(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक मुद्दे) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान व निकाय) |
संदर्भ
चंडीगढ़ में एक हालिया मामले में एक कॉलेज प्रोफेसर को आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की जाँच के बाद पद से हटा दिया गया। यह POSH Act, 2013 के तहत दुर्लभ किंतु महत्वपूर्ण न्यायिक कदम माना गया। इस मामले ने कानून की उपयोगिता को प्रमाणित किया है किंतु साथ ही इसके भीतर मौजूद बड़ी खामियों व सीमाओं को भी सामने ला दिया है।
हालिया मामला
- सितंबर 2024 में छात्रों ने एक कॉलेज प्रोफेसर के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई।
- आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने जांच की और आरोपों को सही पाया।
- इसके बाद प्रोफेसर को संस्थान से बर्खास्त कर दिया गया। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि POSH कानून के तहत बहुत कम बार ऐसे मामलों में स्पष्ट कार्रवाई देखी जाती है।
POSH कानून के बारे में
- कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं निवारण) अधिनियम, 2013 [Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013] को वर्ष 2013 में पारित किया गया था।
- इसे ‘कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न अधिनियम (Prevention of Sexual Harassment: PoSH Act), 2013 भी कहते हैं।
- इसका उद्देश्य कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम, निषेध एवं निवारण सुनिश्चित करना है।
मुख्य प्रावधान
- हर संस्था में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) गठित करना अनिवार्य
- शिकायत दर्ज करने की समय सीमा 3 महीने
- कार्यस्थल की सुरक्षा, गोपनीयता एवं त्वरित न्याय का लक्ष्य
- हालाँकि, समय के साथ कई व्यावहारिक चुनौतियाँ सामने आई हैं।
सहमति की त्रुटिपूर्ण अवधारणा
- POSH Act सहमति (Consent) को मानता है किंतु सूचित सहमति (Informed Consent) को नहीं पहचानता।
- कई बार शक्ति असंतुलन, भावनात्मक दबाव या अधूरी जानकारी के कारण दिखाई देने वाली सहमति वास्तव में वास्तविक सहमति नहीं होती।
- कार्यस्थल व अकादमिक संस्थानों में संबंध कभी-कभी शुरुआत में सहमति से लगते हैं, पर बाद में पता चलता है कि वह भावनात्मक हेरफेर या दबाव का परिणाम था।
- POSH कानून इस मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक एवं परोक्ष शोषण को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं करता।
संस्थानों के बीच शिकायतों पर स्पष्टता का अभाव
- अकादमिक क्षेत्र में शिक्षक, शोधकर्ता एवं विद्यार्थी कई संस्थानों में जाते हैं।
- यदि कोई आरोपी कई संस्थानों में गलत व्यवहार करता है तो अलग-अलग संस्थानों में दर्ज शिकायतों को जोड़ने या समन्वित ढंग से जाँच करने का कोई तंत्र नहीं है।
- इसका लाभ उठाकर आरोपी कई बार संस्थान बदलकर बच निकलते हैं।
सबूतों की कमी की समस्या
- POSH Act में परिभाषाएँ अस्पष्ट हैं और इसका प्रभाव यह होता है कि प्राय: पीड़िता पर ही पूरे सबूत का भार डाल दिया जाता है।
- यौन उत्पीड़न प्राय: एकल घटना नहीं है बल्कि व्यवहार का लगातार पैटर्न होता है जिसका प्रत्यक्ष सबूत जुटाना कठिन होता है।
- डिजिटल युग में कई तरह के डिजिटल सबूत (डिसअपीयरिंग मैसेज, एन्क्रिप्टेड चैट) होते हैं जिन्हें समझना व प्रमाणित करना ICC के लिए कठिन है।
- ICC सदस्यों को कानूनी और तकनीकी प्रशिक्षण न होने से जांच प्रभावित होती है।
चुनौतियाँ
- शिकायत दर्ज करने की सीमा केवल 3 महीने की है जबकि मानसिक रूप से समझने और रिपोर्ट करने में समय लगता है।
- अस्पष्ट भाषा, जैसे- आरोपी को ‘प्रतिवादी (Respondent)’ कहना, मामले की गंभीरता को कम कर देता है।
- भावनात्मक व डिजिटल उत्पीड़न को कानून में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है।
- डिजिटल सबूतों की जांच के लिए मानक प्रक्रियाओं का अभाव है।
- संस्थागत हिचकिचाहट व देरी से पीड़िता पुनः आघात झेलती है।
- ‘मालिशियस कम्प्लेंट’ धारा के दुरुपयोग के डर से वास्तविक पीड़ित(ता) भी आगे आने में संकोच करते हैं।
- शक्ति असंतुलन, विशेषकर अकादमिक संस्थानों में, जिससे शिकायत करना मुश्किल हो जाता है।
यौन उत्पीड़न से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय वैधानिक रूपरेखा
- मानवाधिकारों की सर्वभौमिक घोषणा पत्र, 1948 : सम्मान, अधिकार एवं स्वतंत्रता में बराबरी और सभी तरह के भेदभाव से सुरक्षा की बात करता है।
- ILO भेदभाव {व्यवसाय एवं रोजगार समझौता, 1958 (111)} : इसका उद्देश्य रोजगार और व्यवसाय में लिंग, नस्ल, रंग, धर्म, राजनीतिक विचार किसी विशेष देश या समाज में जन्म के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा देना है।
- महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अभिसमय (CEDAW), 1979: भारत ने इस पर हस्ताक्षर और इसका अनुसमर्थन किया है।
- संयुक्त राष्ट्र का बीजिंग महिला सम्मेलन, 1995 : बीजिंग कार्यवाई मंच ने महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने और महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न सहित सभी प्रकार की हिंसा को समाप्त करने का आह्वान किया।
यौन उत्पीड़न से संबंधित राष्ट्रीय वैधानिक रूपरेखा
- विशाखा दिशानिर्देश : वर्ष 1997 में विशाखा निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने CEDAW रुपरेखा का प्रयोग किया तथा कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए विशिष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित जारी किए।
- विशाखा दिशा-निर्देशों में यौन उत्पीड़न को परिभाषित किया गया है तथा नियोक्ताओं द्वारा अपनाए जाने वाले निवारक उपायों और निवारण तंत्रों को संहिताबद्ध किया गया है।
- कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम (POSH Act): वर्ष 2013 के इस अधिनियम का उद्देश्य कार्यस्थल पर महिलाओं को सुरक्षित माहौल प्रदान करना है।
- इसमें शिकायत समितियों का गठन, शिकायतों की जांच और उचित कार्रवाई का प्रावधान है।
- शी-बॉक्स (Sexual Harassment electronic–Box : SHe-Box) : यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा जुलाई 2017 में प्रारंभ एक ऑनलाइन शिकायत प्रबंधन प्रणाली है।
- इसका उद्देश्य कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना है।
- निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ (2018) : सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 228A में अनिवार्य रूप से यौन अपराधों के पीड़ितों के नाम और पहचान के प्रकटीकरण के दंड के महत्व को समझाया, जिसे अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 72 एवं 73 में दोहराया गया है।
- इस प्रावधान का उद्देश्य पीड़ितों को शत्रुतापूर्ण भेदभाव और भविष्य के उत्पीड़न से बचाना है।
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यौन उत्पीड़न के विरुद्ध सुझाव
- सशक्तिकरण और जागरूकता : महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों और सुरक्षा उपायों के बारे में शिक्षित करना आवश्यक है।
- कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल का निर्माण : संगठनों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका कार्यस्थल महिलाओं के लिए सुरक्षित हो। इसके लिए POSH समितियों का गठन और कार्यान्वयन महत्वपूर्ण है।
- समानता की संस्कृति का विकास : संगठनों को एक ऐसी कार्यसंस्कृति का निर्माण करना चाहिए जहां सभी कर्मचारियों को समान रूप से सम्मानित किया जाए और यौन उत्पीड़न के प्रति जीरो-टॉलरेंस की नीति अपनाई जाए।
- सख्त नीतियाँ और कानूनी कार्रवाई : कार्यस्थल पर हमले के संदर्भ में, विशाखा दिशानिर्देश, कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 और हेमा समिति के सुझावों को सरकार को प्रभावी रूप से लागू करने पर बल देना चाहिए।
- यौन उत्पीड़न के मामलों में तेज और प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि अपराधियों को दंड मिले।
आगे की राह
POSH कानून को प्रभावी बनाने के लिए निम्न सुधार आवश्यक हैं:
- स्पष्ट भाषा व परिभाषाएँ : ‘सूचित सहमति’, ‘भावनात्मक उत्पीड़न’ एवं ‘मनोवैज्ञानिक शोषण’ को कानून में शामिल किया जाए।
- शिकायत अवधि बढ़ाना : 3 महीने की समय सीमा को बढ़ाकर वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप किया जाए।
- डिजिटल सबूतों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल : ICC के सभी सदस्यों को तकनीकी और कानूनी प्रशिक्षण अनिवार्य हो।
- अंतर-संस्थागत प्रणाली : कई संस्थानों में फैले आरोपों को जोड़ने और संयुक्त जांच करने की व्यवस्था बने।
- भावनात्मक एवं परोक्ष उत्पीड़न को मान्यता : हेरफेर, धोखाधड़ी एवं शक्ति आधारित संबंधों को भी यौन उत्पीड़न की श्रेणी में शामिल किया जाए।
- पीड़िता-केंद्रित दृष्टिकोण : न्याय प्रक्रिया को कम बोझिल, संवेदनशील एवं समयबद्ध बनाया जाए।
निष्कर्ष
POSH अधिनियम, 2013 एक ऐतिहासिक कदम है किंतु वर्ष 2025 में समाज की बदलती जरूरतों, डिजिटल परिवेश एवं मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न की जटिलताओं को देखते हुए इसे अधिक मजबूत बनाना अनिवार्य है ताकि न्याय किसी पीड़िता के धैर्य पर नहीं, बल्कि कानून की मजबूती पर टिका हो।
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क्या आप जानते हैं?
मी टू कैंपेन : सोशल मीडिया पर #MeToo का पहला इस्तेमाल वर्ष 2006 में अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता तराना बर्क ने माईस्पेस नामक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किया था। यह महिलाओं पर होने वाले यौन उत्पीड़न, शोषण एवं बलात्कार के खिलाफ आंदोलन है। भारत में वर्ष 2018 के बाद यह प्रचलन में है।
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