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राजस्थान अशांत क्षेत्र विधेयक

संदर्भ

हाल ही में, राजस्थान सरकार ने ध्वनि मत से एक विवादास्पद विधेयक पारित किया है जिसका उद्देश्य सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील या ‘अशांत’ घोषित क्षेत्रों में अचल संपत्ति के लेनदेन को विनियमित करना है। यद्यपि सरकार इसे ‘संकटकालीन बिक्री’ (Distress Sale) रोकने के एक उपाय के रूप में प्रस्तुत कर रही है किंतु इसके सामाजिक-कानूनी निहितार्थों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। 

विधेयक के प्रमुख प्रावधान और संरचना 

इस विधेयक की रूपरेखा संपत्ति के हस्तांतरण पर राज्य के कड़े नियंत्रण को दर्शाती है-

  • अशांत क्षेत्र की घोषणा (धारा 3): राज्य सरकार को यह विवेकाधीन शक्ति प्राप्त है कि वह सांप्रदायिक हिंसा, दंगों या सार्वजनिक अव्यवस्था की आशंका के आधार पर किसी भी क्षेत्र को ‘अशांत’ अधिसूचित कर सकती है।
  • हस्तांतरण हेतु पूर्व अनुमति (धारा 5): अधिसूचित क्षेत्रों में भूमि, आवास या व्यावसायिक संपत्तियों की बिक्री, उपहार या पट्टे के लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM) की लिखित स्वीकृति अनिवार्य है। बिना अनुमति के किए गए सौदे शून्य (Null and Void) माने जाएंगे।
  • जांच की शक्ति (धारा 7): कलेक्टर को यह जाँच करने का अधिकार है कि संपत्ति का हस्तांतरण स्वैच्छिक है या किसी धमकी/दबाव का परिणाम।
  • दंडात्मक प्रावधान (धारा 9 और 12): उल्लंघन की स्थिति में 3 से 5 वर्ष का कारावास और जुर्माना प्रस्तावित है। इस अपराध को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है। 

गुजरात मॉडल के साथ तुलनात्मक विश्लेषण 

राजस्थान का यह विधेयक काफी हद तक गुजरात के 1991 के अधिनियम (2020 में संशोधित) से प्रेरित प्रतीत होता है।

  • समानता: दोनों का प्रारंभिक तर्क संकटकालीन बिक्री को रोकना और अल्पसंख्यक समुदायों के हितों की रक्षा करना था।
  • नकारात्मक प्रभाव: गुजरात के अनुभव बताते हैं कि ऐसे कानूनों ने अनजाने में ‘आवासीय पृथक्करण’ (Ghettoization) को बढ़ावा दिया है। अहमदाबाद के जुहापुरा जैसे क्षेत्र इसके उदाहरण हैं जहाँ एक विशेष समुदाय का भौगोलिक विस्तार सीमित हो गया है।
  • ध्रुवीकरण: आलोचकों का तर्क है कि ऐसे कानून ‘मिश्रित बस्तियों’ की अवधारणा को समाप्त कर सामाजिक विभाजन को संस्थागत रूप देते हैं।

संवैधानिक एवं कानूनी चुनौतियाँ 

इस विधेयक की वैधता को मुख्य रूप से दो संवैधानिक अनुच्छेदों के आधार पर परखा जा सकता है-

  • अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार): यद्यपि यह मौलिक अधिकार नहीं है किंतु एक संवैधानिक अधिकार है। किसी व्यक्ति को केवल ‘कानून के उचित अधिकार’ द्वारा ही उसकी संपत्ति के उपभोग से वंचित किया जा सकता है। यहाँ ‘उचित’ शब्द की व्याख्या न्यायिक समीक्षा का विषय है।
  • अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार): यदि यह कानून चयनात्मक आधार पर लागू किया जाता है या इसके प्रावधान किसी विशिष्ट समुदाय को असमान रूप से प्रभावित करते हैं तो इसे ‘तर्कहीन वर्गीकरण’ के आधार पर चुनौती दी जा सकती है। 

प्रमुख चिंताएँ और आलोचना 

विपक्ष एवं नागरिक समाज ने निम्नलिखित बिंदुओं पर चिंता व्यक्त की है-

  • प्रशासनिक विवेकाधिकार: ‘जनसांख्यिकीय असंतुलन’ जैसे अस्पष्ट शब्द नौकरशाही को अत्यधिक शक्तियाँ देते हैं जिससे भ्रष्टाचार व उत्पीड़न की संभावना बढ़ती है।
  • बाजार की गतिशीलता: अनिवार्य अनुमति की प्रक्रिया रियल एस्टेट बाजार को धीमा कर सकती है और संपत्ति के मूल्यों को कृत्रिम रूप से प्रभावित कर सकती है।
  • सामाजिक ध्रुवीकरण: यह नीति सामुदायिक सीमाओं को अधिक मजबूत कर सकती है जो एक बहुलवादी समाज के ‘साझा संस्कृति’ (Cosmopolitan) ढांचे के विपरीत है। 

निष्कर्ष

राजस्थान अशांत क्षेत्र विधेयक का उद्देश्य सैद्धांतिक रूप से कमजोर वर्गों को जबरन विस्थापन से बचाना हो सकता है परंतु इसका क्रियान्वयन समावेशी शहरी विकास के सिद्धांतों के साथ टकराव पैदा करता है। सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (संपत्ति के अधिकार) के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है ताकि यह कानून सामाजिक समरसता के बजाय अलगाव का साधन न बन जाए। 

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