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'डिजिटल डिवाइड' से 'डिजिटल ऋण' का नया संकट

संदर्भ

भारत की विकास गाथा एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। विगत दशकों में भारत का प्राथमिक लक्ष्य ‘डिजिटल डिवाइड’ को पाटना था और यह मिशन 97 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन और 85% स्मार्टफोन पैठ के साथ सफल रहा है। हालंकि, आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 एक नई और भयावह चुनौती ‘डिजिटल ऋण (Digital Debt)’ की ओर संकेत करता है।

क्या है डिजिटल ऋण 

यह अत्यधिक स्क्रीन समय के कारण संचित होने वाली वह शारीरिक और मानसिक लागत है जो चिंता, अनिद्रा, अवसाद व चयापचय (Metabolic) विकारों के रूप में सामने आती है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो भारत का ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (Demographic Dividend) एक बड़ी ‘जनसांख्यिकीय देनदारी’ (Liability) में बदल सकता है।

जैविक क्षरण: तकनीक का शरीर पर प्रहार 

  • डिजिटल ऋण केवल एक मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के जैविक तंत्र (Biology) को भी प्रभावित कर रहा है। 
    • सर्कैडियन रिदम में व्यवधान: स्क्रीन से निकलने वाली ‘नीली रोशनी’ मेलाटोनिन हार्मोन के प्राकृतिक स्राव को रोक देती है। यह एक प्रकार का ‘रासायनिक अपहरण’ है जो मस्तिष्क को भ्रमित कर उसे निरंतर सक्रिय रखता है जिससे गंभीर अनिद्रा पैदा होती है।
    • डोपामाइन अधिभार (Dopamine Overload): ‘इनफिनिट स्क्रॉल’ और  निरंतर नोटिफिकेशन व्यक्ति के मस्तिष्क के रिवॉर्ड सिस्टम को थका देते हैं। इससे दीर्घकालिक लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Deep Work) घट जाती है।
    • चयापचय संबंधी विकार: नींद की कमी और गतिहीन जीवनशैली सीधे तौर पर मोटापे, टाइप-2 मधुमेह और हृदय रोगों को जन्म दे रही है। 

संस्थागत हस्तक्षेप: नीतिगत सुधारों की आवश्यकता 

भारत सरकार अब ‘केवल सलाह’ देने के बजाय ‘प्रणालीगत हस्तक्षेप’ की दिशा में कदम बढ़ा रही है:

1. मानसिक स्वास्थ्य को बुनियादी ढांचा मानना 

  • टेली-मानस (Tele-MANAS): इस कार्यक्रम को प्राप्त 32 लाख कॉल यह दर्शाते हैं कि देश में मनोवैज्ञानिक सहायता की कितनी बड़ी एवं दबी हुई मांग थी।
  • NIMHANS का सुदृढ़ीकरण: मानसिक स्वास्थ्य को अब मुख्यधारा की स्वास्थ्य नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाया गया है।

2. नियामक और सुरक्षा ढांचा 

  • ऑनलाइन गेमिंग विनियमन: लत एवं वित्तीय जोखिमों को कम करने के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं।
  • डिजिटल वेलनेस पाठ्यक्रम: स्कूलों में ‘डिजिटल स्वच्छता’ को शारीरिक शिक्षा (PT) के समान अनिवार्य बनाया जा रहा है।
  • सेफ्टी-बाय-डिजाइन (Safety-by-Design): ब्रिटेन के मॉडल की तर्ज पर, भारत अब तकनीकी कंपनियों को ऐसे एल्गोरिदम बनाने के लिए उत्तरदायी ठहरा सकता है जो किशोरों के न्यूरोलॉजिकल स्वास्थ्य को नुकसान न पहुँचाएँ। 

वैश्विक और स्थानीय समाधान: प्रकृति की ओर वापसी 

  • दुनिया भर में ‘डिजिटल डिटॉक्स’ के सफल मॉडल अपनाए जा रहे हैं:
    • दक्षिण कोरिया (रेस्क्यू कैंप): यहाँ बाहरी गतिविधियों और हस्तशिल्प के माध्यम से युवाओं के डोपामाइन चक्र को पुन: संतुलित किया जाता है।
    • स्कैंडिनेविया (फ्रिलुफ्ट्सलिव): ‘प्रकृति में जीवन’ की यह अवधारणा स्क्रीन के कृत्रिम अनुभवों के बजाय वास्तविक इंद्रिय-बोध पर बल देती है।
    • भारतीय ग्रामीण मॉडल: कई गाँवों में शाम को सायरन बजाकर ‘डिजिटल फास्टिंग’ (7 से 9 बजे तक) का पालन किया जा रहा है जिससे सामाजिक जुड़ाव पुनर्जीवित हो रहा है। 

आगे की राह: एक ‘मानव-केंद्रित’ दृष्टिकोण 

  • भविष्य के डिजिटल हाईवे पर ‘विश्राम स्थलों’ का होना अनिवार्य है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
    • डिजिटल आहार (Digital Diet): कंटेंट का चयन ‘भोजन’ की तरह करें—ज्ञानवर्धक सामग्री ‘पोषण’ है और व्यर्थ की स्क्रॉलिंग ‘जंक फूड’ है।
    • नींद की शुचिता: सोने से 60 मिनट पहले ‘नो-स्क्रीन’ जोन बनाना अनिवार्य हो।
    • प्लेटफॉर्म उत्तरदायित्व: IT नियम (संशोधन) 2026 के तहत कंपनियों को लतकारी एल्गोरिदम के लिए जवाबदेह बनाया जाए।
    • ऑफलाइन केंद्रों का विकास: शहरी क्षेत्रों में खेल और कला के लिए रियायती स्थान उपलब्ध कराए जाएँ ताकि स्मार्टफोन एकमात्र मनोरंजन न रहे। 

निष्कर्ष

डिजिटल प्रगति का अर्थ मानवीय स्वास्थ्य की बलि देना नहीं होना चाहिए। ‘डिजिटल-प्रथम’ सोच से हटकर ‘मानव-प्रथम’ दृष्टिकोण अपनाना होगा। भारत की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसका युवा वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करता है या अपने ही स्मार्टफोन के ‘डिजिटल ऋण’ के बोझ तले दब जाता है। 

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