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माओवाद के बाद भारत में शासन का भविष्य

(प्रारंभिक परीक्षा: भारतीय राज्यतंत्र और शासन, लोकनीति, अधिकारों संबंधी मुद्दे, आर्थिक एवं सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान)

संदर्भ 

  • भारत में माओवादी आंदोलन के उदय और विस्तार पर प्रचलित चर्चाएं प्राय: दो धुरियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं जिसमें सुरक्षा एवं विकास शामिल है। दशकों से राज्य की ‘दोहरी रणनीति’ इन्हीं दो स्तंभों पर टिकी है किंतु इस विमर्श में एक बुनियादी पहलू अक्सर ओझल रहता है और वह है- शासन व्यवस्था की समस्या।
  • 1990 से 2000 के दशक में विद्रोह की तीव्र वृद्धि का कारण बुनियादी ढाँचे की कमी और गरीबी को बताया जाता है किंतु यह भी समझा जाना चाहिए कि आदिवासियों के असंतोष की जड़ें केवल ‘भौतिक अभाव’ में नहीं, बल्कि ‘संस्थागत विश्वास’ की कमी में भी निहित हैं। 

संवैधानिक अनुबंध और पांचवीं अनुसूची का वादा 

  • माओवादी विद्रोह आज मुख्यत: मध्य और पूर्वी भारत के उन राज्यों में सिमटा है जो संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। संविधान निर्माताओं ने इसे आदिवासियों के लिए एक ‘नए सामाजिक अनुबंध’ के रूप में देखा था। 
    • विशेष प्रावधान: इसमें जनजातीय सलाहकार परिषदों (TAC) और जनजातीय उप-योजनाओं के माध्यम से वित्तीय शक्ति का प्रावधान था।
    • राज्यपाल की भूमिका: राज्यपाल को भूमि हस्तांतरण रोकने और आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए विवेकाधीन शक्तियां दी गई थीं। 
  • विडंबना यह है कि इन प्रावधानों के बावजूद ये क्षेत्र गरीबी के वैश्विक सूचकांकों में उप-सहारा अफ्रीका से भी पीछे रह गए। सबसे बड़ी चुनौती भूमि एवं जंगलों पर अधिकारों की रही है। उदारीकरण के दौर में संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद कई आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल हुए, जिसने राज्य के प्रति उनके आक्रोश को बल मिला।
  • औपनिवेशिक ढाँचा और प्रतिनिधित्व का अभाव 
  • आदिवासियों के लिए बने विशेष प्रावधानों को लागू करने वाली प्रशासनिक इकाइयाँ आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से संचालित हैं।
  • बाहरी नौकरशाही: इन क्षेत्रों में तैनात ‘बाहरी’ कर्मचारी अपने साथ पूर्वाग्रह लेकर आए, जिससे स्थानीय आबादी में अलगाव (Alienation) और गहरा हुआ।
  • संस्थागत लाचारी: जनजातीय कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग जैसे निकाय शोषण रोकने में प्रभावी साबित नहीं हुए। राज्यपालों ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का उपयोग शायद ही कभी आदिवासियों के पक्ष में किया। 

PESA और स्वशासन का भ्रम

  • वर्ष 1996 में पंचायत विस्तार अधिनियम (PESA) को आदिवासियों के अल्प-प्रतिनिधित्व को दूर करने के लिए ‘स्वशासन’ के हथियार के रूप में लाया गया था। 
  • इसका उद्देश्य ग्राम सभाओं को जल, जंगल एवं जमीन पर निर्णय लेने की शक्ति देना था किंतु वास्तविकता में खनन एवं औद्योगिक दबाव के चलते सरकारों ने इन शक्तियों को कुचल दिया है। 
  • छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में PESA के प्रावधानों का सर्वाधिक उल्लंघन देखा गया है जहाँ ग्राम सभाओं की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण के मामले सामने आए हैं। 

जनता सरकार: माओवाद की समानांतर व्यवस्था 

  • जब राज्य के राजस्व, पुलिस एवं न्याय विभाग आदिवासियों के लिए दमनकारी और भ्रष्ट बन गए, तब माओवादियों ने ‘जनता सरकार’ (People's Government) का विचार पेश किया। 
  • समानांतर सेवा: 1990 के दशक में माओवादियों ने दंडकारण्य क्षेत्र में आदिवासियों को भूमि स्वामित्व का वादा किया और ‘जल, जंगल, जमीन’ के नारे के तहत उन्हें लामबंद किया।
  • त्वरित न्याय: सरकारी अदालतों की जटिलता और खर्च के मुकाबले माओवादियों की ‘अस्थाई अदालतों’ ने त्वरित न्याय का भ्रम पैदा किया, जिससे हताश आबादी ने उनका समर्थन किया। 

भविष्य की राह: 'नई कल्पना' की आवश्यकता 

  • हाल के वर्षों में सड़क, बिजली एवं डिजिटल तकनीक के माध्यम से सेवा वितरण (Service Delivery) में सुधार हुआ है किंतु शासन की संरचनात्मक बाधाएं वैसी ही बनी हुई हैं। 
  • संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने के लिए कई उपाय सुझाएँ जाते हैं- 
    1. प्रतिनिधित्व का संकट दूर करना: केवल ‘कोटा’ पर्याप्त नहीं है; निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य है। 
    2. अधिकार-आधारित कानूनों का संरक्षण: वन अधिकार अधिनियम (FRA) और PESA को कमजोर करने वाले हालिया संशोधनों (जैसे- CAF अधिनियम, 2016) पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। 
    3. छठी अनुसूची से सीख: माओवाद के बाद के भारत के लिए एक ऐसे शासन और प्रशासनिक ढाँचे की आवश्यकता है जो छठी अनुसूची की ‘स्वायत्त जिला परिषदों’ की तर्ज पर स्थानीय समुदायों को वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करे। 

निष्कर्ष

माओवाद केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं है, बल्कि यह ‘प्रशासनिक समस्या’ का परिणाम भी माना जाता है। जब तक औपनिवेशिक प्रशासनिक ढाँचे को बदलकर आदिवासियों को वास्तविक ‘स्वशासन’ नहीं प्रदान किया जाता है, तब तक विकास की लहर भी विद्रोह को पूरी तरह से समाप्त करने में असफल सिद्ध हो सकती है।

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