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नाविक (NavIC)(IRNSS) क्या है?

  • भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC (IRNSS) को हाल ही में एक गंभीर तकनीकी झटका लगा है, क्योंकि इसके एक महत्वपूर्ण उपग्रह IRNSS-1F में लगी परमाणु घड़ी ने काम करना बंद कर दिया है।
  • परमाणु घड़ी की विफलता के कारण यह उपग्रह अब सटीक पोजिशनिंग डेटा प्रदान करने में सक्षम नहीं रहा, जिससे पूरे NavIC सिस्टम की सटीकता प्रभावित हुई है।
  • इसके साथ ही, NVS-02 प्रतिस्थापन उपग्रह का अपनी अंतिम कक्षा तक न पहुँच पाना इस समस्या को और बढ़ा देता है, क्योंकि पुराने उपग्रहों की जगह लेने वाला नया उपग्रह पूरी तरह कार्यशील नहीं हो पाया।
  • इस घटनाक्रम ने भारत की स्वदेशी GPS जैसी प्रणाली विकसित करने की महत्वाकांक्षा के सामने तकनीकी और प्रबंधन संबंधी चुनौतियाँ उजागर कर दी हैं।

NavIC (IRNSS) क्या है ?

  • NavIC (Navigation with Indian Constellation) भारत की क्षेत्रीय उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा विकसित किया गया है।
  • इसे इस उद्देश्य से बनाया गया है कि भारत और उसके आसपास लगभग 1500 किलोमीटर क्षेत्र में स्वतंत्र, सटीक और विश्वसनीय नेविगेशन सेवाएँ उपलब्ध कराई जा सकें।
  • इसकी मूल संरचना 7 उपग्रहों पर आधारित है, जो भूतुल्यकालिक (Geostationary) और भूतुल्यसमकालिक (Geosynchronous) कक्षाओं में स्थापित हैं, जिससे यह क्षेत्र विशेष में मजबूत सिग्नल प्रदान करता है।
  • NavIC की अनुमानित सटीकता लगभग 10 मीटर है, जो इसे नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए उपयोगी बनाती है।
  • यह प्रणाली विशेष रूप से भारत जैसे विविध भू-भाग वाले देश में घाटियों, जंगलों और शहरी क्षेत्रों में बेहतर सिग्नल उपलब्ध कराने के लिए डिज़ाइन की गई है।
  • हालांकि, शुरुआत से ही इसे तकनीकी समस्याओं, विशेषकर परमाणु घड़ियों की विफलता और उपग्रहों के aging जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।

परमाणु घड़ी का महत्व

  • उपग्रह नेविगेशन प्रणाली का पूरा कार्य अत्यंत सटीक समय मापन पर आधारित होता है, और यही कार्य परमाणु घड़ियाँ करती हैं।
  • प्रत्येक उपग्रह अपने सिग्नल के साथ एक सटीक समय संकेत भेजता है, और रिसीवर उस सिग्नल के पहुँचने में लगे समय के आधार पर उपग्रह से दूरी की गणना करता है।
  • इस प्रक्रिया को ट्राइलेटरशन (Trilateration) कहा जाता है, जिसके माध्यम से उपयोगकर्ता का सटीक स्थान निर्धारित किया जाता है।
  • यदि परमाणु घड़ी में मामूली भी त्रुटि आ जाए, तो दूरी की गणना में बड़ी गलती हो सकती है, जिससे लोकेशन डेटा गलत हो जाता है।
  • यही कारण है कि IRNSS-1F में घड़ी की विफलता के बाद वह उपग्रह नेविगेशन सेवा देने में लगभग निष्क्रिय हो गया, हालांकि सीमित संदेश सेवाएँ अभी भी जारी हैं।

 NavIC उपग्रहों की वर्तमान स्थिति

  • NavIC तारामंडल में कई उपग्रह अब अपनी निर्धारित आयु के अंत के करीब पहुँच चुके हैं या उससे आगे निकल चुके हैं, जिससे सिस्टम की स्थिरता प्रभावित हो रही है।
  • IRNSS-1A पहले ही परमाणु घड़ी की विफलता के कारण लगभग निष्क्रिय हो चुका है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।
  • IRNSS-1B और IRNSS-1C जैसे उपग्रह अपना लगभग 10 वर्षों का जीवनकाल पूरा कर चुके हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है।
  • हाल ही में IRNSS-1F की घड़ी खराब होने से पोजिशनिंग डेटा देने वाले उपग्रहों की संख्या और कम हो गई है।
  • वर्तमान में कार्यशील उपग्रहों की संख्या घटने से NavIC की कवरेज, सटीकता और विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है।

NVS-02 उपग्रह और उसकी विफलता

  • NVS-02 NavIC की नई पीढ़ी का दूसरा उपग्रह है, जिसे जनवरी 2025 में GSLV-F15 रॉकेट के माध्यम से लॉन्च किया गया था।
  • इसका उद्देश्य पुराने उपग्रहों को प्रतिस्थापित करना और NavIC की क्षमता को मजबूत बनाना था।
  • लॉन्च के बाद इसे एक ट्रांसफर कक्षा में स्थापित किया गया, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण इसका इंजन चालू नहीं हो पाया।
  • जांच में पाया गया कि ऑक्सीडाइज़र लाइन में पायरो वाल्व को सक्रिय करने वाला सिग्नल इंजन तक नहीं पहुँचा, जिससे उपग्रह अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं जा सका।
  • यह विफलता NavIC कार्यक्रम के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि इससे पहले भी IRNSS-1H (2017) मिशन असफल रहा था।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • NavIC प्रणाली को लगातार परमाणु घड़ियों की विफलता जैसी तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जो इसकी सटीकता को सीधे प्रभावित करती हैं।
  • कई उपग्रह अपने जीवनकाल के अंत तक पहुँच चुके हैं, जिससे प्रणाली की निरंतरता बनाए रखना कठिन हो गया है।
  • प्रतिस्थापन उपग्रहों के लॉन्च में असफलता या आंशिक सफलता से सिस्टम की मजबूती कमजोर पड़ रही है।
  • यूजर रिसीवर और इकोसिस्टम के विकास में देरी के कारण NavIC का व्यापक उपयोग अभी तक नहीं हो पाया है।
  • वैश्विक प्रणालियों जैसे GPS, Galileo और BeiDou की तुलना में NavIC अभी भी सीमित कवरेज और कम उपग्रहों के कारण पीछे है।

वैश्विक नेविगेशन प्रणालियाँ

  • विश्व में चार प्रमुख वैश्विक नेविगेशन प्रणालियाँ हैं:
    • अमेरिका का GPS
    • रूस का GLONASS
    • यूरोप का Galileo
    • चीन का BeiDou
  • इन सभी प्रणालियों में 20 से अधिक उपग्रह होते हैं और ये मध्यम पृथ्वी कक्षा (MEO) में स्थित होते हैं, जिससे वैश्विक कवरेज संभव होता है।
  • इसके विपरीत, NavIC एक क्षेत्रीय प्रणाली है, जो कम उपग्रहों के साथ सीमित क्षेत्र में उच्च सटीकता प्रदान करने के लिए डिज़ाइन की गई है।
  • जापान की QZSS प्रणाली भी इसी प्रकार की क्षेत्रीय प्रणाली है, जो GPS को पूरक रूप में सहायता प्रदान करती है।

नई पीढ़ी के सुधार

  • ISRO द्वारा स्वदेशी परमाणु घड़ियों का विकास किया जा रहा है, जिससे विदेशी निर्भरता कम होगी और विश्वसनीयता बढ़ेगी।
  • नए NavIC उपग्रहों में L1 बैंड को शामिल किया गया है, जिससे यह GPS के साथ बेहतर संगत हो सकेगा और स्मार्टफोन जैसे उपकरणों में उपयोग आसान होगा।
  • उपग्रहों का जीवनकाल 10 वर्ष से बढ़ाकर 12 वर्ष किया गया है, जिससे दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होगी।
  • बेहतर इंटरऑपरेबिलिटी के कारण NavIC अब अन्य वैश्विक प्रणालियों के साथ मिलकर अधिक प्रभावी तरीके से काम कर सकता है।

भारत की महत्वाकांक्षा

  • भारत का लक्ष्य केवल क्षेत्रीय नेविगेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में वैश्विक स्तर की नेविगेशन प्रणाली विकसित करना भी है।
  • इसके पीछे प्रमुख कारण हैं:
    • राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता
    • विदेशी GPS पर निर्भरता कम करना
    • आर्थिक क्षेत्रों (लॉजिस्टिक्स, परिवहन, ड्रोन, स्मार्ट सिटी) में उपयोग बढ़ाना
  • इसके लिए भारत को अधिक उपग्रह लॉन्च करने, तकनीकी विश्वसनीयता सुधारने और निजी क्षेत्र को शामिल करने की आवश्यकता होगी।
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