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भविष्य की सीमाओं पर विज्ञान: अंतरिक्ष एवं समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, सामान्य विज्ञान)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ)

संदर्भ

भविष्य में विज्ञान की अगली छलांग उन क्षेत्रों से आ रही है जिनका अन्वेषण अभी तक अपेक्षाकृत कम किया गया हैं जिनमें गहरे महासागर एवं बाह्य अंतरिक्ष शामिल है। भविष्यपरक समुद्री और अंतरिक्ष जैव-प्रौद्योगिकी का उद्देश्य इन चुनौतीपूर्ण परिवेशों का उपयोग कर नवीन जैविक ज्ञान, उन्नत सामग्री एवं अभिनव विनिर्माण प्रणालियाँ विकसित करना है। 

समुद्र से उभरती संभावनाएँ 

  • समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी के अंतर्गत सूक्ष्मजीवों, शैवाल एवं विविध समुद्री जीवों का अध्ययन किया जाता है ताकि जैव-सक्रिय यौगिकों, औद्योगिक एंज़ाइमों, जैव-आधारित सामग्रियों, पोषण घटकों व जैव-उत्तेजकों की पहचान की जा सके। 
  • गहरे समुद्रों में पनपने वाले ये जीव अत्यधिक दाब, अधिक लवणता, सीमित प्रकाश और पोषक तत्वों की कमी जैसी कठोर परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हुए हैं। 
  • यही विशेषताएँ इन्हें औद्योगिक उपयोगों और जलवायु-सहिष्णु तकनीकों के लिए अत्यंत उपयोगी बनाती हैं। 

अंतरिक्ष में जीवन विज्ञान की भूमिका

  • अंतरिक्ष जैव-प्रौद्योगिकी सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण एवं विकिरण के वातावरण में जैविक प्रणालियों के व्यवहार का अध्ययन करती है। 
  • इसमें सूक्ष्मजीवों और पौधों से लेकर मानव शरीर तक सभी स्तरों पर शोध शामिल है। 
  • अंतरिक्ष में भोजन उत्पादन, सामग्री निर्माण और जीवन-समर्थन प्रणालियों के लिए सूक्ष्मजीव-आधारित जैव-विनिर्माण पर प्रयोग किए जा रहे हैं। 
  • साथ ही, अंतरिक्ष यात्रियों के माइक्रोबायोम पर होने वाला शोध दीर्घकालिक अंतरिक्ष मिशनों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा और प्रोबायोटिक समाधान विकसित करने में सहायक हो सकता है। 

भारत के लिए अंतरिक्ष और समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी  का महत्त्व 

  • भारत की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधन इसे इस क्षेत्र में विशिष्ट लाभ प्रदान करते हैं। 
  • लगभग 11,000 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा और 20 लाख वर्ग किलोमीटर से बड़े विशेष आर्थिक क्षेत्र के बावजूद वैश्विक समुद्री उत्पादन में भारत की भागीदारी अभी सीमित है। यह तथ्य इस क्षेत्र में मौजूद अपार संभावनाओं की ओर संकेत करता है। 
  • समुद्री जैव-विनिर्माण में निवेश न केवल भोजन, ऊर्जा, रसायन एवं जैव-सामग्रियों के नए स्रोत उपलब्ध करा सकता है बल्कि भूमि, मीठे जल व पारंपरिक कृषि पर बढ़ते दबाव को भी कम कर सकता है। 
  • अंतरिक्ष जैव-प्रौद्योगिकी भारत की अंतरिक्ष अन्वेषण योजनाओं के लिए अनिवार्य है क्योंकि यह कठिन परिस्थितियों में सुरक्षित खाद्य आपूर्ति, मानव स्वास्थ्य प्रबंधन एवं जैविक उत्पादन को संभव बनाती है। 
  • इन दोनों क्षेत्रों का संयुक्त विकास भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को गति दे सकता है, रणनीतिक आत्मनिर्भरता को मजबूत कर सकता है और देश को अगली पीढ़ी के जैव-विनिर्माण में अग्रणी स्थान दिला सकता है। 

वर्तमान स्थिति: संभावनाएँ और सीमाएँ 

  • आज भारत में समुद्री जैव-द्रव्य, विशेषकर समुद्री शैवाल का उत्पादन सीमित स्तर पर है। वार्षिक कृषि लगभग 70,000 टन तक सिमटी हुई है जिसके कारण आगर, कैरेजीनन व एल्गिनेट्स जैसे आवश्यक घटकों के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है। ये घटक खाद्य, औषधि, सौंदर्य प्रसाधन और चिकित्सा क्षेत्रों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होते हैं।
  • हालाँकि, ब्लू इकोनॉमी, डीप ओशन मिशन और हालिया BioE3 जैसी पहलें इस क्षेत्र को एकीकृत समुद्री जैव-विनिर्माण की दिशा में आगे बढ़ा रही हैं जहाँ खेती से लेकर निष्कर्षण एवं अंतिम उपयोग तक की पूरी श्रृंखला को जोड़ा जा रहा है। 
  • कुछ निजी कंपनियाँ, अनुसंधान संस्थान और राज्य-स्तरीय पहलें समुद्री जैव-द्रव्य को उच्च-मूल्य जैव-आधारित उत्पादों में बदलने की संभावनाओं पर काम कर रही हैं। 
  • अंतरिक्ष जैव-प्रौद्योगिकी में इसरो का माइक्रोग्रैविटी जीवविज्ञान कार्यक्रम अंतरिक्ष में जैविक प्रणालियों के व्यवहार को समझने पर केंद्रित है। जैसे-जैसे भारत दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष अभियानों की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य, माइक्रोबायोम एवं जीवन-समर्थन प्रणालियों पर शोध का महत्व बढ़ता जा रहा है। हालाँकि, इन क्षेत्रों में तकनीकें अभी प्रारंभिक चरण में हैं, जिसके कारण निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित है। 

वैश्विक परिदृश्य

  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यूरोपीय संघ समुद्री जैव-अन्वेषण और शैवाल-आधारित जैव-सामग्रियों पर बड़े कार्यक्रमों का समर्थन करता है जिन्हें साझा अनुसंधान अवसंरचना का सहयोग प्राप्त है। 
  • चीन ने समुद्री शैवाल की कृषि एवं जैव-प्रसंस्करण को बड़े पैमाने पर विस्तार दिया है और इसे खाद्य, औषधि व जैव-सामग्री उद्योगों से जोड़ा है। 
  • अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी को रणनीतिक रूप से बढ़ावा दे रहे हैं।
  • अमेरिका अंतरिक्ष जैव-प्रौद्योगिकी में अग्रणी भूमिका निभा रहा है जहाँ नासा एवं अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के माध्यम से जीवन विज्ञान से जुड़े विविध प्रयोग किए जाते हैं।  
  • यूरोप, चीन एवं जापान की अंतरिक्ष एजेंसियाँ भी माइक्रोग्रैविटी में पौधों की वृद्धि, जैव-सामग्री निर्माण व इक्रोबायोम पर शोध कर रही हैं।

आगे की दिशा

  • समुद्री एवं अंतरिक्ष जैव-प्रौद्योगिकी ऐसे उभरते क्षेत्र हैं, जहाँ प्रारंभिक निवेश व  स्पष्ट रणनीति दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित कर सकती है। 
  • भारत की समृद्ध समुद्री पारिस्थितिकी और बढ़ती अंतरिक्ष क्षमताएँ उसे वैश्विक नेतृत्व की दिशा में ले जा सकती हैं। यद्यपि इसके लिए आवश्यक है कि अनुसंधान एवं विकास में बिखरे प्रयासों को एकजुट किया जाए। 
  • वस्तुतः लक्ष्यों की स्पष्टता, समय-सीमा और परिणामों के साथ एक समर्पित रोडमैप न केवल निवेश को दिशा देगा, बल्कि संस्थानों के बीच समन्वय को मजबूत कर भारत को इस नई जैव-प्रौद्योगिकीय क्रांति में अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर सकता है।
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