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महाराष्ट्र स्लम क्षेत्र अधिनियम, 1971 की समीक्षा

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 : शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध)

संदर्भ 

पिछले महीने बॉम्बे उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र स्लम क्षेत्र अधिनियम, 1971 की अपनी तरह की पहली समीक्षा शुरू की। आमतौर पर न्यायपालिका संवैधानिकता के प्रश्न पर कानूनों की समीक्षा करती है। हालाँकि, यह समीक्षा इस मायने में अद्वितीय है क्योंकि यह विधायी खामियों को चिन्हित करने का प्रयास करती है। 

समीक्षा की पृष्ठभूमि 

  • वर्ष 1971 के कानून की समीक्षा की पृष्ठभूमि बोरीवली में वर्ष 2003 में एक झुग्गी पुनर्विकास परियोजना से जुड़ा हुआ है।   
  • पिछले कई वर्षों से अदालतें झुग्गी पुनर्विकास परियोजनाओं में शामिल डेवलपर्स द्वारा ‘अनुचित देरी’ के मामलों के कारण 1971 के अधिनियम की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती रही हैं।
  • अदालतों ने कहा है कि इस तरह की देरी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है जिसमें आश्रय एवं आजीविका का अधिकार भी शामिल है।
  • नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के आंकड़ों का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 1971 के अधिनियम के तहत विवादों से जुड़े 1,612 मामले वर्तमान में बॉम्बे उच्च न्यायालय में लंबित हैं। इनमें से 135 मामले 10 वर्ष से भी ज़्यादा पुराने हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी भी स्थिति में, स्लम पुनर्वास योजना के तहत परियोजना के क्रियान्वयन को रियल एस्टेट विकास परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता है। इसमें एक सार्वजनिक उद्देश्य शामिल है जो झुग्गियों में रहने वाले लोगों के जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है क्योंकि वे दयनीय परिस्थितियों में रह रहे हैं।

महाराष्ट्र स्लम क्षेत्र अधिनियम, 1971 के बारे में 

  • यह अधिनियम झुग्गी-झोपड़ियों की पहचान एवं पुनर्विकास से संबंधित है। इसने मुंबई के वास्तुशिल्प परिदृश्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • यह कानून महाराष्ट्र सरकार को किसी क्षेत्र को ‘झुग्गी क्षेत्र’ घोषित करने और आवश्यकता पड़ने पर उसका अधिग्रहण करने का अधिकार देता है।
    • इस अधिनियम के तहत पुनर्वास की देखरेख के लिए एक वैधानिक निकाय ‘स्लम पुनर्वास प्राधिकरण (SRA)’ का निर्माण किया गया है जो निर्दिष्ट क्षेत्र के पुनर्विकास का कार्य किसी भी एजेंसी या डेवलपर को सौंप सकता है।
  • इस कानून में झुग्गीवासियों के स्थानांतरण एवं पुनर्वास का भी प्रावधान है।

न्यायालय द्वारा पहचान किए गए समीक्षा के बिंदु

यह समीक्षा राज्य कानून से संबंधित है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय को कानून के कामकाज की समीक्षा के लिए स्वप्रेरणा से कार्यवाही शुरू करने के लिए एक पीठ का गठन करने का निर्देश दिया, ताकि निर्णय में चर्चा की गई समस्याओं के कारणों की पहचान की जा सके। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा की आवश्यकता वाले पहचान किए गए प्रमुख क्षेत्र हैं-

  • भूमि की पहचान एवं मलिन बस्ती के रूप में घोषणा : इस समस्या में भूमि को मान्यता देने में अधिकारियों की भूमिका की जांच शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि निर्णय लेने की इस प्रक्रिया में बिल्डर्स के कपटपूर्ण हस्तक्षेप से स्वतंत्रता व ईमानदारी पर संदेह पैदा होता है।
  • झुग्गीवासियों की पहचान : झुग्गीवासियों की स्थिति के प्रमाण का पता लगाना एक जटिल प्रक्रिया है और इससे झुग्गीवासियों के बीच प्रतिस्पर्धात्मक दावे पैदा होते हैं जिससे मुकदमेबाजी को बढ़ावा मिलता है।
  • डेवलपर का चयन : कानून यह निर्णय झुग्गीवासियों की सहकारी समितियों पर छोड़ देता है जिनके साथ प्राय: प्रतिस्पर्धी एवं प्रतिद्वंद्वी डेवलपर्स द्वारा छेड़छाड़ की जाती है।
  • पुनर्विकास एवं बिक्री के लिए भूमि का आवंटन : डेवलपर्स बिक्री योग्य क्षेत्र के अनुपात को बढ़ाना चाहते हैं जिसके कारण झुग्गीवासियों द्वारा कानून के तहत भूमि के अभाव के कारण विरोध किया जाता है।
  • पुनर्विकास लंबित रहने तक झुग्गीवासियों के लिए पारगमन आवास उपलब्ध कराने का दायित्व : न्यायालय ने कहा है कि कभी-कभी, डेवलपर्स समय पर ट्रांजिट आवास उपलब्ध नहीं कराते है या अपर्याप्त विकल्प देते हैं। ऐसे भी उदाहरण हैं जहां कुछ झुग्गी-झोपड़ी निवासी संबंधित क्षेत्र को खाली करने से इनकार कर देते हैं क्योंकि ट्रांजिट आवास या तो असुविधाजनक होता है या उन्हें दी जाने वाली ट्रांजिट किराया राशि अपर्याप्त होती है।
  • वैधानिक प्राधिकारियों के कामकाज में स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता का अभाव : न्यायालय ने वैधानिक उपायों की प्रभावशीलता पर भी चिंता जताई है और कहा कि कानून के तहत अधिकारियों की जवाबदेही में कमी है।
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