संदर्भ
- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों से जुड़े सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2025 को मंजूरी दी है। इस विधेयक में यह प्रावधान है कि जो देश जानबूझकर रूसी मूल के यूरेनियम और पेट्रोलियम उत्पादों का व्यापार करते हैं, उनसे आने वाली वस्तुओं व सेवाओं पर 500% तक का भारी टैरिफ लगाया जाएगा।
- इस कानून में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और कुछ शीर्ष सैन्य अधिकारियों पर नए प्रतिबंध शामिल हैं। साथ ही, अमेरिका में सीधे होने वाले रूसी आयात पर भी 500% शुल्क लगाने का प्रस्ताव है।
मुद्दे की पृष्ठभूमि
- रूस–यूक्रेन युद्ध (2022) के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात उल्लेखनीय रूप से बढ़ा दिया।
- वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित किए बिना रूस की आय को सीमित करने के लिए अमेरिका और जी-7 देशों ने कच्चे तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल की मूल्य-सीमा तय की। हालाँकि, बाद में खरीद में कुछ कमी आई, फिर भी रूस के प्रमुख तेल खरीदारों में भारत शामिल रहा।
- इसके चलते पहले भारतीय निर्यात पर 25% और बाद में 50% तक के अमेरिकी दंडात्मक टैरिफ लगाए गए। अब प्रस्तावित विधेयक ऊर्जा व्यापार को द्वितीयक प्रतिबंधों से जोड़कर दबाव को अधिक तीव्र कर देता है।
सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2025 की प्रमुख विशेषताएँ
- द्वितीयक प्रतिबंध व्यवस्था : यह अधिनियम अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे उन देशों पर द्वितीयक शुल्क और प्रतिबंध लागू कर सकें जो रूस से तेल, गैस, यूरेनियम व अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद जारी रखते हैं, भले ही उनका अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष व्यापार न हो।
- दंडात्मक टैरिफ प्रावधान : इसके तहत उन देशों से अमेरिका में आयात होने वाली वस्तुओं और सेवाओं पर 500% तक का अनिवार्य शुल्क लगाया जा सकता है, जो जानबूझकर रूसी मूल के ऊर्जा उत्पादों से जुड़े व्यापार में संलग्न हैं।
- रूस का वित्तीय अलगाव : यह कानून अमेरिकी वित्त मंत्रालय को निर्देश देता है कि वह रूसी वित्तीय संस्थानों तथा उनके साथ लेन-देन करने वाली विदेशी इकाइयों पर संपत्ति अवरोधक (एसेट-ब्लॉकिंग) प्रतिबंध लगाए, जिससे रूस की वैश्विक वित्तीय पहुँच और सीमित हो सके।
कानूनी अड़चनों से बचने की रणनीति
- यह विधेयक अदालतों की भूमिका को दरकिनार करता है और टैरिफ लगाने के मामले में ट्रम्प की शक्तियों को अधिक मजबूत करता है।
- यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ट्रम्प प्रशासन को अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) के इस्तेमाल को लेकर कई कानूनी झटके लगे हैं।
- प्रस्तावित सैंक्शनिंग रशिया एक्ट इन कानूनी कमजोरियों को दरकिनार कर देगा और रूसी तेल व यूरेनियम से जुड़े व्यापार को दंडित करने के लिए ट्रम्प प्रशासन को ठोस वैधानिक आधार प्रदान करेगा। साथ ही, रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के दबाव को बनाए रखेगा।
- इसके साथ ही अमेरिका ने व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत कई जाँचें शुरू की हैं जिनके परिणामस्वरूप स्टील, एल्युमीनियम और तांबे पर 50% शुल्क लगाने की अनुमति मिल गई है।
भारत पर अमेरिका द्वारा 500% टैरिफ लगाए जाने के संभावित परिणाम
- व्यापार और निर्यात पर गंभीर प्रभाव: 500% का टैरिफ व्यवहार में एक प्रकार के व्यापार प्रतिबंध जैसा होगा, जिससे भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी ही नहीं रहेंगे। उदाहरण के तौर पर, जी.टी.आर.आई. के आकलन के अनुसार लगभग 120 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात प्रभावित हो सकते हैं। इसमें कपड़ा, रत्न और आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्र शामिल हैं जो पहले ही बढ़े हुए शुल्क के दायरे में आ चुके हैं और अब बंदी व रोजगार हानि के जोखिम का सामना कर रहे हैं।
- ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी कठिन चुनौती : रियायती रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति ने भारत को महंगाई और राजकोषीय दबावों को संभालने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में इस संबंध को अचानक तोड़ना आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महंगा पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2026 की शुरुआत में किए गए अनुमानों के मुताबिक रूसी तेल से दूरी बनाने पर भारत का आयात बिल 9–11 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। इससे रिलायंस जैसी प्रमुख रिफाइनरियों को प्रतिबंधों से बचने के लिए रूसी शिपमेंट रोकने पर मजबूर होना पड़ सकता है।
- भू-राजनीतिक दबाव और अविश्वास : टैरिफ की आशंका भारत–अमेरिका की व्यापक रणनीतिक साझेदारी पर तनाव डालती है और चयनात्मक कार्रवाई को लेकर शंकाएँ उत्पन्न करती है। उदाहरणस्वरूप, भारतीय अधिकारियों ने इस विरोधाभास की ओर संकेत किया है कि रूस से ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार होने के बावजूद चीन पर समान स्तर के दंड लागू नहीं किए गए, जिससे नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है।
- वैश्विक बाजार में असंतुलन: अत्यधिक कठोर द्वितीयक प्रतिबंध ऊर्जा बाजारों और वित्तीय प्रणालियों के विभाजन का जोखिम बढ़ा सकते हैं जिससे आर्थिक गुटों के बनने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि ऐसे टैरिफ के लिए IEEPA के इस्तेमाल पर अमेरिका में कानूनी जांच बढ़ती है तो भारत एवं ब्राज़ील जैसे देश गैर-डॉलर भुगतान प्रणालियों की ओर अधिक झुक सकते हैं जिससे डॉलर के प्रभुत्व में गिरावट की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
- रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव : वाशिंगटन और मॉस्को के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की भारत की क्षमता को शीत युद्ध के बाद की सबसे कठिन चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। उदाहरण के तौर पर, जनवरी 2026 में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन से अमेरिका का बाहर निकलना और इसके साथ टैरिफ से जुड़ी धमकियाँ, लेन-देन आधारित कूटनीति की ओर संकेत करती हैं जो भारत की नीतिगत स्वतंत्रता को सीमित कर सकती हैं।
चीन की तुलना में भारत अधिक जोखिम में
- हालाँकि, रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित अमेरिकी शुल्क वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन निर्यात विविधीकरण की कमजोर स्थिति के कारण भारत पर इसका असर चीन से अधिक पड़ सकता है।
- अमेरिकी टैरिफ के बावजूद चीन ने उभरते क्षेत्रों में अपनी मजबूत स्थिति और महत्वपूर्ण खनिजों पर नियंत्रण के बल पर 2025 में लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष दर्ज किया।
- इसके विपरीत, भारत में विनिर्माण सुधारों और निवेश प्रोत्साहन के बावजूद कई निर्यात कम तकनीक-आधारित हैं, जिन्हें आसानी से प्रतिस्थापित किया जा सकता है। वहीं, रूस से तेल खरीदने वाला सबसे बड़ा देश चीन, टैरिफ दबाव से निपटने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाने में सक्षम है, जैसा कि उसने पहले भी किया है।
भारत के लिए आगे की रणनीति
- ऊर्जा स्रोतों में विविधता को तेज करना: रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने से प्रतिबंधों के कारण उत्पन्न दबाव के प्रति भारत की संवेदनशीलता कम हो सकती है। उदाहरणस्वरूप, भारत अपनी तेल आपूर्ति को अधिक सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से गुयाना, ब्राज़ील और पश्चिम एशिया से आयात बढ़ाकर रूस पर निर्भरता को ‘प्रतिबंध-सुरक्षित’ स्तर से नीचे लाने की दिशा में काम कर रहा है।
- कूटनीतिक स्तर पर मूल्य सीमा पर पुनर्विचार: भारत को यह तर्क आगे रखना चाहिए कि उसके तेल आयात वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर करने के बजाय संतुलित बनाए रखने में सहायक हैं। उदाहरण के लिए, विदेश मंत्री एस. जयशंकर के नेतृत्व में होने वाली उच्च स्तरीय वार्ताओं में यह रेखांकित किया जा सकता है कि भारतीय खरीद ने तेल की कीमतों को 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचने से रोका है, जिससे अन्य देशों के साथ-साथ अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी संभावित नुकसान से बचाया गया।
- नए मुक्त व्यापार समझौतों के जरिए जोखिम से बचाव: निर्यात गंतव्यों में विविधता लाकर लघु और मध्यम उद्यमों को अमेरिकी टैरिफ के झटकों से कुछ हद तक सुरक्षित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौतों को शीघ्र लागू करने से परिधान और इंजीनियरिंग उत्पाद जैसे शुल्क-प्रभावित क्षेत्रों के लिए वैकल्पिक बाजार उपलब्ध हो सकते हैं।
- कानूनी और बहुपक्षीय विकल्पों का उपयोग: इस स्तर के एकतरफा टैरिफ अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून के बुनियादी सिद्धांतों पर सवाल खड़े करते हैं। उदाहरण के लिए, विश्व व्यापार संगठन (WTO) या जी20 जैसे मंचों पर समन्वित पहल के माध्यम से 500% टैरिफ को सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र (MFN) दायित्वों के उल्लंघन के रूप में चुनौती दी जा सकती है।
- संरचनात्मक ऊर्जा परिवर्तन को आगे बढ़ाना: जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने से भारत पर बाहरी आर्थिक और भू-राजनीतिक दबाव कमजोर पड़ेगा। उदाहरणस्वरूप, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को गति देना और इलेक्ट्रिक वाहनों को व्यापक रूप से अपनाना कच्चे तेल से जुड़ी रणनीतिक निर्भरता को दीर्घकाल में कम कर सकता है।
निष्कर्ष
प्रस्तावित 500% टैरिफ की धमकी केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए भी एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करती है। ऐसे में भारत के आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए कूटनीति, व्यापारिक विविधीकरण और ऊर्जा परिवर्तन का संतुलित एवं समन्वित दृष्टिकोण अपनाना अत्यंत आवश्यक होगा।