संदर्भ
हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में तीन बहनों ने सोशल मीडिया और मोबाइल लत के कारण उपजे पारिवारिक तनाव के चलते आत्महत्या कर ली। इस त्रासदी ने भारत में नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध की आवश्यकता पर एक नई एवं गंभीर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है।
सोशल मीडिया प्रतिबंध: स्वरूप एवं प्रक्रिया
- बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का तात्पर्य एक ऐसे कानूनी ढांचे से है जो सामान्यतः 16 वर्ष से कम आयु के किशोरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने से रोकता है।
- तकनीकी उत्तरदायित्व: इसकी जिम्मेदारी टेक कंपनियों पर होती है कि वे सरकारी पहचान पत्र या बायोमेट्रिक डेटा के माध्यम से आयु सत्यापन (Age Verification) सुनिश्चित करें।
भारत का डिजिटल परिदृश्य: महत्वपूर्ण आँकड़े
- भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल उपयोगकर्ता आधार है किंतु इसके साथ ही कुछ चिंताजनक रुझान भी सामने आए हैं:
- विशाल विस्तार: वर्ष 2026 तक इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे मंचों पर भारतीय उपयोगकर्ताओं की संख्या 40 करोड़ पार कर चुकी है।
- किशोरों की सक्रियता: ASER (2025–26) के अनुसार, 90% से अधिक किशोर सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं।
- समय का निवेश: शहरी क्षेत्रों में 61% बच्चे प्रतिदिन 3 घंटे से अधिक समय ऑनलाइन बिताते हैं जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर रहा है।
- लैंगिक अंतराल: डिजिटल साक्षरता में अभी भी भारी अंतर है; केवल 33.3% महिलाओं के पास इंटरनेट पहुंच है, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 57.1% है।
प्रतिबंध के पक्ष में तर्क: सुरक्षा और स्वास्थ्य
- विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित डिजिटल पहुंच बच्चों के लिए घातक हो सकती है:
- लत और व्यवहार परिवर्तन: एल्गोरिद्म आधारित कंटेंट बच्चों को ‘डिजिटल जाल’ में फँसा लेते हैं। गाजियाबाद की घटना में भी एक ‘कोरियाई लव गेम’ के प्रति जुनून सामने आया है।
- मानसिक स्वास्थ्य संकट: आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने बढ़ते स्क्रीन टाइम को युवाओं में चिंता और अवसाद का मुख्य कारण माना है।
- साइबर सुरक्षा: एआई चैटबॉट्स और अनियंत्रित संवाद नाबालिगों को ‘साइबर-ग्रूमिंग’ का शिकार बना सकते हैं।
- एकाग्रता में कमी: निरंतर नोटिफिकेशन और सस्ता डेटा छात्रों के ‘अटेंशन स्पैन’ (ध्यान-काल) को कम कर रहा है जिससे शैक्षणिक प्रदर्शन प्रभावित होता है।
प्रतिबंध की राह में चुनौतियाँ
- पूर्ण प्रतिबंध लगाना जितना सरल दिखता है, व्यावहारिक रूप से उतना ही जटिल है:
- तकनीकी छिद्र: किशोर अक्सर VPN का उपयोग कर आयु-सीमा और ऐप प्रतिबंधों को आसानी से दरकिनार कर देते हैं।
- निजता और निगरानी: अनिवार्य पहचान सत्यापन से ‘आधार-लिंक्ड’ लॉगिन के जरिए व्यापक सरकारी निगरानी का खतरा बढ़ जाता है।
- डिजिटल अलगाव: हाशिये के समुदायों (जैसे- क्वीयर या दिव्यांग युवा) के लिए सोशल मीडिया प्राय: समर्थन का महत्त्वपूर्ण माध्यम होता है, जो प्रतिबंध से छिन सकता है।
- लैंगिक भेदभाव: कठोर नियमों के कारण पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों की इंटरनेट पहुंच को और भी सीमित किया जा सकता है।
वैश्विक उदाहरण और समाधान
- दुनिया के कई देश इस समस्या से निपटने के लिए विभिन्न मॉडल अपना रहे हैं:
- ऑस्ट्रेलिया: 16 वर्ष से कम उम्र वालों पर सख्त प्रतिबंध और उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना (5 करोड़ डॉलर तक)।
- सिंगापुर: प्रतिबंध के बजाय ऐप स्टोर के स्तर पर कड़े सत्यापन और आयु-रेटिंग का नियम।
भविष्य की राह: केवल प्रतिबंध ही काफी नहीं
- भारत को एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है:
- ड्यूटी ऑफ केयर: टेक कंपनियों को केवल प्रतिबंध के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षित एल्गोरिद्म (Safety-by-Design) के लिए जवाबदेह बनाया जाए।
- स्वतंत्र नियामक: डिजिटल सुरक्षा के लिए समर्पित एक विशेषज्ञ संस्था का गठन हो।
- डिजिटल साक्षरता: स्कूलों में बच्चों को इस 'डिजिटल वाइल्ड वेस्ट' में सुरक्षित रहने के गुर सिखाए जाएं।
- लोकतांत्रिक भागीदारी: नीतियों के निर्माण में युवाओं और किशोरों के विचारों को भी शामिल किया जाए।
निष्कर्ष
सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध एक त्वरित समाधान तो लग सकता है, लेकिन यह मूल सामाजिक समस्याओं को हल नहीं करता। बच्चों की सुरक्षा केवल 'दीवारें' खड़ी करने से नहीं, बल्कि एक जवाबदेह डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र और प्रणालीगत सुधारों से ही संभव है।