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सुमी नागाओं की पारंपरिक औषधीय विरासत

(प्रारंभिक परीक्षा: पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: भारतीय संस्कृति, भारत की विविधता)

संदर्भ

सुमी नागाओं की पारंपरिक औषधीय प्रथाएँ एक जीवित ज्ञान प्रणाली है जो पीढ़ियों से मौखिक रूप से हस्तांतरित होती रही है। यदि कानूनी ढांचे के माध्यम से इसे संरक्षित नहीं किया जाता है तो यह ज्ञान खो सकता है और बायोपायरेसी (जैव-चोरी) का खतरा हो सकता है।

नागालैंड की पहाड़ियों में प्राचीन ज्ञान के बारे में

  • नागालैंड के ज़ुन्हेबोटो जिले की धुंध भरी पहाड़ियों में सुमी नागाओं ने पौधों एवं अनुष्ठानों के माध्यम से उपचार की एक जीवंत परंपरा को संरक्षित किया है।
  • ये पारंपरिक औषधीय प्रथाएँ मौखिक रूप से प्रसारित होती हैं जो एक जीवित ज्ञान प्रणाली का निर्माण करती हैं तथा जैव-विविधता को सांस्कृतिक पहचान के साथ जोड़ती है।

सुमी नागाओं की जीवित ज्ञान प्रणाली

  • मौखिक हस्तांतरण एवं अभ्यास: सुमी नागा औपचारिक फार्माकोपिया पर निर्भर नहीं करते हैं। इसके बजाय उनका पारंपरिक औषधीय ज्ञान कहानियों, गीतों, आदिवासी चिकित्सकों- हड्डी रोग विशेषज्ञों, दाइयों, बुजुर्गों- की विशेषज्ञता में निहित है और मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है।
  • पारंपरिक उपचार 
    • अल्बिज़िया चिनेंसिस (स्थानीय रूप से अम्वोसु): पाउडर वाली इस छाल का उपयोग कृमिनाशक के रूप में मेजबान को नुकसान पहुंचाए बिना परजीवी को खत्म करने के लिए किया जाता है।
    • अल्बिज़िया लेबेक (अज़ुयिसू): रक्त विषाक्तता, ब्रोन्कियल विकारों और रतौंधी के लिए उपयोग किया जाता है।
    • आर्टेमिसिया इंडिका (अहुपी): बहुमुखी प्रयोग किया जाता है तथा अस्थमा, गैस्ट्राइटिस, त्वचा के अल्सर में उपचार में प्रयोग किया जाता है और दौरे (Convulsions) को रोकने के लिए बच्चे के सिर पर पत्तियों का पेस्ट लगाया जाता है।
    • आर्टेमिसिया निलगिरिका (अचुपी): बवासीर के लिए पत्तियों का काढ़ा, सिरदर्द के लिए माथे पर रस मला जाता है; जड़ों का उपयोग टॉनिक/एंटीसेप्टिक के रूप में किया जाता है।
    • बैंबूसा टुल्डा (अवुती): बांस के अंकुर भोजन में स्वाद बढ़ाते हैं; पौधे से बने पेस्ट का उपयोग चेचक और विषाक्त दंश के उपचार के लिए किया जाता है।
    • करकुमा एंगुस्टिफोलिया (अनाशिबो): इसकी प्रकंद को मसलने से सुगंध आती है और इसे पीलिया, रक्त शोधन, अल्सर, गुर्दे की पथरी के लिए उपयोग किया जाता है।
    • अज़ादिराक्टा इंडिका (अखोसबा, नीम): बुखार से लेकर मसूड़ों की बीमारी तक में प्रयुक्त; माना जाता है कि इसका धुआं वायरस और कीड़ों को दूर भगाता है।
    • डेब्रेगेसिया लोंगिफोलिया (अवुखु-नाबो): इसकी छाल का उपयोग क्लींजिंग शैम्पू के रूप में किया जाता है; फल पाचन में सहायता करते हैं।
    • खोल्लेथी (फाइलेन्थस एम्ब्लिका): विटामिन सी से भरपूर होता है; स्कर्वी, दस्त, पेचिश, सिरदर्द एवं सफेद बालों के उपचार के लिए उपयोग किया जाता है। बीज का उपयोग अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और पित्त रोग के इलाज में किया जाता है।
    • मुघुनीये (फगोपाइरम एस्कुलेंटम; बकवीट): इसका प्रयोग विशेषकर कमज़ोर केशिकाओं के उपचार के लिए किया जाता है; यह वैरिकाज़ वेन (Varicose Veins) को मजबूत बनाने और चिलब्लेन्स (Chilblains) के इलाज में भी मदद करता है।
    • तुघामी सुबो (एल्स्टोनिया स्कॉलरिस): इसकी छाल का इस्तेमाल अस्थमा, अपच, पुरानी दस्त और घावों से खून बहना रोकने के लिए किया जाता है।
    • खाखुथी (सोलेनम इंडिकम): अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, त्वचा रोगों के इलाज में उपयोग किया जाता है, प्रसव पीड़ा और दांत दर्द से राहत प्रदान करता है।
    • नेबाथी (फिकस बेंजामिना): इसकी पत्तों का काढ़ा अल्सर के उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता है; कोमल टहनियाँ खांसी, पेचिश के लिए प्रयुक्त होती हैं।
    • ताचिसु (कैलिकाल्पा आर्बोरिया): बुखार, गैस्ट्राइटिस और त्वचा रोगों को ठीक करता है।
    • कोपूपू (बौहिनिया ग्लौका): इसकी छाल का काढ़ा पेचिश के उपचार में प्रयोग किया जाता है, इसका अर्क जहरीले कीड़ों के काटने पर इस्तेमाल किया जाता है।
    • सुमुघा (एलियम एस्केलॉनिकम; शैलॉट): इसकी कंद के क्वाथ को दूध, मक्खन एवं हींग (फेरुला एसफोटिडा) के साथ मिलाकर पेस्ट बनाया जाता है और लकवे के इलाज के लिए लगाया जाता है।
    • शेनहानिबो (रिसिनस कम्युनिस; अरंडी): इसके पत्ते कृमिनाशक होते हैं। पत्तों को भाप से गर्म करके सूजन, फोड़े और गठिया वाले जोड़ों पर रखा जाता है। तेल रेचक होता है, त्वचा की सूजन और कुष्ठ रोग में इस्तेमाल किया जाता है।
    • लवत्सुना (एलियम ट्यूबरोसम): जड़ी-बूटियों का काढ़ा मूत्र संक्रमण के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है, इसे एक अच्छा मूत्रवर्धक माना जाता है।
    • लुटुसु (एल्नस नेपालेंसिस): इसकी छाल का पेस्ट पेट दर्द और पेचिश को ठीक करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पत्तों का पेस्ट कटने और घावों पर लगाया जाता है।

पारंपरिक ज्ञान के लिए खतरे

  • बायोपायरेसी: कानूनी सुरक्षा उपायों के बिना फार्मास्युटिकल कंपनियाँ बिना किसी मुआवजे या पहचान के स्वदेशी ज्ञान का फायदा उठा सकती हैं।
  • जैव विविधता का नुकसान: वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन उन पौधों को ही खतरे में डाल रहे हैं जो इन इलाजों का आधार हैं।
  • सांस्कृतिक क्षरण: युवा पीढ़ी पारंपरिक प्रथाओं से दूर जा रही है जिससे सदियों पुरानी बुद्धिमत्ता के खोने का खतरा है।

समुदाय-केंद्रित कानूनी ढाँचे की आवश्यकता

  • सामूहिक स्वामित्व की पहचान: पारंपरिक ज्ञान प्राय: किसी एक आविष्कारक की रचना नहीं होती है, बल्कि यह सामुदायिक अभ्यास और मौखिक हस्तांतरण (प्रसारण) का परिणाम होता है। कानूनी ढाँचे के माध्यम से व्यक्तिगत पेटेंट के बजाय सामूहिक अधिकारों की अनुमति देनी चाहिए।
  • स्वतंत्र, पूर्व एवं सूचित सहमति (FPIC): समुदायों को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि उनके ज्ञान का उपयोग कैसे और किन शर्तों पर किया जा सकता है।
  • लाभ-साझाकरण तंत्र: जब औषधीय पौधे या ज्ञान वाणिज्यिक उत्पादों की ओर ले जाते हैं तो समुदायों को पुरस्कारों में हिस्सा मिलना चाहिए, उन्हें बाहर नहीं किया जाना चाहिए। 
  • पारंपरिक कानून के साथ तालमेल: इस फ्रेमवर्क को स्थानीय पारंपरिक  कानूनों और ज्ञान प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए।
  • अद्वितीय संरक्षण: एक ऐसी विशेष कानूनी व्यवस्था (पारंपरिक ज्ञान को क्लासिक पेटेंट प्रणालियों में जबरदस्ती ढालने की बजाय) उपयुक्त हो सकती है, जो ज्ञान के पीढ़ी-दर-पीढ़ी, विकसित होने वाले, सामुदायिक स्वरूप को पहचानती हो।
  • दस्तावेज़ीकरण एवं डेटाबेस (नियंत्रण के साथ): हालाँकि, मौखिक हस्तांतरण मुख्य है, रणनीतिक दस्तावेज़ीकरण (समुदाय के नियंत्रण के साथ) ज्ञान को गलत इस्तेमाल से बचाने में मदद कर सकता है और गलत पेटेंट को रोकने के लिए पहले के उपयोग (प्रायर आर्ट) के सबूत के रूप में काम कर सकता है।
    • जैव विविधता अधिनियम, 2002 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 जैसे अधिनियम कुछ अधिकार प्रदान करते हैं किंतु वे मौखिक रूप से प्रसारित, सामुदायिक ज्ञान की रक्षा के लिए अपर्याप्त हैं।
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