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प्रेह विहार मंदिर

(प्रारंभिक परीक्षा: अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: राष्ट्रीय सीमाओं का पुनःसीमांकन, उपनिवेशवाद, उपनिवेशवाद की समाप्ति)

संदर्भ 

प्रेह विहार मंदिर कंबोडिया एवं थाईलैंड की प्राकृतिक सीमा पर स्थित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में स्थित होने के कारण थाईलैंड एवं कंबोडिया के बीच सीमा विवाद का केंद्र बना हुआ है। 

मंदिर का स्थापत्य एवं इतिहास

  • अवस्थिति व निर्माण: यह मंदिर कंबोडिया के प्रेह विहार प्रांत में स्थित है। इसका निर्माण 9वीं से 12वीं सदी के मध्य यशोवर्मन प्रथम, सूर्यवर्मन प्रथम एवं द्वितीय जैसे खमेर राजाओं द्वारा कराया गया था।
  • देवता: यह मंदिर मूल रूप से भगवान शिव को ‘श्री शिखारिस्वर’ (पर्वत के गौरवशाली स्वामी) के रूप में एक पवित्र पर्वतीय निवास के रूप में समर्पित था।
  • यह मंदिर मैदानों से 700 मीटर से अधिक ऊँचाई पर स्थित है। 

मंदिर की वास्तुकला विशेषताएँ 

  • अधिकांश खमेर मंदिर पूर्वमुखी आयताकार होते थे, जबकि प्रेह विहार मंदिर एक सीधी (उत्तर-दक्षिण दिशा वाली) रेखा का अनुसरण करता है।
  • इस परिसर में 800 मीटर से अधिक लंबी पक्की सड़कें और सीढ़ियाँ बनी हुई हैं जो कई गर्भगृहों को जोड़ती हैं।
  • इसमें पाँच अलंकृत गोपुरम (प्रवेश द्वार) हैं। गोपुरम (प्रवेश द्वार) पर हिंदू पौराणिक कथाओं और खमेर प्रतीकों की नक्काशी की गई है। 

थाईलैंड-कंबोडिया सीमा विवाद की जड़ें

यह मंदिर लंबे समय से थाईलैंड और कंबोडिया के बीच तनाव का केंद्र रहा है।

  • औपनिवेशिक विरासत: विवाद की जड़ें 1904 और 1907 की फ्रांसीसी-सियामी संधियों में निहित हैं जिन्होंने डांगरेक पर्वत श्रृंखला की जलविभाजक रेखा (Watershed Line) के साथ सीमा निर्धारण किया था।
  • विवादास्पद मानचित्र: फ्रांसीसी सर्वेक्षकों द्वारा बनाए गए नक्शों में प्रेह विहार मंदिर को कंबोडियाई हिस्से में दिखाया गया था, यद्यपि यह मंदिर एक ऐसी चट्टान की चोटी पर स्थित था जहाँ थाईलैंड से आसानी से पहुँचा जा सकता था। 
  • स्वतंत्रता के बाद का दावा: वर्ष 1953 में कंबोडिया को फ्रांस से स्वतंत्रता मिलने के बाद उसने मंदिर पर अपना दावा फिर से जताया किंतु उस क्षेत्र पर थाई सेना का नियंत्रण था।  

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के निर्णय 

  • 1962 का निर्णय: कंबोडिया मंदिर से संबंधित विवाद को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में ले गया। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने 1962 में विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाया कि मंदिर कंबोडिया की संप्रभुता वाले क्षेत्र में स्थित है। 
  • निर्णय के आधार: न्यायालय ने फ्रांसीसी-सियामी संधि और संलग्न मानचित्रों को आधार बनाया। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने थाईलैंड को आदेश दिया कि वह अपनी सैन्य/पुलिस बल को वापस बुलाए और मंदिर से हटाई गई सभी वस्तुओं को कंबोडिया को वापस करे। 
  • विवाद का जारी रहना: यद्यपि मंदिर तो कंबोडिया को सौंप दिया गया किंतु आसपास की भूमि पर संप्रभुता अपरिभाषित रही, जिससे भविष्य के विवादों की स्थिति उत्पन्न हुई।
  • 2013 का निर्णय: वर्ष 2008 में यूनेस्को द्वारा मंदिर को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किए जाने के बाद पुनः सीमा विवाद उभरकर सामने आया। अतः कंबोडिया ने अप्रैल 2011 में 1962 के फैसले की व्याख्या के लिए ICJ से अनुरोध किया। 
    • 11 नवंबर, 2013 को न्यायालय ने सर्वसम्मति से घोषणा की कि 1962 के फैसले में यह निर्धारित किया गया था कि कंबोडिया को ‘प्रेह विहार प्रायद्वीप के पूरे क्षेत्र पर संप्रभुता’ प्राप्त है।
    • न्यायालय ने थाईलैंड को उस क्षेत्र से अपनी सेना वापस बुलाने का आदेश दिया और दोनों देशों से मंदिर के संरक्षण में सहयोग करने का आग्रह किया। 

हालिया संघर्ष और राजनयिक हस्तक्षेप

इन फैसलों के बावजूद तनाव बना रहा और सीमा पर समय-समय पर झड़पें होती रहीं हैं-

  • जुलाई 2025 का संघर्ष: सीमांकित सीमा पर तनाव खुले संघर्ष में बदल गया, जिसमें कई लोग मारे गए और 3 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए। वस्तुतः मलेशिया और अमेरिका के राजनयिक हस्तक्षेप से संघर्ष विराम हुआ।
  • नवंबर/दिसंबर में तनाव: थाईलैंड द्वारा युद्धविराम को निलंबित करने की घोषणा के बाद 7 दिसंबर को फिर से संघर्ष शुरू हो गया, जिसमें कंबोडिया ने थाईलैंड पर हवाई हमले करने का आरोप लगाया। 
  • युद्धविराम: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रयासों से 12 दिसंबर को दोनों देशों के नेताओं से बात करने के बाद एक एनी युद्धविराम सुनिश्चित करने का दावा किया गया। 

निष्कर्ष

प्रेह विहार मंदिर केवल एक प्राचीन धार्मिक स्मारक नहीं है बल्कि यह इतिहास, संस्कृति, अंतरराष्ट्रीय कानून एवं क्षेत्रीय राजनीति के जटिल संबंधों का प्रतीक है। यह विवाद दर्शाता है कि औपनिवेशिक काल में खींची गई सीमाएँ आज भी क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बन सकती हैं। वस्तुतः स्थायी शांति के लिए आवश्यक है कि दोनों देश कानूनी निर्णयों का सम्मान करें और इस साझा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण हेतु सहयोग की भावना को प्राथमिकता दें। 

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