संदर्भ
संसद के शीतकालीन सत्र में पारित शांति अधिनियम (SHANTI Act) भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव का संकेत देता है। यह कानून न केवल निजी कंपनियों को परमाणु संयंत्रों के संचालन की अनुमति देता है बल्कि परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम (Civil Liability for Nuclear Damage Act: CLNDA) के तहत निर्धारित दायित्व व्यवस्था में भी व्यापक संशोधन करता है। विशेष रूप से आपूर्तिकर्ताओं को दी गई क्षतिपूर्ति (इंडेम्निटी) और दुर्घटना की स्थिति में दायित्व सीमा तय करने के प्रावधानों ने सुरक्षा, पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
अधिनियम की संरचनात्मक विशेषताएँ
शांति (SHANTI) अधिनियम तीन प्रमुख आयामों में परिवर्तन करता है।
- पहला, यह केंद्र सरकार के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र पर दशकों पुराने एकाधिकार को समाप्त करता है। अब निजी क्षेत्र की कंपनियाँ परमाणु संयंत्रों का संचालन कर सकेंगी। इसे ऊर्जा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और निवेश आकर्षित करने के कदम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
- दूसरा, दायित्व की पूरी जिम्मेदारी संयंत्र संचालक (ऑपरेटर) पर केंद्रित कर दी गई है। पूर्व व्यवस्था में मौजूद ‘राइट ऑफ रिकॉर्स’— जिसके तहत ऑपरेटर दोषपूर्ण उपकरण की स्थिति में आपूर्तिकर्ता पर मुकदमे की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।
- छोटे संयंत्रों के लिए ऑपरेटर की अधिकतम देनदारी ₹100 करोड़ और बड़े संयंत्रों के लिए ₹3,000 करोड़ तय की गई है।
- कुल दायित्व, जिसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी भी शामिल है, 300 मिलियन विशेष आहरण अधिकार (SDR) यानी लगभग ₹3,900 करोड़ तक सीमित है।
- CLNDA की धारा 46 को भी हटा दिया गया है जो पीड़ितों को अन्य दीवानी या आपराधिक कानूनों के तहत राहत पाने का अधिकार देती थी।
- तीसरा, अधिनियम परमाणु नियामक व्यवस्था के लिए विधायी आधार प्रदान करता है। हालाँकि, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (Atomic Energy Regulatory Board: AERB) को औपचारिक कानूनी दर्जा दिया गया है किंतु इसके सदस्यों के चयन की प्रक्रिया परमाणु ऊर्जा आयोग (Atomic Energy Commission) द्वारा गठित समिति के हाथ में होने से इसकी संस्थागत स्वतंत्रता पर प्रश्न उठते हैं।
आपूर्तिकर्ताओं को संरक्षण: ऐतिहासिक अनुभवों की अनदेखी
- परमाणु दुर्घटनाओं का इतिहास बताता है कि तकनीकी और डिज़ाइन संबंधी कमियाँ बड़े हादसों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं।
- फुकुशिमा दाइची परमाणु आपदा में GE के मार्क-1 कंटेनमेंट डिज़ाइन की कमजोरी पहले से इंगित की जा चुकी थी।
- चेर्नोबिल आपदा के विश्लेषण में रिएक्टर की संरचनात्मक खामियों, जैसे- पॉजिटिव पावर कोएफिशिएंट और आपातकालीन शटडाउन प्रणाली की अक्षमता— को प्रमुख कारण माना गया।
- थ्री माइल आइलैंड दुर्घटना की जांच में नियंत्रण कक्ष की डिज़ाइन त्रुटियों व आपूर्तिकर्ता द्वारा ज्ञात जोखिमों की अपर्याप्त जानकारी साझा करने की आलोचना की गई।
- इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका को पूरी तरह दायित्व से मुक्त करना वैज्ञानिक या ऐतिहासिक दृष्टि से संतुलित निर्णय नहीं कहा जा सकता है।
- फिर भी, अमेरिकी एवं अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में संभावित कानूनी जोखिमों को लेकर लंबे समय से असंतोष जताती रही हैं। वर्ष 2026 के अमेरिकी राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम में भारत से अपने परमाणु दायित्व कानूनों को ‘अंतर्राष्ट्रीय मानकों’ के अनुरूप बनाने की अपेक्षा भी दर्ज की गई है— ऐसे मानक जो प्रायः आपूर्तिकर्ताओं के हित में होते हैं। शांति अधिनियम इन चिंताओं को दूर करता प्रतीत होता है।
दायित्व सीमा एवं वास्तविक क्षति: एक असमान तुलना
- संभावित परमाणु दुर्घटनाओं की आर्थिक लागत अत्यंत व्यापक हो सकती है। जापान सेंटर फॉर इकोनॉमिक रिसर्च के अनुसार, फुकुशिमा दुर्घटना से संबंधित कुल व्यय 80 ट्रिलियन येन (लगभग ₹46 लाख करोड़) तक पहुँच सकता है। संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, चेरनोबिल दुर्घटना से केवल बेलारूस को ही लगभग $235 अरब (करीब ₹21 लाख करोड़) का नुकसान हुआ।
- इसके मुकाबले शांति अधिनियम के तहत अधिकतम दायित्व सीमा इन संभावित नुकसानों की तुलना में अत्यंत नगण्य है। अंतर्राष्ट्रीय पूरक मुआवजा सम्मेलन से अतिरिक्त सहायता मिलने पर भी कुल उपलब्ध राशि संभावित क्षति के एक प्रतिशत तक भी नहीं पहुँच पाएगी। ऐसे परिदृश्य में पीड़ितों के पास निर्धारित सीमा से अधिक मुआवजे का कानूनी अधिकार नहीं होगा।
‘मोरल हैज़र्ड’ और सुरक्षा पर प्रभाव
- आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, जब किसी संस्था को उसके जोखिमपूर्ण निर्णयों के परिणामों से कानूनी या वित्तीय सुरक्षा मिल जाती है तो ‘मोरल हैज़र्ड’ उत्पन्न होता है। इससे जोखिम उठाने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
- शांति अधिनियम में ‘गंभीर प्राकृतिक आपदा’ के मामलों में ऑपरेटर को दायित्व से छूट देने का प्रावधान है। यह भारत के पूर्व स्थापित ‘पूर्ण दायित्व’ (Absolute Liability) सिद्धांत से एक महत्वपूर्ण विचलन है। जबकि फुकुशिमा दुर्घटना स्वयं एक सुनामी के कारण हुई थी, ऐसे प्रावधान उद्योग की ओर से अतिरिक्त सुरक्षा उपायों में निवेश की प्रेरणा को कम कर सकते हैं।
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भारत में परमाणु ऊर्जा की वास्तविक स्थिति
- भारत की कुल विद्युत उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का योगदान लंबे समय से लगभग 3% के आसपास बना हुआ है।
- 1980 के दशक में वर्ष 2000 तक 10 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया गया था किंतु 2000 में वास्तविक क्षमता मात्र 2.86 गीगावाट थी।
- 2006 में 2020 तक 20 गीगावाट का लक्ष्य रखा गया, जबकि 2020 में क्षमता 6.78 गीगावाट ही रही।
- इन लक्ष्यों की विफलता के पीछे उच्च पूंजीगत लागत, निर्माण में विलंब और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ जैसे संरचनात्मक कारण रहे हैं। सरकार द्वारा प्रचारित ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर’ (SMR) तकनीक अभी व्यापक रूप से परीक्षणित नहीं है और इसकी प्रति यूनिट लागत अधिक आँकी जाती है। ऐसे में 2047 तक 100 गीगावाट का नया लक्ष्य महत्वाकांक्षी तो है, पर व्यवहारिकता पर प्रश्नचिह्न बना हुआ है।
आर्थिक अवसर बनाम सार्वजनिक जोखिम
- यद्यपि परमाणु ऊर्जा की वर्तमान हिस्सेदारी सीमित है किंतु बड़े रिएक्टरों की स्थापना विशाल वाणिज्यिक अवसर प्रदान करती है। उदाहरणस्वरूप, अमेरिका के जॉर्जिया राज्य में स्थापित दो Westinghouse AP1000 रिएक्टरों की लागत लगभग 18 अरब डॉलर प्रति इकाई रही।
- शांति अधिनियम निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ऐसे निवेश अवसरों का लाभ उठाने की सुविधा देता है। किंतु आलोचकों का तर्क है कि यह सुविधा सीमित दायित्व और नियंत्रित नियामक ढांचे के माध्यम से प्रदान की जा रही है जिससे दुर्घटना की स्थिति में आर्थिक जोखिम का बड़ा हिस्सा अंततः राज्य व नागरिकों पर आ सकता है।
निष्कर्ष
शांति अधिनियम को एक ओर परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के उदारीकरण एवं निवेश आकर्षण की दिशा में कदम माना जा सकता है, तो दूसरी ओर यह दायित्व, सुरक्षा व सार्वजनिक हित के संतुलन को पुनर्परिभाषित करता है। मूल प्रश्न यह है कि क्या आर्थिक अवसरों को बढ़ावा देने के लिए जवाबदेही के ढांचे को सीमित करना दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित एवं न्यायसंगत नीति सिद्ध होगा।