संदर्भ
- वैश्विक अकादमिक जगत एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। शोध उत्पादन और अत्याधुनिक तकनीकों के क्षेत्र में चीनी विश्वविद्यालय अब अमेरिकी संस्थानों से आगे निकलते दिखाई दे रहे हैं।
- लीडेन और टाइम्स हायर एजुकेशन (THE) जैसी प्रतिष्ठित रैंकिंग्स इस बदलाव को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती हैं। यह परिवर्तन एक उभरती हुई नई विश्व व्यवस्था का संकेत देता है जहाँ वैज्ञानिक श्रेष्ठता ही भू-राजनीतिक प्रभाव और शक्ति का आधार बन रही है। भारत के विकास पथ के लिए भी यह बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण सबक प्रदान करता है।
वैश्विक शोध परिदृश्य में परिवर्तन
वैश्विक शोध व्यवस्था धीरे-धीरे पश्चिमी प्रभुत्व से हटकर चीनी नेतृत्व की ओर अग्रसर हो रही है। रणनीतिक रूप से STEM क्षेत्रों में किए गए बड़े निवेश के बल पर चीन ने अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। इसके परिणामस्वरूप तकनीकी और अकादमिक विश्व व्यवस्था की संरचना में मौलिक परिवर्तन हो रहा है।
अमेरिका को चुनौती के कारण
यह स्थिति इस बात का संकेत नहीं है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता में गिरावट आई है बल्कि यह दर्शाती है कि एक अधिक संगठित और आक्रामक मॉडल उन्हें पीछे छोड़ रहा है।
संसाधनों की सीमाएँ
अमेरिकी विश्वविद्यालय मुख्यतः निजी दान (एंडोमेंट) और अंतर्राष्ट्रीय छात्रों पर निर्भर रहते हैं। बढ़ती शिक्षा लागत और वीज़ा नीतियों की सख्ती के कारण वैश्विक प्रतिभा का प्रवाह समय-समय पर बाधित हुआ है।
विस्तृत बनाम लक्षित शोध दृष्टिकोण
अमेरिका का शैक्षणिक मॉडल उदार कला एवं विज्ञान के संतुलन पर आधारित है। यह रचनात्मकता को प्रोत्साहित करता है किंतु एशियाई देशों में अपनाए जा रहे ‘मिशन-मोड’ आधारित, केंद्रित शोध दृष्टिकोण की तुलना में कम प्रभावशाली सिद्ध हो रहा है।
विदेशी प्रतिभा पर निर्भरता
अमेरिका में STEM अनुसंधान का एक बड़ा हिस्सा भारतीय और चीनी छात्रों द्वारा किया जाता रहा है। किंतु चीन में बेहतर शोध सुविधाओं के विकास के साथ चीन से अमेरिका की ओर होने वाला प्रतिभा प्रवासन अब उलटी दिशा में जाने लगा है।
चीनी रणनीति: सफलता का सूत्र
चीन की शैक्षणिक प्रगति कोई आकस्मिक घटना नहीं है बल्कि दशकों से लागू की जा रही एक सुविचारित राज्य-प्रायोजित नीति—‘डबल फर्स्ट-क्लास यूनिवर्सिटी योजना’ का परिणाम है।
व्यापक वित्तीय निवेश
चीन शोध अवसंरचना पर भारी पूंजी निवेश करता है जिससे उसकी प्रयोगशालाएँ अत्याधुनिक उपकरणों से सुसज्जित हैं जो कई मामलों में पश्चिमी देशों से भी उन्नत हैं।
अग्रणी क्षेत्रों पर रणनीतिक ध्यान
- चीन सामान्य शोध के बजाय उन ‘फ्रंटियर टेक्नोलॉजीज़’ पर केंद्रित है जो भविष्य की वैश्विक शक्ति संरचना को निर्धारित करेंगी:
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): फेस रिकग्निशन और डीप लर्निंग में अग्रणी भूमिका
- नवीकरणीय ऊर्जा: सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन अनुसंधान में वैश्विक बढ़त
- क्वांटम प्रौद्योगिकी: उपग्रह-आधारित क्वांटम संचार में नेतृत्व
अकादमिक–औद्योगिक एकीकरण
चीनी विश्वविद्यालयों का सीधा जुड़ाव राज्य-स्वामित्व वाले उद्यमों से है। परिणामस्वरूप शोध प्रयोगशालाओं से निकलकर शीघ्र ही औद्योगिक उत्पादन का रूप ले लेता है।
प्रभाव के विविध आयाम
- भू-राजनीतिक प्रभाव: वैज्ञानिक नेतृत्व किसी भी राष्ट्र की सॉफ्ट पावर का मूल आधार होता है। जो देश शोध में अग्रणी होता है, वही तकनीकी मानक, AI की नैतिक सीमाएँ और चिकित्सा प्रोटोकॉल निर्धारित करता है। इस संदर्भ में चीन का बढ़ता प्रभाव उसे नई वैश्विक व्यवस्था के नियम तय करने की क्षमता देता है।
- आर्थिक प्रभाव: आधुनिक अर्थव्यवस्थाएँ ज्ञान पर आधारित होती हैं। विश्वविद्यालय आर्थिक विकास के प्रमुख इंजन हैं। सामग्री विज्ञान और इंजीनियरिंग में नेतृत्व के माध्यम से चीन यह सुनिश्चित कर रहा है कि उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण भविष्य में भी उसकी सीमाओं के भीतर बना रहे।
- सुरक्षा प्रभाव: कई अग्रणी तकनीकें द्वि-उपयोगी होती हैं—नागरिक और सैन्य दोनों क्षेत्रों में। क्वांटम कंप्यूटिंग और हाइपरसोनिक तकनीकों में विश्वविद्यालयों में किया गया शोध सीधे सैन्य सामर्थ्य को सुदृढ़ करता है।
भारतीय परिदृश्य: एक यथार्थ मूल्यांकन
- वर्तमान में भारत वैश्विक शोध परिदृश्य में सीमांत भूमिका में है। यद्यपि IITs एवं IISc जैसे उत्कृष्ट संस्थान मौजूद हैं, फिर भी वे शीर्ष वैश्विक रैंकिंग में निरंतर स्थान बनाने में संघर्ष कर रहे हैं।
- न्यून शोध निवेश: भारत का अनुसंधान एवं विकास व्यय GDP का केवल 0.6–0.7% है जबकि चीन इस पर 2.4% से अधिक व्यय करता है।
- संख्या बनाम गुणवत्ता: भारत बड़ी संख्या में स्नातक तैयार करता है किंतु उच्च प्रभाव वाले और अत्यधिक उद्धृत शोध प्रकाशनों की संख्या सीमित बनी हुई है।
- अवसंरचनात्मक कमी: अधिकांश भारतीय विश्वविद्यालयों में सेमीकंडक्टर निर्माण या उन्नत जीनोमिक्स जैसे अत्याधुनिक अनुसंधान के लिए आवश्यक सुविधाओं का अभाव है।
भारत के लिए सीख
यदि भारत इस उभरती “नई विश्व व्यवस्था” में पीछे नहीं रहना चाहता, तो उसे एक समग्र और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी:
- अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) का प्रभावी उपयोग: ANRF को अकादमिक संस्थानों, उद्योग और सरकार के बीच मजबूत सेतु के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
- पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप का विस्तार: सरकार अकेले अनुसंधान को पर्याप्त संसाधन नहीं दे सकती। निजी क्षेत्र को सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में शोध अवसंरचना विकसित करने के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
- ‘हार्ड साइंसेज़’ को प्राथमिकता: IT व सेवा क्षेत्र की मजबूती बनाए रखते हुए सामग्री विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी और हार्डवेयर इंजीनियरिंग में बड़े स्तर पर निवेश आवश्यक है।
- प्रतिभा संरक्षण: ‘ब्रेन ड्रेन’ को ‘ब्रेन गेन’ में बदलने के लिए विदेश से लौटने वाले वैज्ञानिकों को विश्वस्तरीय सुविधाएँ, स्वतंत्रता एवं सम्मान प्रदान करना होगा।
- प्रशासनिक जटिलताओं में कमी: शैक्षणिक संस्थानों को अधिक स्वायत्तता दी जानी चाहिए क्योंकि कठोर नौकरशाही ढाँचे में उच्चस्तरीय शोध का विकास संभव नहीं है।
निष्कर्ष
- विश्वविद्यालय रैंकिंग्स में हो रहा यह परिवर्तन ‘कोयले की खान में कैनरी’ के समान चेतावनी है जो यह संकेत देता है कि पश्चिमी तकनीकी वर्चस्व का युग धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। भारत के लिए चीनी विश्वविद्यालयों का उदय एक चेतावनी भी है और एक दिशा-सूचक मानचित्र भी।
- यदि भारत 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि $30 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की नींव उसके विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं में ही रखी जाएगी।