संदर्भ
प्रधानमंत्री द्वारा नई विश्व व्यवस्था की औपचारिक स्वीकारोक्ति ने भारत के कूटनीतिक गलियारों में एक मौलिक प्रश्न खड़ा कर दिया है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत अपनी नई राष्ट्रीय पहचान और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को किस प्रकार पुनर्परिभाषित करे।
बहुपक्षवाद का पतन और चीन का उभार
- दशकों तक ‘ग्लोबल साउथ’ का नेतृत्व भारत की विदेश नीति का मुख्य स्तंभ रहा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे मंचों पर विकासशील देशों के हितों की पुरजोर वकालत की। हालाँकि, विगत एक दशक में परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है:
- चीन का प्रभुत्व: चीन अब संयुक्त राष्ट्र की चार प्रमुख एजेंसियों का नेतृत्व कर रहा है और उसका वित्तीय योगदान पश्चिमी देशों से आगे निकल चुका है।
- संस्थागत क्षरण: अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विवाद निपटान तंत्र को लगभग निष्क्रिय कर दिया है और वह कई अंतर्राष्ट्रीय संधियों से बाहर हो चुका है।
- असममित संबंध: वैश्विक व्यवस्था अब नियमों के बजाय ‘लेन-देन’ और ‘शक्ति राजनीति’ (Power Politics) पर आधारित हो गई है। जहाँ चीन ने अपने व्यापारिक पदचिह्न 120 देशों तक फैला लिए हैं, वहीं भारत को बदलती व्यापार नीतियों और टैरिफ युद्ध के बीच अपनी जगह बनानी पड़ रही है।
‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का विकास और चुनौतियाँ
- शीत युद्ध के दौर में उपजी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की अवधारणा आज के दौर में अपनी धार खो रही है। भारत ने 2017 में क्वाड (QUAD) में शामिल होकर अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाया किंतु साथ ही रूस से S-400 मिसाइल प्रणाली खरीदकर अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता का प्रदर्शन भी किया।
- रूस के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिक और सामरिक रूप से अत्यंत विश्वसनीय रहे हैं। अमेरिका इस जुड़ाव को सीमित करने का प्रयास कर रहा है जो भारत की ‘तीसरी धुरी’ बने रहने की क्षमता की कठिन परीक्षा है। अमेरिकी विश्लेषकों द्वारा भारत को ‘स्वायत्त’ के बजाय ‘स्विंग स्टेट’ कहना इसी कूटनीतिक रस्साकशी का संकेत है।
आर्थिक राष्ट्रवाद और 'अमेरिका फर्स्ट' का प्रभाव
वर्तमान वैश्विक राजनीति में गठबंधनों का स्थान अब ‘असममित द्विपक्षीय संबंधों’ ने ले लिया है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत टैरिफ निर्धारण अब एकतरफा हो गया है। भारत के लिए चिंता का विषय यह है कि अमेरिका किसी भी अन्य ‘चीन’ (संभावित वैश्विक प्रतिस्पर्धी) के उदय को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है और भारत ही वह देश है जिसमें यह क्षमता है।
भविष्य की रणनीति: विदेश नीति का नया आधार
- भारत को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को अब ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य के साथ जोड़ना होगा। इसके लिए निम्नलिखित चार-सूत्रीय रणनीति प्रभावी हो सकती है:
- घरेलू क्षमता निर्माण: चीन और शुरुआती अमेरिका के इतिहास से सीखते हुए भारत को अंतर्राष्ट्रीय विवादों में कम प्रोफाइल रखते हुए अपनी घरेलू विनिर्माण और तकनीकी क्षमताओं (AI, साइबर सुरक्षा) को विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए।
- व्यापार विविधीकरण: अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए एशिया और अफ्रीका के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को प्राथमिकता देनी होगी। एशिया, जो जल्द ही दुनिया की दो-तिहाई संपत्ति का केंद्र होगा, भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर है।
- रूस-चीन संतुलन: रूस के साथ अंतरिक्ष और साइबर सहयोग को बढ़ाना तथा सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए चीन के निवेश का लाभ उठाना भारत की आर्थिक गति के लिए आवश्यक है।
- क्षेत्रीय स्थिरता (पाकिस्तान नीति): पाकिस्तान के साथ संबंधों को केवल ‘सुरक्षा’ के चश्मे से देखने के बजाय ‘आर्थिक प्रोत्साहन’ के नजरिए से देखना चाहिए। ईरान-पाकिस्तान-भारत शांति पाइपलाइन जैसे प्रोजेक्ट्स इस दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।
निष्कर्ष: ब्रिक्स और नेतृत्व का अवसर
ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता भारत के लिए अपनी नई विदेश नीति को स्पष्ट करने का सुनहरा अवसर है। ब्रिक्स को एक राजनीतिक मंच के बजाय एक ‘आर्थिक सहयोग समुदाय’ के रूप में ढालना, जहाँ डिजिटल मुद्राओं के माध्यम से सीमा-पार व्यापार सुगम हो, भारत के नेतृत्व को वैश्विक मान्यता दिला सकता है। भारत की असली ताकत उसकी ‘युवा मेधा’ है; यदि इसे सही दिशा मिलती है तो भारत वास्तव में एक ‘साइबर सुपरपावर’ के रूप में उभरेगा।