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कोरम सेंसिंग

संदर्भ

बैक्टीरिया के आपसी संचार प्रणाली को ‘क्वोरम सेंसिंग’ (Quorum Sensing) कहा जाता है। यह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए अत्यंत क्रांतिकारी साबित हो सकती है। साथ ही, यह पारंपरिक एंटीबायोटिक्स पर निर्भरता कम करते हुए एंटी-क्वोरम सेंसिंग आधारित उपचार विकसित करने की दिशा में नए अवसर प्रदान करती है। 

क्वोरम सेंसिंग के बारे में  

  • क्वोरम सेंसिंग वह जैविक (रासायनिक) प्रक्रिया है जिसके माध्यम से बैक्टीरिया अपनी संख्या घनत्व (Cell Density) के अनुसार जीनों की सक्रियता को नियंत्रित करते हैं। वे इसके लिए विशेष संकेत अणुओं (Signal Molecules) का निर्माण और स्राव करते हैं।
  • इसमें बैक्टीरिया ‘ऑटोइंड्यूसर’ नामक सूक्ष्म अणु छोड़ते हैं जो एक निश्चित संख्या पहुंचने पर सामूहिक रूप से जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) को नियंत्रित करते हैं और मिलकर काम करते हैं।
  • इस व्यवस्था के कारण बैक्टीरिया एक-दूसरे से ‘संवाद’ कर पाते हैं और सामूहिक रूप से व्यवहार निर्धारित करते हैं। रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीव संक्रमण फैलाने और अपनी विषाक्तता बढ़ाने के लिए प्राय: इसी तंत्र का सहारा लेते हैं।
  • इस घटना का पहला वैज्ञानिक अवलोकन 1960 के दशक में हंगरी मूल के सूक्ष्मजीवविज्ञानी अलेक्जेंडर टोमाज़ (Alexander Tomasz) ने किया। उन्होंने स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया (Streptococcus pneumonia) पर शोध करते हुए पाया कि यह जीवाणु अपने आसपास मौजूद मुक्त डीएनए को ग्रहण करने में सक्षम है। 

कार्य करने की प्रक्रिया 

  • क्वोरम सेंसिंग तंत्र मुख्यतः तीन घटकों पर आधारित होता है—
    • बैक्टीरिया की जनसंख्या
    • संकेत अणु
    • व्यवहार को नियंत्रित करने वाले जीन 
  • संकेत अणुओं को ‘ऑटोइंड्यूसर’ कहा जाता है। ये अणु बैक्टीरिया द्वारा बाहर छोड़े जाते हैं और जैसे-जैसे कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है, इनकी मात्रा भी बढ़ती जाती है। 
  • जब इन अणुओं की सांद्रता एक निश्चित स्तर तक पहुँच जाती है तब बैक्टीरिया उन्हें पहचान लेते हैं और विशेष जीन सक्रिय हो जाते हैं। परिणामस्वरूप कई महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाएँ प्रारंभ होती हैं, जैसे—
    • विषाक्तता का विकास
    • क्षैतिज जीन स्थानांतरण
    • बायोफिल्म का निर्माण
    • कॉम्पिटेंस (डी.एन.ए. को आत्मसात करने की क्षमता) 
  • ये गतिविधियाँ सामान्यतः तभी प्रभावी होती हैं जब बैक्टीरिया की संख्या पर्याप्त हो। इसीलिए क्वोरम सेंसिंग को सूक्ष्मजीवों में सामूहिक समन्वय का प्रमुख माध्यम माना जाता है। 

अलग-अलग बैक्टीरिया में भिन्नता 

  • यद्यपि यह तंत्र अनेक बैक्टीरिया में पाया जाता है, परंतु इसकी संरचना और प्रयुक्त संकेत अणुओं के प्रकार विभिन्न प्रजातियों में अलग हो सकते हैं।
  • उदाहरणस्वरूप, स्यूडोमोनास एरुगिनोसा (Pseudomonas aeruginosa) नामक जीवाणु, जो निमोनिया तथा रक्त संक्रमण का कारण बनता है, अपनी रोगजनक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए क्वोरम सेंसिंग का उपयोग करता है।
  • इसके विपरीत कुछ जीवाणुओं में यह प्रक्रिया सहजीवी संबंधों और वृद्धि से जुड़ी होती है। जैसे राइजोबियम लेग्यूमिनोसारम (Rhizobium leguminosarum) में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्रिया इसी तंत्र से प्रभावित होती है। 

निष्कर्ष

इस प्रकार, क्वोरम सेंसिंग केवल रोग फैलाने की रणनीति भर नहीं है, बल्कि यह बैक्टीरिया के सामूहिक जीवन, अनुकूलन और विकास का महत्वपूर्ण आधार है। भविष्य में इस तंत्र को लक्ष्य बनाकर विकसित की गई चिकित्सा पद्धतियाँ संक्रमण नियंत्रण की दिशा में नई संभावनाएँ प्रस्तुत कर सकती हैं। 

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