चर्चा में क्यों?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े एक अहम मामले में सात आरोपियों में से पांच को जमानत दी, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत देने से इनकार कर दिया।

प्रमुख बिन्दु
- हालाँकि सभी आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम - UAPA, शस्त्र अधिनियम और अन्य दंडात्मक कानूनों के तहत समान धाराएँ लगाई गई थीं, लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सभी की भूमिका समान नहीं थी।
- इस फैसले ने दो बड़े कानूनी प्रश्नों को केंद्र में ला दिया है:
- “आतंकवादी कृत्य” की परिभाषा क्या है और इसका निर्धारण कैसे होगा?
- क्या UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत मुकदमे से पहले लंबी अवधि तक कारावास उचित है?
कथित षड्यंत्र में भूमिकाओं का पदानुक्रम
- सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत पर निर्णय लेते समय सामूहिक आरोप के बजाय व्यक्तिगत भूमिका के आकलन को प्राथमिकता दी।
- मुख्य आरोपी: कथित योजनाकार उमर खालिद और शरजील इमाम के संबंध में अदालत ने माना कि अभियोजन की सामग्री उन्हें अवधारणा (Ideation) निर्देशन (Direction) समन्वय (Coordination) लामबंदी (Mobilisation) के स्तर पर स्थापित करती है।
- उन्हें “वैचारिक प्रेरक” और “मुख्य योजनाकार” बताया गया, जिन पर नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध को दिल्ली को पंगु करने वाले सुनियोजित चक्का जाम में बदलने का आरोप है।
- अदालत के अनुसार, यह भूमिका केंद्रीय और निर्देशात्मक थी।
सह-आरोपी: गौण या स्थानीय भूमिका
- जिन पांच आरोपियों को जमानत दी गई, उन्हें “स्थानीय स्तर के सूत्रधार” या “स्थल-स्तरीय निष्पादक” माना गया।
- उनकी भूमिका को व्युत्पन्न (Derivative) बताया गया, यानी वे उच्च-स्तरीय निर्देशों पर काम कर रहे थे, न कि साजिश के निर्माता थे।
- जांच पूरी हो जाने और मुकदमे में अत्यधिक देरी को देखते हुए, उन्हें जेल में बनाए रखना अनुचित और दंडात्मक माना गया।
कानून ‘आतंकवादी कृत्य’ को कैसे परिभाषित करता है?
UAPA की धारा 15
- धारा 15 के अनुसार, आतंकवादी कृत्य वह है जो
भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा या संप्रभुता को खतरे में डालने,
या जनता में आतंक फैलाने के उद्देश्य से किया गया हो।
- इसमें बम, विस्फोटक, आग्नेयास्त्र जैसे साधनों के साथ-साथ एक व्यापक वाक्यांश भी शामिल है:
“या कोई अन्य साधन”।
अभियोजन पक्ष का तर्क
- अभियोजन ने तर्क दिया कि योजनाबद्ध और व्यापक चक्का जाम,भले ही उसमें पारंपरिक हथियारों का उपयोग न हो,फिर भी उसके इरादे और प्रभाव इतने गंभीर हो सकते हैं कि वे “किसी अन्य साधन” के अंतर्गत आतंकवादी कृत्य माने जाएँ।
रक्षा पक्ष का तर्क
- बचाव पक्ष ने कहा कि सड़क अवरोधन लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन का हिस्सा है।
- चूँकि धारा 15 मुख्यतः हिंसक साधनों की बात करती है,इसलिए “किसी अन्य साधन” की व्याख्या संकीर्ण होनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण
- न्यायालय ने रक्षा पक्ष के इस तर्क को खारिज किया कि ये कृत्य केवल राजनीतिक असहमति थे।
- अदालत ने कहा कि:
- यदि प्रमुख सड़कों को व्यवस्थित रूप से अवरुद्ध किया जाए,
- नागरिक जीवन को पंगु बनाया जाए,और इसे पूर्व नियोजित, समन्वित तथा अंतरराष्ट्रीय घटनाओं (जैसे 2020 में डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा) के साथ समयबद्ध किया जाए, तो यह प्रथम दृष्टया आतंकवादी कृत्य की श्रेणी में आ सकता है।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ध्यान केवल उपयोग किए गए साधन पर नहीं, बल्कि कृत्य के उद्देश्य, इरादे और प्रभाव पर भी होना चाहिए।
धारा 43D(5) और जमानत पर प्रभाव
- UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत तब वर्जित है,जब आरोप प्रथम दृष्टया सत्य प्रतीत हों।
- गवाहों के बयान, चैट और बैठकों के रिकॉर्ड के आधार पर अदालत ने माना कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ साजिश का प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
- इसलिए उनके मामले में जमानत पर लगी वैधानिक रोक लागू रही।
दीर्घकालीन कारावास और जमानत का प्रश्न
- सभी आरोपियों ने 2020 से चली आ रही लंबी हिरासत का हवाला दिया।
- उन्होंने Union of India बनाम K.A. Najeeb फैसले का संदर्भ दिया,जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि शीघ्र सुनवाई की संभावना न हो, तो संवैधानिक अदालतें अनुच्छेद 21 के तहत जमानत दे सकती हैं।

K.A. Najeeb पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि K.A. Najeeb कोई यांत्रिक नियम नहीं है।
- देरी अपने-आप में जमानत का अधिकार नहीं बनाती।
- विशाल रिकॉर्ड (1000+ दस्तावेज, 835 गवाह) और प्रक्रियात्मक आपत्तियों को देखते हुए,देरी का पूरा दोष अभियोजन पर नहीं डाला जा सकता।
- अदालत ने कहा कि देरी को अपराध की गंभीरता और आरोपी की भूमिका के साथ तौलना होगा।
निष्कर्ष
- यह फैसला स्पष्ट करता है कि UAPA के तहत “आतंकवादी कृत्य” की व्याख्या केवल हथियारों तक सीमित नहीं है,बल्कि इरादे, योजना और प्रभाव भी निर्णायक होंगे।
- साथ ही, न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि सभी आरोपियों को समान रूप से नहीं आँका जा सकता,
और जमानत का प्रश्न उनकी वास्तविक भूमिका पर निर्भर करेगा।
- यह निर्णय भविष्य में UAPA मामलों, जमानत और विरोध-प्रदर्शन बनाम आतंकवाद की बहस पर गहरा प्रभाव डालेगा।