चर्चा में क्यों ?
हाल ही में विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है। यह कदम विपक्षी दलों की उस आपत्ति के बाद उठाया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि अध्यक्ष ने सदन में कुछ मुद्दों पर चर्चा की अनुमति नहीं दी। संसदीय नियमों के अनुसार अब प्रस्ताव की जांच और आगे की कार्यवाही की जाएगी।

प्रस्तावना
- लोकसभा अध्यक्ष भारतीय संसदीय लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण पद है।
- वह सदन की कार्यवाही का संचालन करता है, नियमों की व्याख्या करता है और संसदीय मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाता है।
- ऐसे में उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव एक गंभीर संवैधानिक कदम माना जाता है, जो जवाबदेही और लोकतांत्रिक संतुलन को दर्शाता है।
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का संवैधानिक आधार
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 94(सी) लोकसभा अध्यक्ष (या उपाध्यक्ष) को पद से हटाने का प्रावधान करता है।
- अध्यक्ष को लोकसभा के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।
- यह प्रावधान केवल लोकसभा पर लागू होता है।
- प्रक्रिया सख्त और औपचारिक है, जिससे पद की गरिमा और स्थिरता बनी रहे।
अध्यक्ष या उपाध्यक्ष कब पद छोड़ते हैं ?
- संविधान के अनुच्छेद 94 के अनुसार:
- सदस्यता समाप्त होने पर - अनुच्छेद 94(ए)
- यदि वे लोकसभा के सदस्य नहीं रहते, तो स्वतः पद छोड़ देते हैं।
- त्यागपत्र - अनुच्छेद 94(ख)
- वे लिखित रूप में त्यागपत्र देकर पद छोड़ सकते हैं।
- संकल्प द्वारा निष्कासन - अनुच्छेद 94(सी)
- सदन के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।
हटाने की प्रक्रिया
चरण 1: लिखित नोटिस
- प्रस्ताव लाने वाले सदस्य को लोकसभा के महासचिव को लिखित सूचना देनी होती है।
- कम से कम 14 दिन पूर्व नोटिस देना अनिवार्य है।
- नोटिस पर दो या अधिक सदस्यों के हस्ताक्षर हो सकते हैं।
चरण 2: कार्यसूची में सूचीबद्ध
- प्रस्ताव को सदन की कार्यसूची में शामिल किया जाता है।
चरण 3: समर्थन की जांच
- यदि कम से कम 50 सदस्य समर्थन में खड़े होते हैं, तो प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है।
- यदि 50 से कम सदस्य समर्थन करते हैं, तो प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ता।
चरण 4: चर्चा और मतदान
- प्रस्ताव पर 10 दिनों के भीतर चर्चा की जाती है।
- प्रस्तावक को अधिकतम 15 मिनट बोलने का अवसर मिल सकता है।
- बहस केवल आरोपों तक सीमित रहती है।
- प्रस्ताव पारित करने के लिए सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों का बहुमत आवश्यक है।
अध्यक्ष की भूमिका
- अध्यक्ष प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सदन में उपस्थित रह सकते हैं।
- वे सदस्य के रूप में चर्चा में भाग ले सकते हैं।
- उन्हें प्रथम दृष्टया मतदान का अधिकार है।
- लेकिन टाई की स्थिति में निर्णायक मत (Casting Vote) का प्रयोग नहीं कर सकते।
संबंधित नियम
- यह प्रक्रिया लोकसभा के कार्य संचालन एवं प्रक्रिया नियम 200–203 के अंतर्गत संचालित होती है।
- नियम 200A के अनुसार:
- प्रस्ताव में लगाए गए आरोप स्पष्ट और सटीक होने चाहिए।
- उसमें तर्क-वितर्क, व्यंग्य, अनुमान या मानहानिकारक भाषा नहीं होनी चाहिए।
- प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद प्रस्तावक को स्वतंत्र भाषण देने की अनुमति नहीं होती।
पूर्व उदाहरण
अब तक लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध तीन बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए:
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वर्ष
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अध्यक्ष
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परिणाम
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1954
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जी.वी. मावलंकर
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प्रस्ताव विफल
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1966
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हुकम सिंह
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प्रस्ताव विफल
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1987
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बलराम जाखड़
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प्रस्ताव विफल
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- अब तक किसी भी अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से पद से नहीं हटाया गया है।
निहितार्थ
संसदीय जवाबदेही
- यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि अध्यक्ष पूर्णतः निरंकुश न हों।
पद की गरिमा
- सख्त प्रक्रिया के कारण अध्यक्ष के पद की स्थिरता बनी रहती है।
राजनीतिक संदेश
- अविश्वास प्रस्ताव अक्सर राजनीतिक असहमति का संकेत होता है।
लोकतांत्रिक संतुलन
- यह सत्ता और विपक्ष के बीच संस्थागत संतुलन को बनाए रखता है।
निष्कर्ष
लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। यह पद की जवाबदेही सुनिश्चित करता है, लेकिन साथ ही इसकी प्रक्रिया इतनी कठोर है कि पद की स्थिरता और गरिमा भी बनी रहे। भारतीय संसदीय प्रणाली में यह प्रावधान लोकतंत्र की परिपक्वता और संवैधानिक संतुलन का प्रतीक है।