(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, सामान्य विज्ञान) (मुख्य परीक्षा, समान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: सूचना प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषय) |
संदर्भ
हाल ही में, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार स्मार्टफोन कंपनियों से यह अपेक्षा करने पर विचार कर रही है कि वे अपने सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड को थर्ड-पार्टी टेस्टिंग एजेंसियों के साथ साझा करें और बड़े सॉफ्टवेयर अपडेट लागू करने से पहले सरकारी अधिकारियों को इसकी सूचना दें। हालांकि, केंद्र सरकार ने इसका खंडन किया है।
क्या होता है सोर्स कोड
- सोर्स कोड दरअसल उन निर्देशों एवं डिजिटल संसाधनों का मूल ढांचा होता है जिन पर कोई भी सॉफ्टवेयर सिस्टम काम करता है। आसान शब्दों में कहें तो यह बेहद संवेदनशील और गोपनीय जानकारी होती है जो किसी डिवाइस की मेमोरी, प्रोसेसर, सेंसर और हार्डवेयर से जुड़ी क्षमताओं को नियंत्रित करती है।
- हालांकि, एंड्रॉइड जैसे कुछ प्लेटफॉर्म आंशिक रूप से ओपन-सोर्स हैं किंतु स्मार्टफोन निर्माता इनमें बड़े पैमाने पर अपने मालिकाना बदलाव करते हैं जिन्हें वे सख्ती से सुरक्षित रखते हैं।
- सोर्स कोड की सुरक्षा सिर्फ व्यावसायिक कारणों से ही नहीं है, बल्कि साइबर सुरक्षा के लिहाज से भी जरूरी मानी जाती है क्योंकि आंतरिक संरचना उजागर होने से हैकर्स को कमजोरियां तलाशने और साइबर हमले करने का मौका मिल सकता है।
सोर्स कोड का खुलासा असामान्य मानने का कारण
किसी कंपनी के बाहर सोर्स कोड साझा करना बेहद दुर्लभ होता है और प्राय: यह प्रक्रिया रक्षा जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों तक ही सीमित रहती है। उदाहरण के तौर पर, एप्पल जैसी कंपनियां स्थानीय कानूनों के अनुरूप देश-विशेष नीतियां अपनाती हैं किंतु इसके बावजूद उन्होंने चीनी सरकार के साथ भी अपना सोर्स कोड साझा नहीं किया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसी मांग कितनी असाधारण और संवेदनशील हो सकती है।
विवाद की पृष्ठभूमि: संचार साथी और ITSAR
- यह मुद्दा तब अधिक समाचार में आया जब स्मार्टफोन निर्माताओं को ‘संचार साथी’ ऐप पहले से इंस्टॉल (Pre-install) करने के निर्देश दिए गए, जिसका कड़ा विरोध हुआ। डर है कि ऐसे कदम सरकारी निगरानी (Surveillance) का जरिया बन सकते हैं।
- नियामक ढांचा और भ्रम की स्थिति
- सोर्स कोड की यह चर्चा दूरसंचार विभाग के राष्ट्रीय संचार सुरक्षा केंद्र द्वारा 2023 में जारी एक दस्तावेज़ से शुरू हुई, जिसे आई.टी.एस.ए.आर. (ITSAR) कहा जाता है।
- पहले स्मार्टफोन ‘अनिवार्य परीक्षण एवं प्रमाणीकरण’ (MTCTE) के दायरे में थे।
- किंतु दूरसंचार अधिनियम, 2023 के बाद सरकार ने इन्हें इस दायरे से बाहर कर दिया क्योंकि ये पहले से ही BIS (भारतीय मानक ब्यूरो) द्वारा प्रमाणित होते हैं।
- अब इसकी निगरानी की जिम्मेदारी इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के पास है जो फिलहाल इस मुद्दे पर हितधारकों के साथ विचार-विमर्श कर रहा है।
उद्योग एवं नागरिक संगठनों की प्रतिक्रियाएँ
- उद्योग संगठन इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन ने इन चर्चाओं को जरूरत से ज्यादा गंभीर न मानने की बात कही है। सरकारी अधिकारियों का भी कहना है कि अभी तक कोई अंतिम नियम तय नहीं किए गए हैं जिससे संकेत मिलता है कि बातचीत अभी शुरुआती चरण में है।
- वहीं, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) ने इन दावों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आई.टी.एस.ए.आर. से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं किंतु हितधारकों की बैठकों में पारदर्शिता की कमी है। आई.एफ.एफ. ने बैठकों के कार्यवृत्त सार्वजनिक करने एवं खुले परामर्श की मांग की है।
- वस्तुतः संस्था का कहना है कि डिजिटल अधिकारों, साइबर सुरक्षा एवं उपभोक्ता भरोसे जैसे अहम मुद्दों पर नीतियां केवल बंद कमरों में बड़ी तकनीकी कंपनियों के साथ चर्चा के आधार पर तय नहीं की जानी चाहिए, बल्कि इसके लिए व्यापक और पारदर्शी संवाद जरूरी है।
आगे की राह
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने मांग की है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर सार्वजनिक परामर्श (Public Consultation) होना चाहिए। मामला केवल तकनीकी नहीं है बल्कि यह उपभोक्ता विश्वास, डिजिटल सुरक्षा एवं कंपनियों के बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़ा है। सरकार का ‘ओपन माइंड’ रखने का आश्वासन तभी सार्थक होगा जब नीति-निर्माण की प्रक्रिया पारदर्शी और समावेशी होगी।