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एआई युग में व्यक्तित्व अधिकार: पहचान सुरक्षा की नई चुनौती

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)

संदर्भ

  • हाल ही में अभिषेक बच्चन व ऐश्वर्या राय बच्चन ने गूगल और यूट्यूब के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में मामला दर्ज कराया। उनका आरोप है कि एआई द्वारा बनाए गए फर्जी और अनुचित वीडियो उनके नाम, छवि एवं आवाज़ का दुरुपयोग करके उनकी प्रतिष्ठा तथा आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। 
  • यह मामला दिखाता है कि एआई के युग में पहचान (Identity) और वास्तविकता (Authenticity) के बीच की रेखाएँ धुंधली हो गई हैं जिससे व्यक्तित्व अधिकार की सुरक्षा को लेकर गंभीर कानूनी, नैतिक व तकनीकी चिंताएँ उभर रही हैं।

व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) से तात्पर्य

  • व्यक्तित्व अधिकार का अर्थ किसी व्यक्ति के नाम, छवि, तस्वीर, आवाज़, हस्ताक्षर, शैली, व्यक्तित्व या पहचान के किसी भी पहलू पर उसके नियंत्रण से है।
  • ये अधिकार तीन बड़े सिद्धांतों पर आधारित हैं:
  1. गोपनीयता (Privacy)
  2. गरिमा (Dignity)
  3. आर्थिक स्वामित्व (Economic autonomy)
  • इनका उद्देश्य है कि कोई व्यक्ति उसकी पहचान के किसी हिस्से का बिना अनुमति व्यावसायिक, राजनीतिक या मनोरंजन उद्देश्यों के लिए उपयोग न करे।

संबंधित कानून व प्रमुख निर्णय

भारत में व्यक्तित्व अधिकार किसी विशेष कानून में परिभाषित नहीं हैं। ये मुख्यतः अनुच्छेद 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और न्यायालयों के निर्णयों पर आधारित हैं।

मुख्य निर्णय

  • के.एस. पुट्टस्वामी केस (2017) : निजता को मौलिक अधिकार माना गया।
  • अमिताभ बच्चन बनाम राजत नागी (2022) : न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी सेलिब्रिटी (प्रतिष्ठित व्यक्ति) की पहचान का व्यावसायिक दुरुपयोग प्रतिबंधित है।
  • अनिल कपूर बनाम सिम्पली लाइफ (2023) : ‘झकास’ जैसे शब्द और उनके रूप-रंग के एआई संस्करणों के इस्तेमाल पर रोक।
  • अरिजीत सिंह बनाम कोडिबल वेंचर्स (2024) : उनके एआई निर्मित आवाज़ के उपयोग को प्रतिबंधित किया गया।

कानूनी ढाँचा

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), 2000 : ऑनलाइन पहचान की नकल (Impersonation) प्रतिबंधित।
  • मध्यस्थ दिशा-निर्देश, 2024 : फर्जी एआई सामग्री हटाने की ज़िम्मेदारी प्लेटफॉर्म पर।
  • हालाँकि, कानून में अभी भी बिखराव है और एआई की तेजी से बढ़ती तकनीक के अनुरूप नहीं है।

हालिया चर्चित मामलों के उदाहरण

  • अभिषेक और ऐश्वर्या केस (2025) : एआई वीडियो से प्रतिष्ठा को नुकसान
  • अनिल कपूर केस (2023) : एआई से चेहरा व आवाज़ उपयोग पर रोक
  • अरिजीत सिंह केस (2024) : आवाज़ की नक़ल करने पर सुरक्षा
  • अमिताभ बच्चन केस (2022) : उनके नाम/आवाज़/छवि के अनधिकृत उपयोग पर रोक

व्यक्तित्व का अधिकार एवं एआई का खतरा

  • एआई आधारित टूल, विशेषकर डीपफेक, वॉयस क्लोनिंग, इमेज जेनरेशन व्यक्ति की पहचान को निम्न तरीकों से नुकसान पहुँचाते हैं:
  • फर्जी वीडियो बनाकर प्रतिष्ठा धूमिल करना
  • महिलाओं पर अश्लील डीपफेक हमला
  • राजनेताओं के फर्जी बयान फैलाकर गलत सूचना (Misinformation)
  • मृत कलाकारों की आवाज़/छवि का अनैतिक पुनर्प्रयोग
  • पहचान के व्यावसायिक मूल्य (Brand Value) को नुकसान
  • एआई व्यक्ति की पहचान को ‘कमोडिटी’ में बदल रही है जिसे बिना अनुमति डाटा की तरह प्रयोग किया जा सकता है।

यूनेस्को दिशानिर्देश

यूनेस्को की ए.आई. नैतिक दिशा-निर्देश (2021) में यह स्पष्ट है कि :

  • एआई को मानव गरिमा का सम्मान करना चाहिए
  • पहचान का लाभ उठाना/शोषण (Identity Exploitation) प्रतिबंधित होना चाहिए
  • एआई मॉडल प्रशिक्षण में किसी व्यक्ति के डेटा का उपयोग स्पष्ट सहमति से होना चाहिए
  • डीपफेक सामग्री को स्पष्ट रूप से लेबल करना आवश्यक होना चाहिए
  • पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर देना चाहिए 

ये दिशानिर्देश अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत बनाने का रास्ता दिखाते हैं।

सरकारी प्रयास

  • डीपफेक एडवाइजरी (2024) : डीपफेक को लेकर जागरूकता व प्लेटफॉर्म जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में पहला कदम
  • MeitY दिशा-निर्देश : फर्जी सामग्री तुरंत हटाने का निर्देश
  • डिजिटल भारत अधिनियम (प्रस्तावित) : एआई अपराधों पर कड़े दंड का प्रस्ताव
  • हालाँकि, अभी भी व्यापक, स्पष्ट एवं विशेष कानून का अभाव है।

चुनौतियाँ

  • एआई की विकास गति तेज़ होना, जबकि कानून में संशोधन धीमा होना 
  • डीपफेक की पहचान में कठिनता और कई बार लगभग वास्तविक महसूस होना  
  • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की सीमित जवाबदेही 
  • सीमापार डेटा का प्रवाह से विनियमन मुश्किल होना 
  • निजी कंपनियों द्वारा व्यक्तियों के डेटा का दुरुपयोग
  • कानूनी परिभाषाओं में अस्पष्टता (Voice, Style, Likeness आदि) 
  • अनेक देशों में अलग-अलग कानूनी ढाँचे

आगे की राह

  • भारत को एक अलग कानून चाहिए जो पहचान की परिभाषा स्पष्ट करे
  • आवाज़, शैली, छवि आदि को कानूनी सुरक्षा दे
  • हर एआई सामग्री पर पहचान-चिह्न (Watermark) अनिवार्य हो
  • सोशल मीडिया पर फर्जी एआई सामग्री रोकने की कानूनी ज़िम्मेदारी तय हो
  • यूनेस्को मानकों के अनुरूप अंतर्राष्ट्रीय ढाँचा विकसित किया जाए
  • डिजिटल फॉरेंसिक क्षमता का राष्ट्रीय स्तर पर विकास हो 
  • पीड़ितों के लिए त्वरित राहत तंत्र की व्यवस्था हो 
  • शिकायत निवारण के लिए समयबद्ध और सुलभ प्रणाली बने

निष्कर्ष

एआई ने रचनात्मकता व तकनीकी प्रगति के नए रास्ते खोले हैं किंतु इससे व्यक्ति की पहचान को गंभीर खतरे भी पैदा हुए हैं। इसीलिए भारत को एक ऐसा कानून चाहिए जो पहचान के हर पहलू की रक्षा करे और एआई को जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करने का ढांचा प्रदान करे।

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