रमाणन) में अग्रणी बनने के लिए भारत को वैज्ञानिक-राजनयिकों की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बातचीत करने के लिए ऐसे वार्ताकारों की आवश्यकता होती है जो लिथोग्राफी व मैटेरियल विज्ञान (Material Sciences) को सूक्ष्म स्तर पर समझते हों।
  • दीर्घकालिक दूरदर्शिता: प्रशासनिक भूमिकाएँ प्राय: परिवर्तनशील और अल्पकालिक होती हैं जबकि वैज्ञानिक चुनौतियों के लिए दशकों की निरंतरता की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के लिए एक दशक लंबी कार्ययोजना की आवश्यकता है जो एक संयुक्त सचिव के सामान्य 3-वर्षीय कार्यकाल से कहीं अधिक लंबी हो।

सर्वोत्तम वैश्विक पद्धतियाँ

  • अमेरिका (वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा नीतियां): अमेरिकी संघीय एजेंसियों के पास औपचारिक नीतियां हैं जो वैज्ञानिकों को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि राजनीतिक सुविधा के लिए डेटा में बदलाव न किया जाए।
  • यूनाइटेड किंगडम (सरकारी विज्ञान एवं इंजीनियरिंग वृत्ति): यू.के. ने सरकार में 10,000 से अधिक सदस्यों के साथ एक समर्पित जी.एस.ई.पी. कैडर बनाया हुआ है और यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक मंत्रालय में मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार के पास विशेषज्ञों की एक संरचित टीम हो।

आई.एस.एस. से जुड़ी चुनौतियाँ

  • सामान्यवादी बनाम विशेषज्ञ के बीच टकराव: एकीकरण से आई.ए.एस. (IAS) व आई.एस.एस. (ISS) अधिकारियों के बीच वरिष्ठता और प्राधिकार को लेकर वर्चस्व की लड़ाई छिड़ सकती है। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य मंत्रालय में चिकित्सा पेशेवरों और प्रशासनिक सचिवों के बीच मतभेद प्राय: स्वास्थ्य नीति के कार्यान्वयन को धीमा कर देते हैं।
  • लेटरल एंट्री की बाधा: मध्य-करियर स्तरों पर उच्च-क्षमता वाले वैज्ञानिकों को लाने में पारंपरिक सेवा संघों से विरोध का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2020 के दशक की शुरुआत में लेटरल एंट्री पहलों की सीमित सफलता ने महत्वपूर्ण आंतरिक प्रणालीगत प्रतिरोध को दर्शाया है।
  • वेतन समानता: सरकारी वेतनमानों को देखते हुए निजी क्षेत्र या सिलिकॉन वैली से शीर्ष स्तर के वैज्ञानिकों को आकर्षित करना मुश्किल है। उदाहरण के लिए, देश की प्रतिभा इसरो और डी.आर.डी.ओ. में जाने की बजाय प्राय: वैश्विक तकनीकी दिग्गजों के पास चली जाती हैं जो एआई व रॉकेटरी में विशेष भूमिकाओं के लिए 5 गुना अधिक वेतन की पेशकश करते हैं।
  • पदोन्नति संरचना में कठिनता: वरिष्ठता-आधारित पदोन्नति के पक्ष में प्राय: वैज्ञानिक योग्यता को नजरअंदाज कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, सी.एस.आई.आर. प्रयोगशालाओं में वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने प्राय: करियर विकास के लिए सक्रिय अनुसंधान की तुलना में प्रशासनिक भूमिकाओं को प्राथमिकता दिए जाने पर निराशा व्यक्त की है।
  • सीमा का निर्धारण: वैज्ञानिक सलाह और राजनीतिक नीति तय करने को लेकर एक संवेदनशील संतुलन आवश्यक है अन्यथा उलझाव हो सकता है। उदाहरण के लिए, जलवायु परिवर्तन वार्ता में कोई वैज्ञानिक ‘शून्य उत्सर्जन’ का तर्क दे सकता है किंतु सरकार को इसे आर्थिक विकास के लक्ष्यों के साथ संतुलित करना होगा।

आगे की राह 

  • पायलट कैडर: भारतीय पर्यावरण एवं पारिस्थितिक सेवा और भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा जैसे उच्च प्रभाव वाले क्षेत्रों से शुरुआत करना 
  • संरचनात्मक संरक्षण: वैज्ञानिक आकलन को आधिकारिक अभिलेख में दर्ज करने को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए, भले ही अंतिम नीति भिन्न हो।
  • गतिशील वेतनमान: प्रतिभा पलायन को रोकने के लिए आई.एस.एस. के लिए प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन और बाजार-प्रतिस्पर्धी वेतन लागू करना
  • सहयोगात्मक प्रशिक्षण: सरकार के समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए आई.ए.एस. एवं आई.एस.एस. के लिए लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (मसूरी) में संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना
  • निधि-शैली के अनुदान: बहुस्तरीय अनुमोदन के बिना उच्च जोखिम वाले, उच्च लाभ वाले स्वदेशी अनुसंधान को वित्त पोषित करने के लिए आई.एस.एस. अधिकारियों को वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करना

निष्कर्ष

भारतीय वैज्ञानिक सेवा का गठन भारत के औपनिवेशिक प्रशासनिक राज्य से आधुनिक, प्रौद्योगिकी-आधारित शक्ति में परिवर्तन का अंतिम चरण है। विशेषज्ञता को संस्थागत रूप देकर भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसकी नीतियां न केवल कुशल हों, बल्कि वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ और भविष्य के लिए भी उपयुक्त हों। अब समय आ गया है कि विज्ञान को प्रशासन का आधार माना जाए, न कि केवल एक उपसाधन।

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