New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 10th Aug 2026, 3:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 18th Aug 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 10th Aug 2026, 3:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 18th Aug 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM

नार्को टेस्ट पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एवं संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन व कार्य, शासन व्यवस्था, पारदर्शिता एवं जवाबदेही के महत्त्वपूर्ण पक्ष)

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में अमलेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2025) मामले में पटना उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अनैच्छिक नार्को परीक्षण की अनुमति दी गई थी। यह फैसला अपराध जांच में नैतिकता एवं संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। 

नार्को टेस्ट: तकनीकी एवं संवेदनशील मुद्दा  

  • नार्को टेस्ट में आरोपी को सोडियम पेंटोथल जैसे बार्बिट्यूरेट्स दिए जाते हैं ताकि उनकी झिझक कम हो और वे अधिक स्पष्ट रूप से जानकारी साझा करें। यह तकनीक पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग के समान कार्य करती है जिसका उद्देश्य सचेत नियंत्रण को घटाकर छिपे तथ्यों को उजागर करना है।
  • यद्यपि इसे अहिंसक माना जाता है किंतु यह संज्ञानात्मक स्वायत्तता में हस्तक्षेप करता है और हमेशा संवैधानिक जांच के दायरे में रही है। 

संवैधानिक अधिकारों के तहत विवाद

1. स्वयं को दोषी ठहराने के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 20(3))

अनुच्छेद 20(3) किसी आरोपी को अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य नहीं करता है। अनैच्छिक नार्को परीक्षण इस सुरक्षा का उल्लंघन करता है क्योंकि इसमें व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छाशक्ति दबाई जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र और सूचित सहमति के बिना कोई भी नार्को परीक्षण साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है।

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं निजता (अनुच्छेद 21)

अनुच्छेद 21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है जिसमें शारीरिक स्वायत्तता व मानसिक गोपनीयता शामिल हैं। न्यायालय ने कहा कि जबरन नार्को परीक्षण निजता एवं स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन है। इसे अनुच्छेद 14, 19 एवं 21 के स्वर्ण त्रिकोण से जोड़ा गया है, जैसा कि मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में स्थापित हुआ।

न्यायिक मिसालें और दिशानिर्देश 

  • सेल्वी बनाम कर्नाटक (2010) मामले में अनैच्छिक नार्को, पॉलीग्राफ एवं ब्रेन मैपिंग पर रोक लगाई गई। इसके तहत निम्न दिशानिर्देश जारी किए गए-
    • सहमति स्वतंत्र, सूचित और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हो।
    • चिकित्सा और कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन अनिवार्य हो।
    • परीक्षण के परिणाम साक्ष्य के रूप में सीधे स्वीकार्य नहीं हैं, उन्हें अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से पुष्टि करना आवश्यक है। 
      • पटना उच्च न्यायालय का आदेश इन दिशानिर्देशों के विपरीत था, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने इसे रद्द कर दिया।
  • इसी तरह के दृष्टांत मनोज कुमार सैनी बनाम मध्य प्रदेश (2023) और विनोभाई बनाम केरल (2025) में भी देखने को मिले।
  • अंतत: नार्को टेस्ट के परिणाम सीधे अपराध की पुष्टि नहीं कर सकते हैं, वे केवल जांच में सहायक उपकरण हैं और हमेशा स्वतंत्र साक्ष्यों के साथ पुष्ट होने चाहिए।

सहमति और नैतिक आधार

  • सूचित सहमति: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नार्को परीक्षण तभी किया जा सकता है जब आरोपी स्वयं सहमति दे। भारतीय न्याय संहिता की धारा 253 के तहत बचाव पक्ष की मांग पर परीक्षण की अनुमति दी जा सकती है किंतु यह निरपेक्ष अधिकार नहीं बन जाता है।
  • नैतिक दृष्टिकोण: न्यायालय ने कांट के नैतिक सिद्धांतों का हवाला दिया कि कोई भी कार्रवाई तभी नैतिक है जब सहमति आधारित हो। वस्तुतः जबरन परीक्षण मानवीय गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

आपराधिक न्याय प्रणाली पर प्रभाव

  • अधिकार-आधारित पुलिसिंग को मजबूत करना: यह फैसला पुष्टि करता है कि जांच की दक्षता मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती है।
  • पीड़ित व आरोपी के अधिकारों में संतुलन: न्यायपालिका ने स्पष्ट किया कि जांच उपकरणों का प्रयोग संवैधानिक नैतिकता के अनुरूप होना चाहिए।
  • न्यायिक संगति को पुनः स्थापित करना: सेल्वी (2010) और बाद के मामलों का पालन करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी स्थिरता और पूर्वानुमेयता सुनिश्चित की, जो नागरिक स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

वस्तुतः इस फैसले ने अनैच्छिक नार्को परीक्षण पर संवैधानिक रोक को अधिक मजबूत किया और भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में स्वायत्तता, नैतिकता एवं अधिकार-आधारित जांच के महत्व को रेखांकित किया है।

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR