संदर्भ
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का वर्ष 2026 का पहला प्रक्षेपण असफल रहा। 12 जनवरी को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से 16 उपग्रहों (सैटेलाइट) को प्रक्षेपित करने वाला पी.एस.एल.वी.-सी62 (PSLV-C62) मिशन लॉन्चिंग के तीसरे चरण में समस्या के कारण अपनी निर्धारित कक्षा तक पहुँचने में सफल नहीं हो पाया। यह PSLV की 64वीं उड़ान थी।
- 18 मई, 2025 को भी इसरो का PSLV-C61 मिशन तकनीकी समस्या के कारण तीसरे चरण में ही विफल हो गया था। इस मिशन में EOS-09 अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को 524 किमी. की सूर्य-तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (Sun-Synchronous Polar Orbit) में स्थापित किया जाना था।
संबंधित प्रमुख बिंदु
- जनवरी 2026 और मई 2025 में असफल हुए दोनों ही PSLV मिशन मामलों में रॉकेट ने पहले दो चरणों में सामान्य प्रदर्शन किया किंतु तीसरे चरण में समस्या सामने आई। वस्तुतः यह चरण कक्षा (Orbit) प्राप्त करने के लिए आवश्यक वेग हासिल करने में निर्णायक होता है।
- पिछली विफलता का कारण दहन कक्ष में अप्रत्याशित रूप से दाब में गिरावट को बताया गया था। हालांकि, FAC (Failure Analysis Committee) की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई।
- नवीनतम विफलता के वास्तविक कारण की पुष्टि अभी नहीं हुई है किंतु इसके कारण भी समान होने की संभावना जताई जा रही है। तीसरे चरण में दाब में कमी से थ्रस्ट कम हो जाता है जिससे रॉकेट पृथ्वी की कक्षा में टिकने के लिए आवश्यक त्वरण प्राप्त नहीं कर पाता है।
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पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) के बारे में
- पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) भारत का तीसरी पीढ़ी का लॉन्च व्हीकल है। यह लिक्विड स्टेज से लैस होने वाला पहला भारतीय लॉन्च व्हीकल है।
- अक्तूबर 1994 में अपने पहले सफल प्रक्षेपण के बाद पी.एस.एल.वी. भारत के एक विश्वसनीय और बहुमुखी लॉन्च व्हीकल के रूप में उभरा। इसने कई भारतीय एवं विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है।
- इसके अलावा इसने दो अंतरिक्ष यानों ‘चंद्रयान-1’ (2008 में) और ‘मार्स ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट’ (2013 में) का सफल प्रक्षेपण किया, जो बाद में क्रमशः चंद्रमा व मंगल ग्रह की यात्रा पर गए।
- चंद्रयान-1 और मार्स ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट पी.एस.एल.वी. की उपलब्धियों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। पी.एस.एल.वी.-सी48 का प्रक्षेपण पी.एस.एल.वी. का 50वां प्रक्षेपण है।
- लगातार विभिन्न उपग्रहों, विशेष रूप से आई.आर.एस. श्रृंखला के उपग्रहों को निम्न भू-कक्षाओं में स्थापित करने के कारण पी.एस.एल.वी. को ‘इसरो का वर्कहॉर्स’ कहा जाता है।
- अपनी अद्वितीय विश्वसनीयता के कारण PSLV का उपयोग विभिन्न उपग्रहों को भू-तुल्यकालिक एवं भू-स्थिर कक्षाओं में प्रक्षेपित करने के लिए भी किया गया है, जैसे- IRNSS तारामंडल के उपग्रह।
- PSLV एक साथ कई पेलोड को कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है, इसलिए पेलोड फेयरिंग में मल्टी-पेलोड एडेप्टर का उपयोग किया जाता है।
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पी.एस.एल.वी. का कक्षा (Orbit) तक पहुंचना
पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) चार-चरणीय प्रक्षेपण यान है। प्रत्येक चरण का अपना इंजन एवं ईंधन होता है और जब उक्त चरण का कार्य पूरा हो जाता है, तब वह अलग हो जाता है।
पहला चरण: प्रक्षेपण और वायुमंडलीय आरोहण
- पहला चरण रॉकेट को प्रक्षेपण के समय ऊपर उठाने और लगभग 50-60 किमी. की ऊँचाई तक लगभग सीधी उड़ान के लिए जिम्मेदार होता है।
- वस्तुतः ठोस ईंधन का उपयोग करते हुए यह गुरुत्वाकर्षण और वायुमंडलीय घर्षण को पार करता है। दो मिनट से कम समय में भारी ईंधन समाप्त होने के बाद यह चरण अलग हो जाता है।
दूसरा चरण: ऊर्ध्वाधर से क्षैतिज गति में संक्रमण
- दूसरा चरण स्वदेशी विकास इंजन और तरल ईंधन से संचालित होता है तथा ऊँचाई बढ़ाने के साथ-साथ क्षैतिज वेग भी प्रदान करता है।
- यह रॉकेट को लगभग 220–250 किमी. की ऊँचाई तक ले जाता है और लगभग 14,000 किमी/घंटा की गति प्राप्त कराता है जिससे कुल भार में कमी आती है।
तीसरा चरण: तीव्र त्वरण
- तीसरे चरण में यान लगभग पूरी तरह क्षैतिज पथ पर उप-कक्षीय गति करता है। इस चरण का मुख्य उद्देश्य रॉकेट को तीव्र गति प्रदान करना होता है।
- ठोस ईंधन के दहन से रॉकेट 26,000–28,000 किमी/घंटा की कक्षीय गति प्राप्त करता है जो उसे पृथ्वी पर वापस गिरने से रोकने के लिए अनिवार्य है।
चौथा चरण: सटीक कक्षा प्रविष्टि
अंतिम चरण तरल प्रणोदन का उपयोग करके उपग्रहों को उनकी निर्धारित निम्न-भू कक्षाओं (250–2,000 किलोमीटर) में सटीक रूप से स्थापित करता है। पेलोड के अलग होने के बाद सभी चरण अपना कार्य पूरा कर चुके होते हैं।
पी.एस.एल.वी. के तीसरे चरण की महत्वपूर्ण भूमिका
- तीसरा चरण प्रक्षेपण के सबसे संवेदनशील चरणों में से एक है। यदि इस दौरान आवश्यक वेग नहीं प्राप्त होता है तो रॉकेट कक्षा में टिक नहीं पाता और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस गिर जाता है, जैसा- पी.एस.एल.वी.-C61 में देखा गया।
- इस चरण में ठोस ईंधन जलकर गैस में परिवर्तित होता है जिससे दहन कक्ष के भीतर दबाव बढ़ता है। उच्च दबाव वाली गैस नोज़ल से बाहर निकलकर थ्रस्ट उत्पन्न करती है जो रॉकेट को तेज़ी से कक्षीय गति तक पहुँचाती है।
- दहन कक्ष का दबाव जितना अधिक होगा, थ्रस्ट एवं त्वरण उतना ही बढ़ेगा। किसी भी कारण से दबाव में गिरावट (जैसे- रिसाव या तकनीकी समस्या) थ्रस्ट को कम कर देती है और रॉकेट आवश्यक वेग प्राप्त नहीं कर पाता है।
पी.एस.एल.वी. की विफलता
- PSLV को अब तक कुछ अन्य असफलताओं का सामना करना पड़ा है–
- 1993 में PSLV-D1
- 2017 में PSLV-C39
- वस्तुतः 2017 की विफलता हीट शील्ड में खराबी के कारण हुई थी।
- GISAT-1/EOS-03 (अगस्त 2021): GSLV-F10 में विफलता तरल-हाइड्रोजन टैंक में क्रायोजेनिक इग्निशन के समय अपर्याप्त दबाव के कारण हुई; इसरो ने बाद में कहा कि वेंट और रिलीफ वॉल्व में लीकेज सबसे संभावित मुख्य कारण था।
- RISAT-1B/EOS-09 (मई 2025): PSLV-C61 के तीसरे चरण में गड़बड़ी; चैंबर दबाव में गिरावट के कारण लॉन्च के कुछ मिनट बाद मिशन असफल हो गया।
- NavIC/NVS-02 (जनवरी 2025): उपग्रह को GSLV-F15 द्वारा GTO में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया, लेकिन लिक्विड एपोज़ी मोटर (Liquid Apogee Motor) फायर नहीं हो सका क्योंकि ऑक्सीकारक वाल्व में खराबी थी; उपग्रह स्थानांतरण कक्षा में फंस गया और नियत नेविगेशन सेवाओं के लिए अनुपयोगी रहा।
- हालांकि, हाल की असफलताओं के बावजूद PSLV ऐतिहासिक रूप से ISRO का सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान माना जाता है। इसने चंद्रयान-1, मंगल ऑर्बिटर मिशन, आदित्य-L1 और एस्ट्रोसैट जैसे महत्वपूर्ण मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। 2017 में, इसने एक ही मिशन में 104 उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर विश्व रिकॉर्ड भी स्थापित किया था।
बार-बार विफल होने से इसरो पर प्रभाव
बार-बार होने वाली मिशन विफलताएँ, विशेष रूप से पीएसएलवी रॉकेट से जुड़ी हालिया लगातार समस्याएँ, इसरो की व्यावसायिक साख को प्रभावित कर रही हैं, रणनीतिक पेलोड के नुकसान के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताएँ पैदा कर रही हैं, और गुणवत्ता नियंत्रण व पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर रही हैं।
- विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा में गिरावट: इसरो लंबे समय से विश्वसनीय और किफायती उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं के लिए जाना जाता रहा है। लगातार दो विफलताओं ने इस छवि को नुकसान पहुँचाया है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय ग्राहक और निजी कंपनियाँ इसकी सेवाओं की भरोसेमंदता पर पुनर्विचार करने लगी हैं।
- व्यावसायिक नुकसान: पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) विदेशी उपग्रहों के वाणिज्यिक प्रक्षेपण के जरिए इसरो के लिए एक प्रमुख राजस्व स्रोत रहा है। एक ही मिशन में कई विदेशी उपग्रहों के नुकसान से ग्राहकों को भारी वित्तीय क्षति होती है और संभावित ग्राहक स्पेसएक्स और एरियनस्पेस जैसे प्रतिस्पर्धियों की ओर रुख कर सकते हैं।
- रणनीतिक और रक्षा संबंधी झटके: हाल की विफलताओं में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े रणनीतिक पेलोड (जैसे निगरानी के लिए एंवेशा उपग्रह) शामिल थे, जिन्हें आसानी या शीघ्रता से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। इससे भारत की निगरानी, खुफिया तथा प्रतिक्रिया क्षमताओं पर असर पड़ता है।
- गुणवत्ता नियंत्रण पर सवाल: लगातार दो मिशनों में तीसरे चरण से जुड़ी समान तकनीकी गड़बड़ियों की पुनरावृत्ति ने विशेषज्ञों को निर्माण और संयोजन प्रक्रियाओं में अधिक कठोर परीक्षण और गुणवत्ता आश्वासन की मांग करने के लिए प्रेरित किया है।
- पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ी चिंताएँ: पिछली घटनाओं से संबंधित विफलता विश्लेषण समिति (FAC) की रिपोर्ट सार्वजनिक न किए जाने के कारण संगठन के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को लेकर आलोचना बढ़ी है।
- मिशनों में देरी: मूल कारणों की गहन जांच और सुधारात्मक उपायों को लागू करने की आवश्यकता के चलते ‘वर्कहॉर्स’ माने जाने वाले इस रॉकेट को फिलहाल प्रभावी रूप से उड़ान से रोका गया है। इससे 2026 के महत्वाकांक्षी प्रक्षेपण कार्यक्रमों में देरी हो सकती है, जिनमें मानव मिशन गगनयान के बिना चालक परीक्षण जैसी प्रमुख उड़ानें भी शामिल हैं।
आगे की राह
इन झटकों के बावजूद अंतरिक्ष समुदाय यह मानता है कि अंतरिक्ष अन्वेषण स्वभाव से ही जोखिमपूर्ण होता है। इसरो का इतिहास विफलताओं से सीख लेकर मजबूत वापसी करने का रहा है। फिलहाल ध्यान गहन तकनीकी विश्लेषण और ठोस समाधान लागू करने पर है, ताकि पीएसएलवी मंच में दोबारा भरोसा बहाल किया जा सके।