भारत में हवाई अड्डों के निजीकरण की प्रक्रिया अब नई दिशा में प्रवेश कर रही है। तीसरे चरण में 11 हवाई अड्डों को पांच समूहों में बाँटकर निजी ऑपरेटरों के लिए बोली के लिए खोलने की योजना है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप एप्प्राइजल कमिटी (PPPAC) को भेजा है ताकि इसकी सिद्धांतगत मंजूरी और विस्तृत समीक्षा की जा सके।
अधिकारियों के अनुसार, इन पाँच समूहों में अमृतसर एवं कांगड़ा, वाराणसी, कुशीनगर व गया, भुवनेश्वर और हुबली, रायपुर तथा औरंगाबाद, तिरुचिरापल्ली व तिरुपति आदि शामिल हैं।
हवाई अड्डों के निजीकरण की पृष्ठभूमि
भारत में भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के पास हवाई अड्डों का स्वामित्व एवं संचालन है। यह प्राधिकरण विमानन सेवाओं (रनवे, टर्मिनल) और गैर-विमानन संपत्तियों (खुदरा, पार्किंग, अचल संपत्ति) दोनों का प्रबंधन करता है।
भारत में हवाई अड्डों के निजीकरण की शुरुआत वर्ष 2003 में हुई। इस चरण में दो ब्राउनफील्ड हवाई अड्डों (दिल्ली और मुंबई) को निजी क्षेत्र को सौंपने की मंजूरी दी गई। इसमें भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) की 26% हिस्सेदारी रही, जबकि 74% भागीदारी निजी संयुक्त उद्यमों के पास थी।
प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के तहत राजस्व-साझेदारी मॉडल अपनाया गया, जिसके अंतर्गत दिल्ली हवाई अड्डा 2006 में जीएमआर के नेतृत्व वाले समूह को और मुंबई हवाई अड्डा उसी वर्ष जीवीके के नेतृत्व वाले समूह को आवंटित किया गया।
इसके बाद 2004 में बेंगलुरु और हैदराबाद में दो ग्रीनफील्ड सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) हवाई अड्डों के विकास और संचालन के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित की गई।
वर्ष 2019 में निजीकरण के अगले चरण में छह अन्य हवाई अड्डों- अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, मंगलुरु, गुवाहाटी एवं तिरुवनंतपुरम को निजी क्षेत्र को सौंपा गया, जिन्हें अदानी समूह ने हासिल किया।
इस दौर में राजस्व-साझाकरण मॉडल को हटाकर प्रति यात्री शुल्क आधारित व्यवस्था लागू की गई। उदाहरणस्वरूप, अहमदाबाद हवाई अड्डे के मामले में अदानी समूह ने निजीकरण के पहले वर्ष 2020 में ए.ए.आई. को प्रति यात्री ₹177 का भुगतान किया, जिसमें बाद में प्रतिवर्ष 5% की वृद्धि का प्रावधान किया गया।
निजीकरण के तीसरे चरण में पहली बार हवाई अड्डों को समूह के रूप में सौंपने की योजना बनाई जा रही है और PPPACकई अहम बिंदुओं पर विचार करेगा।
इनमें राजस्व-साझाकरण और प्रति यात्री शुल्क मॉडल के बीच चयन
समूह में शामिल महानगर और गैर-महानगर हवाई अड्डों के बीच क्रॉस-सब्सिडी की व्यवस्था
किसी एक संस्था द्वारा अधिग्रहित किए जा सकने वाले हवाई अड्डों की अधिकतम संख्या तय करना शामिल है।
इसके अतिरिक्त, गैर-विमानन आय बढ़ाने के लिए उपलब्ध भूमि के उपयुक्त उपयोग का भी मूल्यांकन किया जाएगा, ताकि एयरलाइन एवं यात्री शुल्क का भार संतुलित किया जा सके। साथ ही, यह भी तय किया जाएगा कि यात्रियों से वसूला जाने वाला उपयोगकर्ता विकास शुल्क प्रत्येक हवाई अड्डे के लिए अलग-अलग निर्धारित होगा या पूरे समूह के लिए एकीकृत रूप से।
निजीकरण के उद्देश्य
हवाई अड्डों के निजीकरण का प्रमुख उद्देश्य सेवाओं के स्तर को बेहतर बनाना, बुनियादी ढांचे को आधुनिक स्वरूप देना और परिचालन प्रक्रियाओं को अधिक कुशल बनाना है।
निजी क्षेत्र से पूंजी निवेश आकर्षित करने, अंतरराष्ट्रीय स्तर की श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों को अपनाने तथा गैर-विमानन आय के स्रोतों को विकसित कर यात्रियों पर पड़ने वाले खर्च को कुछ हद तक कम करने की भी इससे अपेक्षा की जाती है।
यह पहल भारत की दीर्घकालिक नागरिक उड्डयन विकास नीति का अहम हिस्सा है।
वर्तमान परिदृश्य में देश की कुल आबादी का केवल लगभग 6% हिस्सा ही हवाई यात्रा करता है जिससे यह संकेत मिलता है कि मांग के विस्तार की पर्याप्त संभावनाएँ अभी शेष हैं।
हवाई अड्डों की क्षमता में वृद्धि एवं बेहतर कनेक्टिविटी को आर्थिक प्रगति, क्षेत्रीय संपर्क के सुदृढ़ीकरण और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य माना जा रहा है।
निजीकरण के तीसरे दौर की प्रक्रिया
सार्वजनिक निजी भागीदारी मूल्यांकन समिति (PPPAC) द्वारा मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी होने और केंद्रीय मंत्रिमंडल से योजना को स्वीकृति मिलने के बाद निजी कंपनियों से बोलियाँ मंगाई जाएंगी। सरकार की योजना मार्च 2026 तक निविदा प्रक्रिया शुरू करने की है।
इन 11 हवाई अड्डों का चयन भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के उन हवाई अड्डों में से किया गया है जहाँ वार्षिक यात्री संख्या 0.1 मिलियन से 1 मिलियन के बीच है।
यह पहल ए.ए.आई. द्वारा 25 हवाई अड्डों के निजीकरण की योजना पहली बार सामने रखने के लगभग छह वर्ष बाद आगे बढ़ी है। अब तक ए.ए.आई. छह हवाई अड्डों के निजीकरण की प्रक्रिया पूरी कर चुका है जिन्हें अदाणी समूह को सौंपा गया है। शेष 14 हवाई अड्डों को आने वाले चरणों में निजी क्षेत्र को सौंपा जा सकता है।
राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (NMP)
हवाई अड्डों का निजीकरण राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (NMP) का भी अहम हिस्सा है।
इस योजना का उद्देश्य पहले से चालू सार्वजनिक अवसंरचना परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण कर निष्क्रिय पूंजी को सक्रिय करना और उसे अन्य परिसंपत्तियों में पुनर्निवेश करना है।
अगस्त 2021 में शुरू की गई एन.एम.पी. के तहत वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच चार वर्षों में ब्राउनफील्ड अवसंरचना परिसंपत्तियों को पट्टे पर देकर लगभग ₹6 लाख करोड़ जुटाने का सांकेतिक लक्ष्य रखा गया था।
25 हवाई अड्डों के निजीकरण से विमानन क्षेत्र के लिए ₹20,782 करोड़ जुटाने का लक्ष्य तय किया गया था, जो कुल एन.एम.पी. मूल्य का करीब 4% है।
कुल मिलाकर, विभिन्न अवसंरचना मंत्रालय अब तक एन.एम.पी. लक्ष्य का 88.3% हासिल कर चुके हैं। इसमें सड़क एवं रेलवे क्षेत्रों का योगदान सर्वाधिक रहा है जबकि विमानन क्षेत्र अपेक्षाकृत पीछे रहा।
इसी क्रम में केंद्रीय बजट 2025-26 में परिसंपत्ति मुद्रीकरण योजना 2025-30 की शुरुआत की घोषणा की गई जिसके तहत ₹10 लाख करोड़ के निवेश का लक्ष्य रखा गया है।
चुनौतियाँ
सबसे गंभीर चिंताओं में बाजार के अत्यधिक केंद्रीकरण का मुद्दा प्रमुख है। हाल के वर्षों में एक ही कॉर्पोरेट समूह द्वारा कई अहम हवाई अड्डों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया गया है जिससे विमानन क्षेत्र में एकाधिकार या सीमित प्रतिस्पर्धा (डुओपॉली) के उभरने की आशंका बढ़ गई है।
इस स्थिति का सीधा प्रभाव एयरलाइन्स की मोलभाव करने की क्षमता पर पड़ता है जबकि यात्रियों के पास विकल्प बेहद सीमित रह जाते हैं।
इसके साथ ही, यात्रियों पर बढ़ते वित्तीय बोझ को लेकर भी चिंताएँ सामने आई हैं। कुछ निजीकरण किए गए हवाई अड्डों में शुल्क संशोधन के बाद उपयोगकर्ता विकास शुल्क और अन्य संबंधित शुल्कों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है।
यात्री अनुभव से जुड़ी शिकायतों में टर्मिनलों में भीड़भाड़, टैक्सी सेवाओं के अधिक किराए, दिव्यांग एवं वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुलभता सुविधाओं की कमी और सेवा गुणवत्ता में गिरावट शामिल हैं।
आगे की राह
वर्तमान में देश की केवल लगभग 6% आबादी ही हवाई यात्रा का उपयोग करती है जो दुनिया के तीसरे सबसे बड़े विमानन बाजार में अभी भी मौजूद व्यापक विकास संभावनाओं को रेखांकित करता है।
भविष्य में बढ़ती मांग को पूरा करने के उद्देश्य से सरकार ने अगले पांच वर्षों में 50 नए हवाई अड्डों के निर्माण और मौजूदा 163 हवाई अड्डों के नेटवर्क के विस्तार का लक्ष्य निर्धारित किया है। वित्त वर्ष 2026 तक नवी मुंबई हवाई अड्डे और प्रस्तावित नोएडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे जैसी नई परियोजनाओं के शामिल होने से देश के हवाई अड्डों की कुल यात्री संभालने की क्षमता लगभग 55 करोड़ यात्रियों प्रति वर्ष (MPPA) तक पहुंचने का अनुमान है।
उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार, आने वाले पांच वर्षों में इस क्षमता को अधिक बढ़ाकर लगभग 85 करोड़ एम.पी.पी.ए. करना आवश्यक होगा। हालांकि, इस विस्तार को सफलतापूर्वक संभालने के लिए केवल नए हवाई अड्डों का निर्माण पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए आर्थिक रूप से मजबूत और परिचालन रूप से सक्षम एयरलाइन्स की मौजूदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।