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राष्ट्रपति संदर्भ बनाम न्यायिक नज़ीर

(प्रारंभिक परीक्षा: भारतीय राज्यतंत्र और शासन- संविधान, राजनीतिक प्रणाली)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना)

संदर्भ 

  • हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों को एक राष्ट्रपति संदर्भ (Presidential Reference) पर नोटिस जारी कर इस बारे में राय मांगी है कि क्या राष्ट्रपति एवं राज्यपालों को राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर निर्धारित समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने के लिए न्यायिक रूप से बाध्य किया जा सकता है। 
  • मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने संकेत दिया है कि इस मामले पर विस्तृत सुनवाई अगस्त के मध्य में शुरू होगी। 

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय 

  • संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा प्रस्तुत संदर्भ सर्वोच्च न्यायालय के 8 अप्रैल के फैसले से उत्पन्न हुआ है। 
  • न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर एक याचिका पर निर्णय दिया था, जिसमें राज्य विधानमंडल से पुनः पारित दस विधेयकों को स्वीकृति देने में देरी और बाद में उन्हें राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने के राज्यपाल आर.एन. रवि के निर्णय को चुनौती दी गई थी।
  • न्यायाधीशों ने राज्यपाल की लंबे समय तक निष्क्रियता को अवैध माना था और पहली बार राज्यपालों एवं राष्ट्रपति पर राज्य के विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए न्यायिक रूप से आरोपित करने योग्य समय-सीमा लागू की।

राष्ट्रपति द्वारा संदर्भ 

  • राष्ट्रपति संदर्भ इस बात पर स्पष्टता चाहता है कि क्या न्यायालय राष्ट्रपति एवं राज्यपालों जैसे संवैधानिक प्राधिकारियों के लिए कार्य करने का तरीका व समय-सीमा निर्धारित कर सकती हैं। 
  • विपक्षी नेताओं एवं कानूनी विशेषज्ञों ने इस कदम की आलोचना की है और इसे 8 अप्रैल के फैसले में व्यक्त कानूनी स्थिति को अस्थिर करने का प्रयास बताया है। 
    • उनका तर्क है कि केंद्र सरकार अनुच्छेद 143 का सहारा लेकर एक प्रतिकूल फैसले को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती देकर सामान्य अपीलीय प्रक्रिया को दरकिनार करने की कोशिश कर रही है।

न्यायालय का सलाहकारी क्षेत्राधिकार 

  • संविधान का अनुच्छेद 143(1) सर्वोच्च न्यायालय को सलाहकारी क्षेत्राधिकार प्रदान करता है जो उसे किसी भी जारी वाद से असंबंधित विधि या तथ्य के प्रश्नों पर राय देने का अधिकार देता है। 
    • इस प्रावधान की उत्पत्ति भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 213 से हुई है, जिसने भारत के संघीय न्यायालय को समान शक्तियाँ प्रदान की थीं। 
    • इसके लिए केवल यह आवश्यक है कि राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हों कि ऐसा प्रश्न उठा है या उठने की संभावना है और यह ऐसी प्रकृति एवं सार्वजनिक महत्त्व का है कि इस पर न्यायालय की राय आवश्यक है। 
    • स्वतंत्रता के बाद से इस शक्ति का कम-से-कम 14 बार प्रयोग किया गया है। हालाँकि, न्यायालय स्वयं को राष्ट्रपति द्वारा संदर्भित प्रश्नों तक ही सीमित रखने के लिए बाध्य है और संदर्भ के दायरे से बाहर नहीं जा सकता है।

संविधान सभा का मत 

  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार के प्रावधान को संविधान में शामिल करने पर संविधान सभा में बहस हुई थी। 
  • कई सदस्यों ने चिंता व्यक्त की कि इस तरह के सलाहकारी क्षेत्राधिकार का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए दुरुपयोग किया जा सकता है। 
  • अंततः, संविधान निर्माताओं ने इसे बरकरार रखा क्योंकि उन्होंने सामान्य मुकदमेबाजी के दायरे से परे संवैधानिक गतिरोधों को सुलझाने में इसकी उपयोगिता को मान्यता दी। 
  • अनुच्छेद 145(3) में इसे संहिताबद्ध करते हुए इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए इस बात पर सहमति बनी कि राष्ट्रपति के संदर्भों पर कम-से-कम पाँच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुनवाई की जानी चाहिए।  

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति संदर्भ का अस्वीकरण

  • यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय हालिया राष्ट्रपति संदर्भ पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है, फिर भी वह प्रत्येक मामले में ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है। 
  • विशेष न्यायालय विधेयक (1978) के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 143(1) में ‘कर सकता है’ शब्द का प्रयोग, यह प्रावधान करता है कि : 
    • न्यायालय ‘ऐसी सुनवाई के बाद, जिसे वह उचित समझे, राष्ट्रपति को अपनी राय दे सकता है’, 
    • यह सर्वोच्च न्यायालय को किसी संदर्भ को अस्वीकार करने का विवेकाधीन अधिकार भी प्रदान करता है।
    • हालाँकि, यदि न्यायालय जवाब नहीं देना चाहता है, तो उसे अपने कारण दर्ज करने होंगे। 

पूर्व के उदाहरण

  • डॉ. एम. इस्माइल फारुकी बनाम भारत संघ (1994) वाद में इस स्थिति की पुनः पुष्टि की गई, जहाँ न्यायालय ने कहा कि किसी संदर्भ को अस्वीकार किया जा सकता है यदि उसमें विशेषज्ञ साक्ष्य की आवश्यकता वाले प्रश्न या विशुद्ध रूप से राजनीतिक प्रकृति के प्रश्न शामिल हों, जिन पर न्यायालय निर्णय देने के लिए सक्षम नहीं है।
  • वर्ष 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या-बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित एक राष्ट्रपति संदर्भ का उत्तर देने से इनकार कर दिया। 
    • न्यायमूर्ति ए.एम. अहमदी और एस.पी. भरुचा ने जवाब देने से इनकार करने के लिए इसी मुद्दे पर एक दीवानी मुकदमे के लंबित होने का हवाला दिया। 
    • उन्होंने यह भी माना कि यह संदर्भ ‘असंवैधानिक’ है क्योंकि यह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। 
    • न्यायालय ने  चिंता व्यक्त की कि सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए न्यायालय की सलाहकारी राय का इस्तेमाल कर सकती है।
  • वर्ष 1982 में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था, जब न्यायालय ने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा 1 मार्च, 1947 और 14 मई, 1954 के बीच पाकिस्तान चले गए व्यक्तियों (या उनके वंशजों) के जम्मू एवं कश्मीर में पुनर्वास या स्थायी वापसी को सुगम बनाने वाले एक प्रस्तावित कानून की संवैधानिकता के संबंध में दिए गए संदर्भ का जवाब देने से इनकार कर दिया था। 
    • न्यायालय के सलाह देने से पूर्व ही जम्मू एवं कश्मीर राज्य में पुनर्वास (या स्थायी वापसी) के लिए परमिट अनुदान विधेयक, 1982 को विधानमंडल द्वारा पुनः अधिनियमित किया गया जिसे राज्यपाल ने स्वीकृति प्रदान की। 
    • बाद में इस कानून की वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में नियमित कार्यवाही के माध्यम से चुनौती दी गई।

सलाहकारी राय के बाध्यकारी होने को लेकर प्रश्न  

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई सलाहकारी राय की बाध्यकारी शक्ति पर विवाद बना हुआ है। 
  • संविधान के अनुच्छेद 141 में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित ‘कानून’ भारत की सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। 
    • सेंट जेवियर्स कॉलेज बनाम गुजरात राज्य (1974) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सलाहकारी राय बाध्यकारी मिसाल नहीं हैं। हालाँकि, उनमें महत्त्वपूर्ण प्रेरक शक्ति होती है।
  • वसंतलाल मगनभाई संजनवाला बनाम बॉम्बे राज्य (1961) में न्यायालय ने अत्यधिक विधायी प्रत्यायोजन के प्रश्न पर निर्णय देने के लिए इन री: द दिल्ली लॉज एक्ट (1951) में दी गई सलाहकारी राय पर भरोसा किया।
  • आर.के. गर्ग बनाम भारत संघ (1981) वाद में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने विशेष न्यायालय विधेयक संदर्भ में कानूनी तर्क को बाध्यकारी मिसाल माना। 
    • हालाँकि इस वाद में न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़ द्वारा इस संदर्भ के विषय में स्पष्ट चेतावनी कि न्यायालय की राय अन्य न्यायालयों पर बाध्यकारी नहीं है, अस्पष्टता का कारण बनी रही।
  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (1991) के मामले में भी यह अस्पष्टता बनी रही, जहाँ न्यायालय ने दोहराया कि सलाहकारी राय को ‘उचित महत्त्व एवं सम्मान’ दिया जाना चाहिए और ‘सामान्यतः उनका पालन’ किया जाना चाहिए। 
    • हालाँकि, न्यायालय ने उनकी बाध्यकारी प्रकृति के प्रश्न का समाधान करने से परहेज किया, यह देखते हुए कि इस मुद्दे पर अधिक उपयुक्त समय पर पुनर्विचार किया जा सकता है।

वर्तमान स्थिति 

  • वर्तमान स्थिति में राष्ट्रपति संदर्भ में न्यायालय द्वारा जारी की गई किसी भी राय का बाध्यकारी प्रभाव नहीं होगा। 
  • अनुच्छेद 141 के तहत अपने न्यायिक अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए दिया गया सर्वोच्च न्यायालय का 8 अप्रैल का निर्णय, राय चाहे जो भी हो, लागू रहेगा।

न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति संदर्भ के माध्यम से अपने पूर्व निर्णय को पलट सकने की जाँच 

  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण संदर्भ पर अपनी राय में सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि कार्यपालिका द्वारा अनुच्छेद 143 का उपयोग, न्यायपालिका द्वारा  स्थापित न्यायिक निर्णयों की समीक्षा या उन्हें पलटने के लिए एक साधन के रूप में नहीं किया जा सकता है। 
  • सर्वोच्च न्यायालय ने तर्क दिया कि यदि न्यायालय अपने न्यायिक क्षेत्राधिकार में किसी विधि के प्रश्न पर अपनी आधिकारिक राय  व्यक्त करता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि : 
    • विधि के प्रश्न पर कोई संदेह है 
    • या वह इस प्रकार एकीकृत है कि राष्ट्रपति को यह जानने की आवश्यकता हो कि उस प्रश्न पर विधि की वास्तविक स्थिति क्या है।
  • न्यायालय ने चेतावनी दी कि वह ऐसी ‘स्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकता’ जहाँ संदर्भ में किसी प्रश्न को इस प्रकार तैयार किया गया हो कि वह न्यायालय के स्थापित निर्णय पर प्रभावी रूप से पुनर्विचार करे।
    • इस प्रकार केंद्र सरकार के पास 8 अप्रैल के निर्णय को चुनौती देने का एकमात्र वैध मार्ग न्यायालय के समीक्षा या उपचारात्मक क्षेत्राधिकार का आह्वान करना होगा।
  • प्राकृतिक संसाधन आवंटन मामले (2012) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 143(1) के तहत किसी कानूनी प्रश्न पर स्पष्टीकरण देने, पुनः कथन करने या यहाँ तक कि नई राय बनाने की उसकी क्षमता पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है। 
    • जब तक कि कोई पूर्व निर्णय अक्षुण्ण रहता है और मूल मामले में पक्षकारों के अधिकार अप्रभावित रहते हैं। 
  • तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा दिया गया संदर्भ, 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन को रद्द करने और स्पेक्ट्रम वितरण के लिए नीलामी को एकमात्र तरीका अनिवार्य करने के न्यायालय के फैसले के बाद आया था। 
    • इस संबंध में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने स्वीकार किया कि अंतिम निर्णय हो चुका है। हालाँकि, इसके आधारभूत कानूनी सिद्धांतों को अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
  • इसी प्रकार, वर्ष 1998 में न्यायिक नियुक्तियों पर एक पूर्व निर्णय के कुछ पहलुओं को संशोधित करने के लिए राष्ट्रपति संदर्भ का उपयोग किया गया था। 
    • सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1993) वाद में निर्धारित कॉलेजियम प्रणाली की वैधता की पुष्टि करते हुए न्यायालय ने कॉलेजियम की संरचना और कार्यप्रणाली में संशोधन किया, जिससे पिछले फैसले को पलटे बिना नियुक्ति प्रक्रिया को परिष्कृत किया गया।
  • ऐसे में यह स्पष्ट है कि 8 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय अंतिम एवं बाध्यकारी है, फिर भी वर्तमान संदर्भ पर सुनवाई कर रही संवैधानिक पीठ द्वारा कानून पर इसके निष्कर्षों को परिष्कृत या विस्तृत किया जा सकता है। 
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