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धारा 66ए संबंधी विवाद

(प्रारंभिक परीक्षा- राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ व अधिकारों संबंधी मुद्दे)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3 : सूचना प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें)

संदर्भ 

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66ए को समाप्त होने के छह वर्ष बाद भी विभिन्न राज्यों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा इसके उपयोग के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से जवाब मांगा है।
  • इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों से कहा है कि वे निरस्त प्रावधान के तहत मामले दर्ज न करें। साथ ही, इसके समाप्त होने के बाद दर्ज किसी भी मामले को वापस लें।

धारा 66ए की पृष्ठभूमि 

  • वर्ष 2008 में सरकार ने आई.टी. अधिनियम, 2000 में संशोधन करते हुए सरकार को कथित रूप से ‘अपमानजनक और खतरनाक’ ऑनलाइन पोस्ट के लिये किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी और कारावास की शक्ति प्रदान की थी। इसे संसद में बिना चर्चा के पारित किया गया था।
  • धारा 66ए ने पुलिस को स्वविवेक के अनुसार, किसी पोस्ट को ‘अपमानजनक’ या ‘खतरनाक’ या ‘असुविधाजनक’ मानते हुए गिरफ्तार करने का अधिकार दिया। इसने कंप्यूटर, मोबाइल फोन या टैबलेट या किसी अन्य संचार उपकरण के माध्यम से संदेश भेजने के लिये किसी दोषी को अधिकतम तीन वर्ष का कारावास निर्धारित किया।
  • वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ’ के ऐतिहासिक मामले में इस कानून को "असंवैधानिक रूप से अस्पष्ट" कहते हुए इंटरनेट पर वाक् स्वतंत्रता का विस्तार किया।
  • प्रमुख समस्या ‘अपमानजनक’ शब्द के बारे में अस्पष्टता को लेकर थी। यह शब्द बहुत व्यापक और विशिष्ट अर्थ वाला था। इसे व्यक्तिपरक माना गया, जिसके परिणामस्वरूप धारा 66ए के तहत पुलिस प्रथम दृष्टया गिरफ्तारी कर सकती है।

    सर्वोच्च न्यायालय में धारा 66ए संबंधी याचिका  

    • नवंबर 2012 में एक फेसबुक पोस्ट पर ठाणे पुलिस द्वारा दो लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद पहली याचिका दायर की गई थी। इन लड़कियों ने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार पर टिप्पणी की थी। याचिका उस समय कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने दायर की थी।
    • अन्य याचिकाकर्ताओं में जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा शामिल हैं, जिन्हें फेसबुक पर तृणमूल कॉन्ग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी पर कैरिकेचर फॉरवर्ड करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 
    • सामाजिक कार्यकर्त्ता असीम त्रिवेदी को संसद और संविधान की अक्षमता दर्शाने वाले कार्टून बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। एयर इंडिया के कर्मचारी मयंक शर्मा और के.वी. राव को अपने फेसबुक ग्रुप पर राजनेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

    चुनौती का आधार

    • वर्ष 2008 के संशोधन का उद्देश्य, विशेष रूप से सोशल मीडिया के माध्यम से, सूचना प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग को रोकना था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि धारा 66A का मापदंड अत्यंत व्यापक है।
    • इस धारा में प्रयोग किये गए अधिकांश शब्दों को अधिनियम के तहत विशेष रूप से परिभाषित नहीं किया गया था। याचिकाओं में तर्क दिया गया कि यह कानून संविधान के तहत प्राप्त वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम करने का एक संभावित उपकरण है।

    सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

    • 24 मार्च, 2015 को श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन की पीठ ने धारा 66ए को ‘अनुच्छेद 19(1)(ए) का उल्लंघन करने’ और अनुच्छेद 19(2) के तहत असंवैधानिक घोषित किया।
    • अनुच्छेद 19(1)(ए) लोगों को वाक् और अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, जबकि 19(2) इस अधिकार के प्रयोग पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगाने की शक्ति प्रदान करता है।
    • न्यायालय के निर्णय को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर राज्य के अतिक्रमण के खिलाफ एक ऐतिहासिक फैसला माना गया।
    • इस बेंच ने धारा 79 पर भी विचार किया जो वर्तमान में केंद्र और माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म ट्विटर के बीच ‘मध्यस्थता दायित्व’ को लेकर चल रहे विवाद के केंद्र में है।
    • धारा 79 के अनुसार, किसी भी मध्यस्थ (जैसे- फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर आदि) को उसके प्लेटफॉर्म पर किसी तीसरे पक्ष द्वारा उपलब्ध या होस्ट की गई की गलत जानकारी, डाटा या संचार लिंक के लिये कानूनी या किसी अन्य प्रकार से उत्तरदायी नहीं ठहराया जाएगा। हालाँकि, ‘मध्यस्थता दायित्व’ का लाभ पाने के लिये इन सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है।
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