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रानी लक्ष्मीबाई: वीरता की अमर गाथा

(प्रारंभिक परीक्षा: महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-1: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।)

चर्चा में क्यों

19 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रानी लक्ष्मीबाई को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

रानी लक्ष्मीबाई : जीवन परिचय 

प्रारंभिक जीवन

  • जन्म : 19 नवंबर 1828 को वाराणसी (काशी) में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में। 
  • बचपन का नाम : मणिकर्णिका तांबे 
  • पिता : मोरोपंत तांबे पेशवा; बाजीराव द्वितीय के दरबार में कार्यरत थे।
  • माता : भागीरथी बाई; एक संस्कारी गृहिणी थीं। 
  • मात्र चार वर्ष की आयु में मां का निधन हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण पिता ने किया।
  • बचपन से ही मनु साहसी और तेजस्वी थीं, और घुड़सवारी, तलवारबाजी, निशानेबाजी और शस्त्र चलाने की शिक्षा में निपुण थीं। 
  • उन्हें धार्मिक ग्रंथों, शास्त्रों और युद्धकला की शिक्षा दी गई। 
  • पेशवा दरबार के वातावरण में रहने के कारण वे नाना साहब और तात्या टोपे जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आईं।

राजनीतिक जीवन

  • वर्ष 1842 में उनका विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव न्यूलकर से हुआ। 
  • विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया, वे झाँसी की रानी बनीं। 
  • वर्ष 1851 में उन्हें एक पुत्र हुआ, जो मात्र चार माह की आयु में चल बसा। 
  • इसके बाद महाराजा ने मृत्युशैया पर अपने चचेरे भाई के पुत्र दामोदर राव को गोद लिया।
  • वर्ष 1853 में महाराजा गंगाधर राव का निधन हो गया। उस समय रानी की आयु मात्र 18-20 वर्ष थी। 
  • ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स (हड़प नीति) के तहत गोद लिए गए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और झाँसी राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। 
  • रानी को किले से निकालकर वार्षिक 60,000 रुपये की पेंशन दी गई। रानी ने इसका पुरजोर विरोध किया और कहा "मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी!" इस घटना ने उन्हें ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया।

1857 की क्रांति में भूमिका

  • 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (जिसे ब्रिटिश सिपाही विद्रोह कहते हैं) जब मेरठ से शुरू हुआ, तो झाँसी में भी विद्रोह भड़क उठा। 
  • जून 1857 में झाँसी के सिपाहियों ने किले पर कब्जा कर ब्रिटिश अधिकारियों का नरसंहार किया (रानी की इसमें संलिप्तता विवादास्पद है, कई इतिहासकार उन्हें निर्दोष मानते हैं)।
  • रानी ने विद्रोहियों का साथ दिया और झाँसी की कमान संभाली। उन्होंने सेना का पुनर्गठन किया और ब्रिटिश सेना से झाँसी की रक्षा की। 
  • मार्च 1858 में जनरल ह्यूग रोज के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने झाँसी पर आक्रमण किया। 
  • रानी ने अद्भुत वीरता दिखाई, वे स्वयं घोड़े पर सवार होकर, कमर पर तलवार बांधे और गोद में गोद लिया पुत्र दामोदर राव बांधकर युद्ध लड़ीं।
  • झाँसी हारने पर वे कालपी भागीं और तात्या टोपे से मिलकर ग्वालियर पर अधिकार किया। 
  • नाना साहब को पेशवा घोषित किया। अंतिम युद्ध 17-18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट कोटा की सराय में हुआ, जहां वे ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं। 
  • मात्र 29 वर्ष की आयु में वे शहीद हुईं, लेकिन उनकी मृत्यु ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी।

उपलब्धियां

  • महिला सशक्तिकरण की प्रतीक: उन्होंने साबित किया कि महिलाएं भी युद्ध कौशल, नेतृत्व और राज्य संचालन में पुरुषों से कम नहीं हैं। बचपन से ही शस्त्र शिक्षा लेने वाली वे पहली भारतीय रानी थीं जो स्वयं युद्धभूमि में उतरीं।
  • सेना का गठन: झाँसी में उन्होंने अपनी निजी सेना तैयार की, जिसमें महिलाओं की टुकड़ी भी शामिल थी। उन्होंने तोपखाना और घुड़सवार सेना को मजबूत किया।
  • कूटनीतिक प्रयास: डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स के खिलाफ उन्होंने लंदन तक अपील की, हालांकि असफल रहीं।
  • राष्ट्रीय प्रेरणा स्रोत: उनकी वीरता ने पूरे भारत को प्रेरित किया। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी" उन्हें अमर बना गई। ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज ने उन्हें "सभी भारतीय नेताओं में सबसे खतरनाक और सभी योद्धाओं में एक मात्र मर्द" कहा।

सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित ‘रानी लक्ष्मी बाई’ कविता से उद्धृत :-

सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की क़ीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,

चमक उठी सन् सत्तावन में

वह तलवार पुरानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह

हमने सुनी कहानी थी।

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो

झाँसी वाली रानी थी॥

कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन 'छबीली' थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी,

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,

वीर शिवाजी की गाथाएँ

उसको याद ज़बानी थीं।

बुंदेले हरबोलों के मुँह

हमने सुनी कहानी थी।

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो

झाँसी वाली रानी थी॥

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