New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 AM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 AM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM

बीमा वितरण की अदृश्य लागत: संरचनात्मक संकट और सुधार की राह

संदर्भ 

भारतीय जीवन बीमा उद्योग वर्तमान में एक विरोधाभासी दौर से गुजर रहा है। वित्त वर्ष 2025 के आंकड़े बताते हैं कि जहाँ प्रीमियम में मात्र 6.7% की वृद्धि हुई, वहीं कमीशन भुगतान 18% बढ़कर 60,799 करोड़ के स्तर पर पहुँच गया। वितरण लागत का व्यवसाय की वृद्धि दर से तीन गुना तेज होना एक गहरे संरचनात्मक असंतुलन का संकेत है जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी ‘वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट 2025’ में भी रेखांकित किया है। 

सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र: लागत का बढ़ता अंतर 

  • वित्त वर्ष 2025 के आंकड़ों ने सार्वजनिक और निजी बीमाकर्ताओं के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा खींच दी है।
    • भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC): अपने पारंपरिक एजेंसी मॉडल के दम पर LIC ने 2.8% की प्रीमियम वृद्धि के बावजूद कमीशन अनुपात को 5.45% से घटाकर 5.17% करने में सफलता पाई।
    • निजी बीमाकर्ता: बैंकएश्योरेंस (Bancassurance) और ब्रोकर नेटवर्क पर अत्यधिक निर्भरता के कारण निजी क्षेत्र का कमीशन अनुपात 7.21% से उछलकर 8.95% हो गया। 

समस्या की जड़: सौदेबाजी की शक्ति और बाजार संरचना 

  • बीमा क्षेत्र में बढ़ती लागत का मुख्य कारण एजेंटों की अक्षमता नहीं, बल्कि बाजार संरचना का असंतुलन है।
    • केंद्रीकृत वितरण: भारत में 26 जीवन बीमा कंपनियां उन सीमित बैंकों के साथ साझेदारी के लिए संघर्ष कर रही हैं जिनके पास 4 लाख से अधिक शाखाओं का विशाल नेटवर्क है।
    • दबाव की स्थिति: बैंक आसानी से बीमा साझेदार बदल सकते हैं जिससे बीमा कंपनियों के पास कमीशन बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। यहाँ ‘नेगोशिएशन पावर’ पूरी तरह से मध्यस्थों (Intermediaries) के पास केंद्रित है। 
    • कॉर्पोरेट मध्यस्थों का दबदबा: वित्त वर्ष 2025 में कमीशन का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 26,000 करोड़) व्यक्तिगत एजेंटों के बजाय बैंकों और कॉर्पोरेट संस्थाओं के पास गया। 

EOM ढांचा और नियामकीय चुनौतियां 

IRDAI द्वारा 2023-24 में लागू ‘मैनेजमेंट व्यय’ (EOM) ढांचे का उद्देश्य पारदर्शिता लाना था। हालांकि, इसने केवल छिपी हुई लागतों को कमीशन के रूप में उजागर किया है किंतु वितरण के मूल आर्थिक स्वरूप में बदलाव नहीं किया। केवल पारदर्शिता या ‘कमीशन खुलासे’ जैसे उपाय उपभोक्ताओं को सीमित लाभ ही पहुँचा पाते हैं क्योंकि वे मूल प्रोत्साहन तंत्र को नहीं बदलते हैं। 

समाधान: एक नया आर्थिक प्रतिमान 

  • बीमा पैठ (Insurance Penetration) जो वित्त वर्ष 2024 में 4% से घटकर 3.7% रह गई है, उसे फिर से बढ़ाने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
    • नवीकरण-आधारित प्रोत्साहन: अत्यधिक अग्रिम (Front-loaded) कमीशन के बजाय भुगतान को पॉलिसी की निरंतरता (Persistency) और दीर्घकालिक प्रतिधारण से जोड़ा जाना चाहिए। इससे वितरकों का हित ग्राहक की संतुष्टि में निहित होगा।
    • संयुक्त पर्यवेक्षण: बैंकएश्योरेंस की निगरानी के लिए RBI और IRDAI के बीच एक समन्वित नियामक तंत्र की आवश्यकता है जो केवल व्यय अनुपात को न देखकर सेवा मानकों और ग्राहक शिकायतों का भी विश्लेषण करे।
    • परिणाम-आधारित विनियमन: अनुपालन को केवल कागजी प्रक्रियाओं तक सीमित न रखकर ‘मापनीय परिणामों’ (जैसे- प्रतिधारण दर और दावों का अनुभव) पर केंद्रित करना चाहिए। 

निष्कर्ष 

यदि वितरण लागत इसी प्रकार ग्राहक मूल्य से अधिक तेजी से बढ़ती रही, तो मध्यम आय वर्ग के लिए बीमा एक निवेश के रूप में अपनी प्रासंगिकता खो सकता है। बीमा क्षेत्र की वास्तविक सफलता केवल 'बिक्री' में नहीं, बल्कि 'दीर्घकालिक मूल्य सृजन' में है। 

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR