New
Final Result - UPSC CSE Result, 2025 GS Foundation (P+M) - Delhi : 23rd March 2026, 11:30 AM Navratri offer UPTO 75% + 10% Off | Valid till 26th March GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 17th March 2026 Final Result - UPSC CSE Result, 2025 GS Foundation (P+M) - Delhi : 23rd March 2026, 11:30 AM Navratri offer UPTO 75% + 10% Off | Valid till 26th March GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 17th March 2026

भारत में कौशल विकास का पुनर्मूल्यांकन

संदर्भ 

  • विगत दस वर्षों में भारत ने कौशल विकास के क्षेत्र में व्यापक संस्थागत ढाँचा विकसित किया है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के अंतर्गत वर्ष 2015 से 2025 के बीच लगभग 1.40 करोड़ युवाओं को विभिन्न प्रकार का कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया गया। इसके बावजूद कौशल-आधारित शिक्षा अभी तक युवाओं के लिए एक आकर्षक एवं प्रतिष्ठित करियर विकल्प के रूप में स्थापित नहीं हो सकी है।
  • वस्तुतः रोज़गार से जुड़े परिणाम असंतुलित बने हुए हैं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आँकड़े संकेत देते हैं कि व्यावसायिक प्रशिक्षण से होने वाली वेतन वृद्धि सीमित एवं अस्थिर है—विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्र में, जहाँ अधिकांश प्रशिक्षित श्रमिक कार्यरत होते हैं। इस स्थिति में कौशल प्रमाणन को न तो पर्याप्त आर्थिक मान्यता मिलती है और न ही जीवन-स्तर में कोई ठोस सुधार दिखाई देता है। 

कौशल विकास की सीमित आकांक्षाओं के कारण

1. औपचारिक शिक्षा से अपर्याप्त समन्वय

  • भारत में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (GER) लगभग 28% है जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत 2035 तक 50% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
  • इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव है जब कौशल प्रशिक्षण को उच्च शिक्षा ढाँचे के भीतर मुख्यधारा में शामिल किया जाए, न कि इसे पृथक व्यावसायिक विकल्प के रूप में बढ़ाया जाए।

2. औपचारिक कौशल प्रशिक्षण की सीमित पहुँच

  • देश की कुल कार्यबल का मात्र लगभग 4.1% हिस्सा ही औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण से लैस है। यह आँकड़ा एक दशक पूर्व के 2% से भले ही अधिक हो, किंतु OECD देशों की तुलना में अब भी अत्यंत कम है जहाँ व्यावसायिक शिक्षा व्यापक रूप से स्वीकार्य है। 
  • वस्तुतः OECD देशों में उच्च माध्यमिक शिक्षा स्तर पर लगभग 44% विद्यार्थी व्यावसायिक कार्यक्रमों में नामांकित होते हैं जबकि ऑस्ट्रिया, फिनलैंड, नीदरलैंड एवं स्लोवेनिया जैसे देशों में यह अनुपात 70% के आसपास है। 

3. डिग्री के बाद स्किलिंग की कमजोर प्रवृत्ति

इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार, स्नातक डिग्री प्राप्त करने के बाद बहुत कम युवा कौशल प्रशिक्षण की ओर रुख करते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि स्किलिंग एवं औपचारिक शिक्षा के बीच संरचनात्मक तालमेल की कमी बनी हुई है। 

कौशल विकास में उद्योग जगत की सीमित भागीदारी

  1. कुशल श्रम पर निर्भरता के बावजूद चुनौतियाँ: रिटेल, लॉजिस्टिक्स, हॉस्पिटैलिटी एवं विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में उद्योगों को 30–40% तक उच्च श्रम पलायन, लंबी प्रशिक्षण अवधि और उत्पादकता में गिरावट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिससे प्रभावी स्किलिंग की आर्थिक उपयोगिता अधिक बढ़ जाती है। 
  2. सरकारी प्रमाणपत्रों पर कम भरोसा: अधिकांश नियोक्ता भर्ती प्रक्रिया में सरकारी कौशल प्रमाणपत्रों को प्राथमिकता नहीं देते हैं। इसके बजाय वे आंतरिक प्रशिक्षण, व्यक्तिगत सिफ़ारिशों या निजी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर अधिक निर्भर रहते हैं जिससे सार्वजनिक स्किलिंग कार्यक्रमों की विश्वसनीयता सीमित हो जाती है।
  3. अप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों का असमान प्रभाव: राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (NAPS) के माध्यम से भागीदारी में वृद्धि अवश्य हुई है किंतु इसके लाभ सभी क्षेत्रों और उद्यमों में समान रूप से वितरित नहीं हो पाए हैं, विशेषकर बड़े उद्योगों में।
  4. पाठ्यक्रम निर्माण में औद्योगिक जगत की सीमित भूमिका: औद्योगिक क्षेत्र को न तो पाठ्यक्रम, मानक एवं मूल्यांकन के सह-निर्माण के लिए पर्याप्त रूप से प्रोत्साहित किया गया है और न ही इसके लिए बाध्य किया गया है। परिणामस्वरूप, कौशल प्रशिक्षण प्राय: श्रम-बाज़ार की वास्तविक आवश्यकताओं से मेल नहीं खाता है।

सेक्टर स्किल काउंसिल (SSC): अपेक्षाएँ एवं वास्तविकता

  1. परिकल्पना व क्रियान्वयन के बीच अंतर: SSC की स्थापना उद्योग-नेतृत्व वाली स्किलिंग, मानकीकरण एवं रोज़गार-योग्यता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी, किंतु व्यवहार में यह लक्ष्य काफी हद तक अधूरा रह गया है।
  2. जवाबदेही का विखंडन: प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्रमाणन एवं प्लेसमेंट अलग-अलग संस्थाओं के अधीन होने से परिणामों की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं रह जाती है और प्रणाली की प्रभावशीलता घट जाती है।
  3. नियोक्ताओं में सीमित स्वीकार्यता: SSC द्वारा जारी प्रमाणपत्र नियोक्ताओं के लिए मज़बूत संकेत प्रदान नहीं करते हैं। भर्ती निर्णय प्रायः डिग्री या पूर्व अनुभव पर आधारित होते हैं, न कि कौशल मानकों पर।
  4. वैश्विक प्रमाणन प्रणालियों से तुलना: AWS, गूगल एवं माइक्रोसॉफ्ट जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणपत्र सफल इसलिए हैं क्योंकि वे परिणामों की पूर्ण जिम्मेदारी लेते हैं और अपनी साख को जोखिम में डालकर मूल्यांकन करते हैं जो SSC मॉडल में अनुपस्थित है।
  5. परिणाम-आधारित उत्तरदायित्व की आवश्यकता: जब तक SSC को रोज़गार सृजन और श्रम-बाज़ार परिणामों के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं बनाया जाता है, तब तक उनका प्रमाणन आर्थिक दृष्टि से सीमित महत्व का ही रहेगा।

आर्थिक विकास के संदर्भ में स्किलिंग की भूमिका

  1. नीति नहीं, उत्तरदायित्व की कमी मुख्य समस्या: भारत की स्किलिंग चुनौती का मूल कारण संसाधनों या नीतिगत इच्छाशक्ति की कमी नहीं है बल्कि जवाबदेही का अभाव है।
  2. कार्यस्थल-आधारित कौशल विकास: अप्रेंटिसशिप के विस्तार और कार्यस्थलों में प्रशिक्षण को एकीकृत करने से बड़े पैमाने पर रोज़गार-तैयारी में सुधार किया जा सकता है।
  3. उद्योग-नेतृत्व वाले मॉडल: PM-SETU और ITI आधुनिकीकरण जैसी पहलें दर्शाती हैं कि जब उद्योग को स्वामित्व व उत्तरदायित्व दिया जाता है तो कार्यक्रम अधिक प्रभावी बनते हैं।
  4. कल्याणकारी दृष्टिकोण से आर्थिक रणनीति की ओर: जब कौशल शिक्षा को डिग्री कार्यक्रमों में जोड़ा जाता है और उद्योग सह-निर्माता बनता है, तब स्किलिंग सामाजिक सहायता से आगे बढ़कर आर्थिक सशक्तिकरण का साधन बन जाती है।
  5. व्यापक सामाजिक लाभ: प्रभावी स्किलिंग न केवल रोज़गार सृजन करती है, बल्कि श्रम की गरिमा बढ़ाती है, उत्पादकता सुधारती है और भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभ को दीर्घकालिक विकास में बदलने में सक्षम बनाती है।

भारत की कौशल नीति: पुनर्समीक्षा की आवश्यकता

  1. कौशल का वेतन से सीधा संबंध: कौशल प्रशिक्षण तभी सार्थक होगा जब वह बेहतर वेतन और कार्य परिस्थितियों में परिलक्षित हो। इसके लिए नीतियों को श्रमिक आकांक्षाओं और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा से जोड़ना आवश्यक है।
  2. मांग-आधारित प्रशिक्षण व्यवस्था: पाठ्यक्रमों को वास्तविक समय के श्रम-बाज़ार आँकड़ों, उद्योग–शैक्षणिक संस्थानों के समन्वय और पारदर्शी रोज़गार संभावनाओं पर आधारित होना चाहिए।
  3. वेतन-निरोधक संरचनात्मक बाधाओं का समाधान: नियामकीय जटिलताएँ, पूंजी और भूमि की सीमित उपलब्धता, भ्रष्टाचार व व्यापार अवरोध उद्योगों की वेतन-क्षमता को सीमित करते हैं। इसके साथ ही स्किलिंग सुधारों को व्यापक औद्योगिक सुधारों से जोड़ना होगा।
  4. प्लेसमेंट-आधारित मॉडलों का विस्तार: कठोर चयन प्रक्रिया, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और सुनिश्चित प्लेसमेंट के साथ चलने वाले कार्यक्रम—विशेषकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से—सबसे प्रभावी सिद्ध होते हैं।
  5. स्किलिंग को आकांक्षात्मक बनाना: केवल वही कौशल मार्ग टिकाऊ होंगे जो सम्मानजनक रोज़गार, सामाजिक गतिशीलता और स्पष्ट करियर प्रगति सुनिश्चित करें। तभी भारत की स्किलिंग प्रणाली संख्यात्मक उपलब्धियों से आगे बढ़कर वास्तविक आर्थिक परिवर्तन ला सकेगी। 

निष्कर्ष

भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) केवल प्रशिक्षण के आंकड़ों से नहीं, बल्कि प्रशिक्षण की गुणवत्ता और बाजार में उसकी स्वीकार्यता से सफल होगा। यद्यपि स्किलिंग को केवल रोज़गार पाने का साधन नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक वृद्धि का आधार स्तंभ बनाना होगा। 

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR
X