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अधिकरणों में पारदर्शिता की आवश्यकता

संदर्भ

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पिछले वर्ष केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत ‘अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021’ (Tribunal Reforms Act, 2021) उसके निर्णय की अवमानना करता है। 

क्या है अधिकरण

  • मूल संविधान में अधिकरण के संबंध में कोई प्रावधान नहीं था। 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा अनुच्छेद 323-A तथा 323-B जोड़ा गया।
    • अनुच्छेद 323-A संसद को यह अधिकार देता है कि वह केंद्र व राज्य की लोकसेवाओं, स्थानीय निकायों, सार्वजनिक निगमों तथा अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों में नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती व सेवा शर्तों से संबंधित विवादों को सुलझाने के लिये प्रशासनिक अधिकरण (Central Administrative Tribunal : CAT) की स्थापना कर सकती है।
    • इसमें सैन्य सेवाओं के सदस्य व अधिकारी, उच्चतम न्यायालय के कर्मचारी और संसद के सचिवालय के कर्मचारियों को शामिल नहीं किया जाता है।
    • यह एक बहु-सदस्यीय निकाय है, जिसमें एक अध्यक्ष तथा सदस्य होते हैं। ये न्यायिक तथा प्रशासनिक दोनों क्षेत्रों से लिये जाते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
    • इनका कार्यकाल 5 वर्ष अथवा अध्यक्ष के मामले में 65 वर्ष की आयु तक तथा सदस्यों के मामलों में 62 वर्ष जो भी पहले हो, होता है।
    • कैट के सदस्यों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष अधिकार प्राप्त चयन समिति की अनुशंसाओं पर होती है।
    • भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति के पश्चात् कैबिनेट की नियुक्ति समिति के अनुमोदन पर इनकी नियुक्ति की जाती है।
    • कैट प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित है। किसी अधिकरण के आदेश के विरुद्ध पहले संबंधित उच्च न्यायालय तथा उसके पश्चात् सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा सकती है।
  • अनुच्छेद 323-B लोकसेवाओं के अतिरिक्त अन्य मामलों के लिये अधिकरण के गठन का प्रावधान करता है।
  • अनुच्छेद 323-A के अनुसार केवल संसद ही अधिकरण का गठन करती है, किंतु अनुच्छेद 323-B के अंतर्गत संसद व राज्य विधायिका अपने अधिकार क्षेत्र से संबंधित अधिकरण का गठन कर सकते हैं।

नवीनतम संशोधन व उनसे उत्पन्न विवाद

  • नए संशोधन अधिनियम के अनुसार, न्यायाधिकरणों के सदस्यों के रूप में अधिवक्ताओं की नियुक्ति के लिये न्यूनतम आयु मानदंड 50 वर्ष और कार्यकाल 4 वर्ष है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को मनमाना घोषित किया है।
  • संशोधित अधिनियम की धारा 3(1) 50 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों के न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों पर रोक लगाती है। यह कार्यकाल की सुरक्षा को कमजोर करता है और न्यायिक स्वतंत्रता व शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत दोनों का उल्लंघन करता है।
  • यह कुछ मौजूदा अपीलीय निकायों को भंग करने और उनके कार्यों को अन्य मौजूदा न्यायिक निकायों को स्थानांतरित करने का प्रयास करता है।
  • यह केंद्र सरकार को योग्यता, नियुक्ति, पद की अवधि, वेतन और भत्ते, त्यागपत्र, हटाने और अधिकरण के सदस्यों की सेवा के अन्य नियमों और शर्तों के नियम बनाने के लिये सशक्त बनाता है।
  • यह प्रावधान करता है कि अधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा एक खोज-सह-चयन समिति की सिफारिश पर नियुक्त किया जाएगा। साथ ही, यह भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खोज-सह-चयन समिति की संरचना भी प्रदान करता है।
  • अधिकरण के अध्यक्ष 4 वर्ष की अवधि या 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक जबकि अन्य सदस्य 4 वर्ष की अवधि या 67 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, तक पद धारण करेंगे।
  • गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ’ के मामले में अध्यक्ष या सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिये न्यूनतम आयु 50 वर्ष और 4 वर्ष के कार्यकाल को निर्धारित करने वाले प्रावधानों को रद्द कर दिया था।

निष्कर्ष

वर्तमान में विभिन्न न्यायालयों के समक्ष अनेक वाद लंबित हैं। न्यायालयों के बोझ को कम करने तथा लंबित मामलों की त्वरित सुनवाई के लिये अधिकरण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यद्यपि इनकी नियुक्ति तथा सेवा-शर्तों में पारदर्शिता व निष्पक्षता होनी चाहिये ताकि वे अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन कर सकें।

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