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भारत में शांति अधिनियम और परमाणु दायित्व सुधार: ऊर्जा विस्तार या जवाबदेही में कमी?

चर्चा में क्यों ?

संसद में हाल ही में पारित ‘शांति अधिनियम’ ने भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा संरचनात्मक बदलाव किया है। इस कानून के माध्यम से निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा संयंत्र संचालित करने की अनुमति दी गई है और परमाणु दायित्व ढांचे में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं। इसे भारत की ऊर्जा नीति में ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

भारत में परमाणु दायित्व की पृष्ठभूमि

  • भारत की परमाणु दायित्व व्यवस्था मुख्य रूप से Civil Liability for Nuclear Damage Act (CLNDA), 2010 द्वारा शासित रही है। 
  • यह कानून भारत द्वारा Convention on Supplementary Compensation for Nuclear Damage (CSC) पर हस्ताक्षर करने के बाद लागू किया गया था।
  • CLNDA की प्रमुख विशेषताएँ:
    • परमाणु दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों को शीघ्र मुआवजा सुनिश्चित करना।
    • “प्रतिपूर्ति का अधिकार (Right of Recourse)” - यदि दुर्घटना उपकरण या सेवा में दोष के कारण हो, तो संचालक आपूर्तिकर्ता से मुआवजा मांग सकता था।
    • धारा 46 - पीड़ितों को अन्य कानूनों (यहां तक कि आपराधिक कानून) के तहत भी न्याय पाने की अनुमति।
    • यह ढांचा जवाबदेही को मजबूत करता था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं ने इसे “असीमित देनदारी” का जोखिम बताते हुए आलोचना की।

भारत में परमाणु ऊर्जा की स्थिति

  • कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का योगदान लगभग 3%।
  • 2000 तक 10 गीगावाट और 2020 तक 20 गीगावाट के लक्ष्य तय किए गए थे
  • वास्तविक क्षमता:
    • 2000: 2.86 GW
    • 2020: 6.78 GW
  • मुख्य बाधाएँ:
    • उच्च पूंजी लागत
    • सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
    • दायित्व संबंधी विवाद

शांति अधिनियम: प्रमुख विशेषताएँ

निजी क्षेत्र के लिए खुला परमाणु क्षेत्र

  • अब निजी कंपनियाँ परमाणु संयंत्र संचालित कर सकती हैं। इससे केंद्र सरकार का एकाधिकार समाप्त हुआ।

आपूर्तिकर्ता के खिलाफ प्रतिपूर्ति अधिकार समाप्त

  • CLNDA के तहत मौजूद “Right of Recourse” समाप्त कर दिया गया है।
  • अब दायित्व पूरी तरह संचालक पर होगा; आपूर्तिकर्ता को कानूनी सुरक्षा मिलेगी।

देयता सीमा में बदलाव

  • छोटे संयंत्र: ₹100 करोड़
  • बड़े संयंत्र: ₹3,000 करोड़
  • कुल अधिकतम दायित्व (सरकारी योगदान सहित): लगभग ₹3,900 करोड़ (300 मिलियन SDR)
  • धारा 46 हटाए जाने से पीड़ितों की अन्य कानूनों के तहत न्याय पाने की क्षमता सीमित हो सकती है।

नियामक ढांचा

  • Atomic Energy Regulatory Board (AERB) को विधायी आधार दिया गया है, लेकिन इसकी स्वतंत्रता पर सवाल उठे हैं क्योंकि चयन प्रक्रिया परमाणु ऊर्जा आयोग से जुड़ी है।

अंतरराष्ट्रीय संदर्भ

  • ऐतिहासिक दुर्घटनाएँ:
    • Three Mile Island accident
    • Chernobyl disaster
    • Fukushima Daiichi nuclear disaster
  • इन घटनाओं में डिजाइन खामियाँ, उपकरण विफलता और आपातकालीन तंत्र की कमियाँ सामने आई थीं।
  • अंतरराष्ट्रीय परमाणु दायित्व समझौते आम तौर पर दायित्व केवल ऑपरेटर पर डालते हैं और आपूर्तिकर्ताओं को संरक्षण देते हैं।
  • शांति अधिनियम भारत को इसी मॉडल के अनुरूप बनाता है।

देयता सीमा बनाम वास्तविक नुकसान

  • फुकुशिमा की अनुमानित लागत: लगभग ₹46 लाख करोड़
  • चोर्नोबिल से बेलारूस का अनुमानित नुकसान: ₹21 लाख करोड़
  • भारत की अधिकतम देनदारी सीमा: - ₹3,900 करोड़
  • यह अंतर हजार गुना तक है, जिससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि किसी बड़ी दुर्घटना की स्थिति में वास्तविक नुकसान का अधिकांश भार समाज या सरकार पर पड़ेगा।

सुरक्षा और नैतिक जोखिम

  • “गंभीर प्राकृतिक आपदाओं” की स्थिति में दायित्व सीमित।
  • यह भारत के “पूर्ण दायित्व” सिद्धांत से अलग रुख है।
  • आलोचकों के अनुसार, सीमित देनदारी से नैतिक जोखिम बढ़ सकता है।
  • यदि आपूर्तिकर्ता और संचालक पूर्ण वित्तीय जोखिम नहीं उठाते, तो सुरक्षा निवेश पर प्रोत्साहन कम हो सकता है।

आर्थिक और रणनीतिक निहितार्थ

  • परमाणु संयंत्रों की लागत अत्यधिक।
  • अमेरिका में वेस्टिंगहाउस के AP1000 रिएक्टरों की लागत -18 अरब डॉलर प्रति रिएक्टर।
  • भारत ने 2047 तक 100 GW परमाणु क्षमता का लक्ष्य रखा है।
  • छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) अभी व्यापक रूप से प्रमाणित नहीं।

संभावित लाभ:

  • निजी और विदेशी निवेश आकर्षित हो सकता है
  • ऊर्जा विविधीकरण में मदद
  • दीर्घकालिक डीकार्बोनाइजेशन रणनीति को समर्थन

संभावित चिंताएँ:

  • सीमित दायित्व से पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा नहीं
  • नियामक स्वतंत्रता पर प्रश्न
  • सुरक्षा मानकों पर संभावित दबाव

निष्कर्ष

  • शांति अधिनियम भारत की परमाणु ऊर्जा नीति में एक बड़ा मोड़ है।
  • यह व्यावसायिक अवसरों और विदेशी निवेश के द्वार खोल सकता है, लेकिन साथ ही जवाबदेही, सुरक्षा और पीड़ित संरक्षण के प्रश्न भी खड़े करता है।
  • अब चुनौती यह है कि भारत ऊर्जा विस्तार और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है - ताकि परमाणु ऊर्जा विकास का साधन बने, जोखिम का नहीं।
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