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भारत की पहली नाइट सफारी को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी

संदर्भ

  • सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी कुकरैल नाइट सफारी एवं डे ज़ू परियोजना को मंजूरी प्रदान कर दी है। इस फैसले के साथ ही भारत की पहली नाइट सफारी और दुनिया की पाँचवीं नाइट सफारी स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। वर्तमान में ऐसी नाइट सफारी केवल सिंगापुर, थाईलैंड, चीन और इंडोनेशिया में संचालित हैं। 
  • यह परियोजना लखनऊ के बाहरी हिस्से में स्थित 2,027 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट के भीतर विकसित की जाएगी। चूंकि यह क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है और यहीं वर्ष 1975 में स्थापित भारत का पहला घड़ियाल संरक्षण केंद्र भी मौजूद है, इसलिए परियोजना को विभिन्न स्तरों पर विस्तृत परीक्षण और कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा। 

परियोजना की रूपरेखा 

  • करीब 1,510 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली यह परियोजना रिजर्व फॉरेस्ट के 855 एकड़ क्षेत्र में दो चरणों में विकसित होगी।  
    • प्रथम चरण : नाइट सफारी एवं ईको-टूरिज्म ज़ोन 
    • द्वितीय चरण : डे ज़ू (दिवसीय चिड़ियाघर)  
  • योजना के अनुसार नाइट सफारी में भारत तथा अन्य देशों के वन्यजीव परिदृश्यों से प्रेरित थीम आधारित क्षेत्र, रात्रिकालीन भ्रमण मार्ग, प्राकृतिक वातावरण वाले पशु आवास और वन ट्रेल विकसित किए जाएंगे। 
  • पर्यटकों के आवागमन के लिए बैटरी चालित वाहनों की व्यवस्था होगी तथा इसके लिए विशेष सफारी मार्ग तैयार किया जा रहा है।
  • राज्य सरकार के अनुसार यह परियोजना केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वन्यजीव संरक्षण, अनुसंधान, शिक्षा और प्रकृति-आधारित पर्यटन को भी बढ़ावा देगी। 

मास्टर प्लान के अंतर्गत विकसित सुविधाएं : 

  • संरक्षण प्रजनन (Conservation Breeding) केंद्र
  • वन्यजीव व्याख्या एवं शिक्षा केंद्र
  • कैफेटेरिया
  • 7D थिएटर
  • ऑडिटोरियम 

नाइट सफारी की प्रमुख विशेषताएं 

  • इस नाइट सफारी की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि पर्यटक रात्रिचर जीवों को उनके प्राकृतिक सक्रिय समय में देख सकेंगे। इसके लिए ऐसी विशेष प्रकाश व्यवस्था की जाएगी जो चांदनी जैसी प्राकृतिक रोशनी का अनुभव कराएगी। अधिकारियों के अनुसार यह व्यवस्था इस प्रकार तैयार की जाएगी कि जानवरों के व्यवहार या स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। 

प्रमुख वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास : 

  • परियोजना में जिन प्रमुख वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास विकसित किए जाएंगे, उनमें शामिल हैं - 
    • एशियाई शेर
    • बंगाल टाइगर
    • तेंदुआ
    • लकड़बग्घा
    • उड़ने वाली गिलहरी
    • घड़ियाल  
  • इन आवासों में घास के मैदान, आर्द्रभूमि, चट्टानी क्षेत्र और स्थानीय वनस्पतियों को शामिल किया जाएगा ताकि वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक वातावरण तैयार किया जा सके और पर्यटकों को वास्तविक जंगल जैसा अनुभव प्राप्त हो। 
  • अनुमान है कि यह नाइट सफारी सामान्य दिनों में प्रतिदिन लगभग 4,000 तथा सप्ताहांत और अवकाश के दिनों में लगभग 8,000 पर्यटकों की मेजबानी कर सकेगी।  

मंजूरी मिलने में इतना समय क्यों लगा ? 

  • मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जुलाई 2022 में इस परियोजना की घोषणा की थी, जबकि अगस्त 2022 में राज्य मंत्रिमंडल ने इसे स्वीकृति प्रदान कर दी थी। 
  • हालांकि, परियोजना रिजर्व फॉरेस्ट के भीतर प्रस्तावित होने के कारण इसे वन, वन्यजीव और पर्यावरण से संबंधित कई वैधानिक मंजूरियां प्राप्त करनी थीं।
  • वर्ष 2023 में इसे राज्य वन्यजीव बोर्ड तथा केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) से अनुमति मिली। इसके अतिरिक्त वन भूमि के उपयोग और वन्यजीव आवास पर संभावित प्रभाव को देखते हुए वन एवं पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियां भी आवश्यक थीं। 
  • बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने परियोजना का निरीक्षण किया, कुछ संशोधन सुझाए और विस्तृत समीक्षा के बाद मामला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया। कई चरणों की सुनवाई के पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने अंततः परियोजना को अंतिम स्वीकृति प्रदान कर दी।

कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट का महत्व 

  • कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट लखनऊ के सबसे महत्वपूर्ण संरक्षित हरित क्षेत्रों में गिना जाता है। इसे 1950 के दशक में प्लांटेशन फॉरेस्ट के रूप में विकसित किया गया था। 
  • इस वन का नाम कुकरैल नदी के नाम पर रखा गया है, जो गोमती नदी की सहायक धारा है। वर्तमान में कुकरैल नदी के पुनर्जीवन की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है।

घड़ियाल संरक्षण केंद्र की विशेष भूमिका 

  • इसी वन क्षेत्र में स्थित कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र (KGRC) की स्थापना वर्ष 1975 में गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियालों के संरक्षण के उद्देश्य से की गई थी।
  • पिछले पाँच दशकों में यह केंद्र देश के सबसे सफल सरीसृप संरक्षण संस्थानों में शामिल हो चुका है। यहां घड़ियालों का प्रजनन कर उन्हें विभिन्न नदियों में छोड़ा जाता है। 
  • केंद्र में अनुसंधान प्रयोगशालाएं, आधुनिक पशु चिकित्सा सुविधाएं तथा घड़ियालों और कछुओं के बचाव एवं पुनर्वास के लिए विशेष बाड़े भी उपलब्ध हैं।
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